rathore vansh

rathore vansh | राठौड़ वंश | राजस्थान का इतिहास

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राठौड़ वंश (rathore vansh)


{1} जोधपुर के राठौड़
(jodhpur ka rathore vansh)

राजस्थान के उत्तरी व पश्चिमी भागों मे राठौड़ वंशीय राजपूतों का साम्राज्य स्थापित हुआ, जिसे मारवाड़ कहते है।
राठौड़ का शाब्दिक अर्थ राष्ट्रकूट होता है।
जोधपुर के राठौड़ों का मूल स्थान कन्नौज था। उनको बंदायूँ वंश से उत्पन्न माना जाता है।
जोधपुर के राठौड़ वंश का संस्थापक राव सीहा था, जो कन्नौज के जयचंद गहड़वाल का प्रपौत्र था।
राव सीहा कुंवर सेतराम का पुत्र था व उसकी रानी सोलंकी वंश की पार्वती थी।
प्रमुख शासक

राव चूड़ा राठौड़

राव वीरमदेव का पुत्र, मारवाड़ का प्रथम बड़ा शासक था।
उसने मंडोर को मारवाड़ की राजधानी बनाया।
मारवाड़ राज्य में ‘सामन्त प्रथा‘ का प्रारम्भ राव चूड़ा द्वारा किया गया था।
राव चूड़ा की रानी चाँदकंवर ने चांद बावड़ी बनवाई।
राव चूड़ा ने नागौर के सूबेदार ‘जल्लाल खां‘ को हराकर नागौर के पास ‘चूड़ासर‘ बसाया था।
राव चूड़ा ने अपनी ‘मोहिलाणी‘ रानी के पुत्र ‘कान्हा‘ को राज्य का उत्तराधिकारी नियुक्त किया और अपने ज्येष्ठ पुत्र ‘रणमल‘ को अधिकार से वंचित कर दिया।
राठौड़ रणमल ने मेवाड़ के राणा लाखा, मोकल तथा महाराणा कुम्भा को अपनी सेवायें प्रदान की।
1438 ई. में मेवाड़ के सामन्तों ने षड़यंत्र रचकर रणमल की हत्या कर दी थी।
चूड़ा की पुत्री हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा के साथ हुआ।
चूड़ा के पुत्र रणमल की हत्या चित्तौड़ में हुई थी। (कुम्भा के कहने पर)


राव जोधा (1438-89 ई.)

रणमल का पुत्र।
जोधा ने 12 मई 1459 ई. में जोधपुर नगर की स्थापना की तथा चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर दुर्ग (मेहरानगढ़/मयूरध्वज/गढ़चिन्तामणि) बनवाया।
राव जोधा ने अपनी पुत्री का विवाह कुम्भा के पुत्र रायमल के साथ किया था।
मेहरानगढ़ की नींव करणी माता के हाथों रखी गई थी।
किपलिंग ने मेहरानगढ़ किले के लिए कहा, “यह किला परियों व अप्सराओं द्वारा निर्मित किला है।”
मेहरानगढ़ दुर्ग में मेहरसिंह व भूरे खां की मजार है।
मेहरानगढ़ दुर्ग में शम्भू बाण, किलकिला व गज़नी खां नामक तोपे हैं।
राव जोधा ने मेहरानगढ़ किले में चामुण्डा देवी का मन्दिर बनवाया जिसमें 30 सितम्बर 2008 को देवी के मन्दिर में दुर्घटना हुई जिसकी जाँच के लिए जशराज चौपड़ा कमेटी गठित की गयी।
राव जोधा के दो प्रमुख उत्तराधिकारी थे- राव सातल तथा राव सूजा

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राव गांगा (1515-32)

राव सूजा की मृत्यु के बाद उसका पौत्र गांगा मारवाड़ का शासक बना।
राव गांगा बाघा जी के पुत्र थे।
खानवा के युद्ध में गांगा ने अपने पुत्र मालदेव के नेतृत्व में सेना भेजकर राणा सांगा की मदद की थी।
राव गांगा ने गांगलोव तालाब, गांगा की बावड़ी व गंगश्याम जी के मंदिर का निर्माण करवाया।


राव मालदेव (1532-62 ई.)

राव मालदेव राव गांगा का बड़ा पुत्र था।
मालदेव ने उदयसिंह को मेवाड़ का शासक बनाने में मदद की।
मालदेव की पत्नी उमादे (जो जैसलमेर के राव लूणकर्ण की पुत्री थी) को रूठीरानी के नाम से जाना जाता है।
अबुल फज़ल ने मालदेव को ‘हशमत वाला’ शासक कहा था।
शेरशाह सूरी व मालदेव के दो सेनापतियों जैता व कुम्पा के बीच जनवरी, 1544 ई. मे गिरी सुमेल का युद्ध (जैतारण का युद्ध) हुआ जिसमें शेरशाह बड़ी मुश्किल से जीत सका।
गिरी सूमेल के युद्ध के समय ही शेरशाह के मुख से निकला कि “मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता।“
राव मालदेव के समय सिवाणा पर राणा डूँगरसी का अधिकार था।
राव मालदेव के समय बीकानेर का शासक राव जैतसी था।
मालदेव की रानी उमादे (रूठी रानी) को अजमेर से मनाकर ईश्वरदास जी जोधपुर लाये लेकिन आसा बारहठ ने रानी को एक दोहा सुनाया जिससे वह वापस नाराज हो गई।


राव चन्द्रसेन (1562-1581 ई.)

राव चन्द्रसेन मालदेव का तीसरा पुत्र था।
चन्द्रसेन के भाई राम के कहने पर अकबर ने सेना भेजकर जोधपुर पर कब्जा कर लिया था।
सन् 1570 ई. के नागौर दरबार में वह अकबर से मिला था लेकिन शीघ्र ही उसने नागौर छोड़ दिया।
चन्द्रसेन मारवाड़ का पहला राजपूत शासक था जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और मरते दम तक संघर्ष किया। ‘मारवाड़ का भूला बिसरा नायक’ नाम से प्रसिद्ध।
चन्द्रसेन को ‘मारवाड़ का प्रताप’ कहा जाता है।


राव चन्द्रसेन (1562-1581 ई.)

राव चन्द्रसेन का भाई।
राव उदयसिंह को मोटा राजा के नाम से भी जाना जाता है।
राव उदयसिंह ने 1570 ई. में अकबर की अधीनता स्वीकार की।
उसने अपनी पुत्री जोधाबाई (जगत गुंसाई/भानमती) का विवाह 1587 ई. में शहजादे सलीम (जहाँगीर) के साथ किया।
शहजादा खुर्रम इसी जोधाबाई का पुत्र था।
सवाई राजा सूरसिंह (1595-1619 ई.) :-

मोटाराजा उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात मुगल सम्राट अकबर ने सूरसिंह को उत्तराधिकारी घोषित किया।
इन्हें टीका देने की रस्म लाहौर में सम्पन्न की गई।
1604 ई. में अकबर ने इन्हें ‘सवाई राजा’ की उपाधि प्रदान की।
अकबर ने इन्हें दक्षिण में नियुक्त किया तब जोधपुर का शासन-प्रबंध इनके पुत्र गजसिंह तथा भाटी गोविंददास ने संभाला था।
सूरसिंह ने जहाँगीर को रणरावत तथा फौज शृंगार नामक हाथी भेंट किए थे।
1613 ई. में खुर्रम के मेवाड़ अभियान में भी सूरसिंह शामिल थे।
जहाँगीर ने इनका मनसब 5000 जात व 3000 सवार कर दिया था।
1619 ई. में दक्षिण में रहते हुए सूरसिंह का देहांत हो गया।
सूरसिंह ने जोधपुर में सूरसागर तालाब तथा जोधपुर दुर्ग में मोती महल का निर्माण करवाया।


महाराजा गजसिंह (1619-1638 ई.) :-

महाराजा सूरसिंह की मृत्यु के बाद गजसिंह जोधपुर के शासक बने तथा बुरहानपुर में इनका राज्याभिषेक किया गया।
गजसिंह की सेवाओं से प्रसन्न होकर मुगल सम्राट जहाँगीर ने इन्हें ‘दलथंभन’ की उपाधि प्रदान की।
1630 ई. में जहाँगीर ने गजसिंह को ‘महाराजा’ की उपाधि भी प्रदान की।
गजसिंह का ज्येष्ठ पुत्र अमरसिंह था लेकिन उन्हाेंने अपनी प्रेमिका अनारां के कहने पर अपना उत्तराधिकारी छोटे पुत्र जसवंत सिंह को घोषित किया।
गजसिंह ने मुगल शासक जहाँगीर तथा शाहजहाँ को अपनी सेवाएं प्रदान की।
गजसिंह के समय हेम कवि ने ‘गुणभाषा चित्र’ व केशवदास गाडण ने ‘राजगुणरूपक’ नामक ग्रंथों की रचना की।
राव अमरसिंह :–

अमरसिंह गजसिंह का ज्येष्ठ पुत्र था लेकिन इनकी विद्रोही तथा स्वतंत्र प्रवृत्ति के कारण गजसिंह ने इन्हें राज्य से निकाल दिया।
इसके बाद अमरसिंह मुगल बादशाह शाहजहाँ के पास चले गए।
शाहजहाँ ने इन्हें नागौर परगने का स्वतंत्र शासक बना दिया।
1644 ई. में बीकानेर के सीलवा तथा नागौर के जाखणियां के गाँव में मतीरे की बैल को लेकर मतभेद हुआ। इस मतभेद कारण नागौर के अमरसिंह तथा बीकानेर के कर्णसिंह के मध्य युद्ध हुआ जिसमें अमरसिंह पराजित हुआ। यह लड़ाई ‘मतीरे की राड़’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
सलावत खाँ ने अमरसिंह को द्वेषवश अपशब्द बोले थे जिससे नाराज अमरसिंह ने इसकी हत्या कर दी तथा उसके अन्य मनसबदारों से लड़ते हुए अमरसिंह वीरगति को प्राप्त हुए।


महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम) (1638-78 ई.)

महाराजा जसवंत सिंह प्रथम का जन्म 26 दिसम्बर, 1626 ई. में बुहरानपुर में हुआ था।
गजसिंह के पुत्र जसवन्तसिंह की गिनती मारवाड़ के सर्वाधिक प्रतापी राजाओं में होती है।
शाहजहाँ ने उसे ‘महाराजा’ की उपाधि प्रदान की थी। वह जोधपुर का प्रथम महाराजा उपाधि प्राप्त शासक था।
शाहजहाँ की बीमारी के बाद हुए उत्तराधिकारी युद्ध में वह शहजादा दाराशिकोह की ओर से धरमत (उज्जैन) के युद्ध (1657 ई.) में औरंगजेब व मुराद के विरुद्ध लड़कर हारा था।
वीर दुर्गादास इन्हीं का दरबारी व सेनापति था।
मुहता (मुहणोत) नैणसी इन्हीं के दरबार में रहता था। नेणसी ने ‘मारवाड़ री परगना री विगत’ तथा ‘नैणसी री ख्यात’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे। इसे ‘मारवाड़ का अबुल फजल‘ कहा जाता है।
उसने मुगलों की ओर से शिवाजी के विरूद्ध भी युद्ध में भाग लिया था।
इनकी मृत्यु सन् 1678 ई. में अफगानिस्तान के जमरूद नामक स्थान पर हुई थी।
महाराजा जसवंत सिंह ने ‘भाषा-भूषण’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की।
जसवंतसिंह द्वारा रचित अन्य ग्रंथ अपरोक्ष सिद्धान्त सार व प्रबोध चन्द्रोदय नाटक हैं।


अजीतसिंह (1678-1724 ई.)

अजीतसिंह जसवन्त सिंह प्रथम का पुत्र था।
वीर दुर्गादास राठौड़ ने अजीतसिंह को औरंगजेब के चंगुल से मुक्त कराकर उसे मारवाड़ का शासक बनाया था।
अजीतसिंह ने अपनी पुत्री इन्द्रकुंवरी का विवाह मुगल बादशाह फर्रूखशियर से किया था। अजीतसिंह की हत्या उसके पुत्र बख्तसिंह द्वारा की गयी।
अजीतसिंह के दाह संस्कार के समय अनेक मोर तथा बन्दरों ने स्वेच्छा से अपने प्राणों की आहुति दी।
दुर्गादास राठौड़

वीर दुर्गादास जसवन्त सिंह के मंत्री आसकरण का पुत्र था।
उसने अजीतसिंह को मुगलों के चंगुल से मुक्त कराया।
उसने मेवाड़ व मारवाड़ में सन्धि करवायी।
अजीतसिंह ने दुर्गादास को देश निकाला दे दिया तब वह उदयपुर के महाराजा अमर सिंह द्वितीय की सेवा मे रहा।
दुर्गादास का निधन उज्जैन में हुआ और वहीं क्षिप्रा नदी के तट पर उनकी छतरी (स्मारक) बनी हुई है।


महाराजा अभयसिंह (1724-1749 ई.)

महाराजा अजीतसिंह की मृत्यु के बाद 1724 ई. में उनका पुत्र अभयसिंह जोधपुर का शासक बना।
इनका राज्याभिषेक दिल्ली में हुआ।
इन्होंने 1734 ई. में मराठों के विरूद्ध राजपूताना के शासकों को एकजुट करने के लिए आयोजित हुरड़ा सम्मेलन में भाग लिया।
इनके समय चारण कवि करणीदान ने ‘सूरजप्रकाश’, भट्‌ट जगजीवन ने ‘अभयोदय’, वीरभाण ने ‘राजरूपक’ तथा सूरतिमिश्र ने ‘अमरचंद्रिका’ ग्रंथ की रचना की।
अभयसिंह ने मण्डोर में अजीत सिंह का स्मारक बनवाना प्रारंभ किया लेकिन इनके समय यह निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो सका।
इनके समय चारण कवि पृथ्वीराज द्वारा ‘अभयविलास’ काव्य लिखा गया।


महाराजा रामसिंह (1749-1751 ई.) :-

महाराजा अभयसिंह के निधन के बाद रामसिंह शासक बने।
यह एक कमजोर शासक थे तथा सरदारों के प्रति इनका व्यवहार भी अच्छा नहीं था जिसके कारण इन्हें शासक पद से हाथ धाेना पड़ा।


महाराजा बख्तसिंह (1751-1752 ई.)

बख्तसिंह ने महाराजा रामसिंह को पराजित कर जोधपुर पर अधिकार कर लिया।
बख्तसिंह महाराजा अजीतसिंह के पुत्र तथा महाराजा अभयसिंह के छोटे भाई थे।
बख्तसिंह वीर, बुद्धिमान तथा कार्यकुशल शासक थे।
इन्होंने नागौर के किले में कई महल बनावाए जिनमें से ‘आबहवा महल’ अधिक प्रसिद्ध है।
इन्होंने अपने पिता अजीतसिंह की हत्या कर दी थी जिस कारण ये पितृहंता कहलाए।
1752 ई. में सींघोली (जयपुर) नामक स्थान पर इनका देहांत हो गया।


महाराजा विजयसिंह (1752-1793 ई.):-

महाराजा बख्तसिंह के देहांत के बाद विजयसिंह मारवाड़ के शासक बने।
इस समय रामसिंह ने पुन: जोधपुर राज्य पर अधिकार करने के प्रयास किए तथा इसके लिए उसने आपाजी सिंधिया को आमंत्रित किया।
विजयसिंह की सहायता के लिए बीकानेर के महाराजा गजसिंह तथा किशनगढ़ के शासक बहादुरसिंह सेना सहित आये लेकिन विजयसिंह पराजित हुए।
अंत में 1756 ई. में मराठों से संधि हुई तथा जोधपुर, नागौर आदि मारवाड़ राज्य विजयसिंह को तथा सोजत, जालौर, मारोठ का क्षेत्र रामसिंह को मिला।
विजयसिंह ने वैष्णव धर्म स्वीकार किया तथा राज्य में मद्य-मांस की बिक्री पर रोक लगवा दी।
विजयसिंह के समय ढलवाये गए सिक्कों को विजयशाही सिक्के कहा गया।
1787 ई. में तुंगा के युद्ध में विजयसिंह ने जयपुर शासक प्रताप सिंह के साथ मिलकर माधवराव सिंधिया को पराजित किया।
पाटण के युद्ध (1790 ई.) में महादजी सिंधिया की सेना ने विजयसिंह की सेना को पराजित किया। यह युद्ध तंवरो की पाठण (जयपुर) नामक स्थान पर हुआ।
1790 ई. डंगा के युद्ध (मेड़ता) में महादजी सिंधिया के सेनानायक डी. बोइन ने विजयसिंह को पराजित किया।
इस युद्ध के परिणामस्वरूप सांभर की संधि हुई जिसके तहत विजयसिंह ने अजमेर शहर तथा 60 लाख रुपये मराठों काे देना स्वीकार किया।
विजयसिंह पर अपनी पासवान गुलाबराय का अत्यधिक प्रभाव था तथा समस्त शासनकार्य उसके अनुसार ही चलते थे। इस कारण वीर विनाेद के रचयिता श्यामदास ने विजयसिंह को ‘जहाँगीर का नमूना’ कहा है।
गुलाबराय ने गुलाबसागर तालाब, कुजंबिहारी का मंदिर तथा जालौर दुर्ग के महल आदि का निर्माण करवाया।
बारहठ विशनसिंह ने ‘विजय विलास’ नामक ग्रंंथ की रचना की।


महाराजा भीमसिंह (1793-1803 ई.)

महाराजा विजयसिंह की मृत्यु के बाद भीमसिंह मारवाड़ के शासक बने।
इनका स्वभाव क्रूर तथा उग्र था तथा इन्होंने सिंहासन पर बैठते ही अपने विरोधी भाइयों की हत्या करवा दी।
भीमसिंह ने मण्डाेर के अपूर्ण अजीत सिंह के स्मारक को पूर्ण करवाया।
इनके समय भट्‌ट हरिवंश ने ‘भीम प्रबंध’ तथा कवि रामकर्ण ने ‘अलंकार समुच्चय’ की रचना की।


महाराजा मानसिंह (1803-1843 ई.)

1803 में उत्तराधिकार युद्ध के बाद मानसिंह जोधपुर सिंहासन पर बैठे। जब मानसिंह जालौर में मारवाड़ की सेना से घिरे हुए थे, तब गोरखनाथ सम्प्रदाय के गुरु आयस देवनाथ ने भविष्यवाणी की, कि मानसिंह शीघ्र ही जोधपुर के राजा बनेंगे। अतः राजा बनते ही मानसिंह ने आयस देवनाथ को जोधपुर बुलाकर अपना गुरु बनाया तथा वहां नाथ सम्प्रदाय के महामंदिर का निर्माण करवाया।
गिंगोली का युद्ध : मेवाड़ महाराणा भीमसिंह की राजकुमारी कृष्णा कुमारी के विवाह के विवाद में जयपुर राज्य की महाराजा जगतसिंह की सेना, पिंडारियों व अन्य सेनाओं ने संयुक्त रूप से जोधपुर पर मार्च, 1807 में आक्रमण कर दिया तथा अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर लिया। परन्तु शीघ्र ही मानसिंह ने पुनः सभी इलाकों पर अपना कब्जा कर लिया।
सन् 1817 ई. में मानसिंह को शासन का कार्यभार अपने पुत्र छत्रसिंह को सौंपना पड़ा। परन्तु छत्रसिंह की जल्दी ही मृत्यु हो गई। सन् 1818 में 16, जनवरी को मारवाड़ ने अंग्रेजों से संधि कर मारवाड़ की सुरक्षा का भार ईस्ट इंडिया कम्पनी को सौंप दिया।


महाराजा तख्तसिंह (1843-1873 ई.) :-

महाराजा मानसिंह के बाद तख्तसिंह जोधपुर के शासक बने।
तख्तसिंह के समय ही 1857 का विद्रोह हुआ जिसमें तख्तसिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया।
तख्तसिंह ने ओनाड़सिंह तथा राजमल लोढ़ा के नेतृत्व में आउवा सेना भेजी। आउवा के निकट बिथौड़ा नामक स्थान पर 8 सितम्बर, 1857 को युद्ध हुआ जिसमें जोधपुर की सेना की पराजय हुई।
तख्तसिंह ने राजपूत जाति में होने वाले कन्यावध को रोकने के लिए कठोर आज्ञाएं प्रसारित की तथा इनको पत्थरों पर खुदवाकर किलों के द्वारों पर लगवाया।
1870 ई. में अंग्रेजी सरकार ने जोधपुर राज्य के साथ नमक की संधि सम्पन्न की।
तख्तसिंह ने अजमेर में मेयो कॉलेज की स्थापना के लिए एक लाख रुपये का चंदा दिया।
तख्तसिंह ने जोधपुर दुर्ग में चामुंडा मंदिर का निर्माण करवाया।


महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय (1873-1895 ई.) :-

महाराजा तख्तसिंह के बाद जसवंत सिंह द्वितीय जोधपुर के शासक बने।
इन्होंने 1892 ई. में जोधपुर में जसवंत सागर का निर्माण करवाया।
जसवंत सिंह द्वितीय पर नन्ही जान नामक महिला का अत्यधिक प्रभाव था। इस समय स्वामी दयानंद सरस्वती जोधपुर आये थे। एक दिन स्वामी जी ने जसवंत सिंह द्वितीय को नन्ही जान की पालकी को अपने कंधे पर उठाये देखा जिससे स्वामीजी नाराज हुए तथा जसवंत सिंह द्वितीय को धिक्कारा।
इससे नाराज होकर नन्ही जान ने महाराजा के रसोइये गौड मिश्रा के साथ मिलकर दयानंद सरस्वती को विष दे दिया।
इसके बाद स्वामीजी अजमेर आ गए जहाँ 30 अक्टूबर, 1883 को उनकी मृत्यु हो गई।
1873 ई. में जसवंतसिंह द्वितीय ने राज्य प्रबंध तथा प्रजाहित के लिए ‘महकमा खास’ की स्थापना की।
1882 ई. में इन्होंने ‘काेर्ट – सरदारन’ नामक न्यायालय की स्थापना की।
महारानी विक्टोरिया के शासन के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में जसवंत सिंह द्वितीय के प्रधानमंत्री प्रतापसिंह ने जोधपुर में जुबली कोर्ट परिसर का निर्माण करवाया।
जसवंत सिंह द्वितीय के समय बारहठ मुरारीदान ने ‘यशवंत यशोभूषण’ नामक ग्रंथ की रचना की।


महाराजा सरदारसिंह (1895-1911 ई.)

1895 ई. में सरदारसिंह जोधपुर के शासक बने।
चीन के बाॅक्सर युद्ध में सरदारसिंह ने अपनी सेना चीन भेजी तथा इस कार्य के लिए जोधपुर को अपने झंडे पर ‘चाइना-1900’ लिखने का सम्मान प्रदान किया गया।
1910 ई. में सरदारसिंह ने ‘एडवर्ड-रिलीफ फण्ड’ स्थापित किया जिसमें असमर्थ लोगों के लिए पेंशन का प्रबंध किया गया।
इन्होंने देवकुंड के तट पर अपने पिता जसवंत सिंह द्वितीय के स्मारक ‘जसवंत थड़ा’ का निर्माण करवाया।
इसी देवकुंड के तट पर जसवंत सिंह II तथा उनके बाद के नरेशों की अत्येष्टि यहाँ की जाने लगी।
इनके शासनकाल में सरदार समंद तथा हेमावास बांध के निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ।
1910 में इनके समय डिंगल भाषा की कविताओं आदि का संग्रहण करने हेतु ‘बौद्धिक रिसर्च कमेटी’ की स्थापना की गई।
सरदारसिंह घुड़दौड़, शिकार तथा पोलो खेलने के शौकीन थे। इनके शौक के कारण उस समय जोधपुर को ‘पोलो का घर’ कहा जाता था।


महाराजा सुमेरसिंह (1911-1918 ई.)

सरदारसिंह के देहांत के बाद सुमेरसिंह जोधपुर के शासक बने।
इनकी आयु कम होने के कारण शासन प्रबंध के लिए रीजेंसी काउंसिल की स्थापना की गई तथा प्रतापसिंह को इसका रीजेंट बनाया गया।
1912 ई. में जोधपुर में ‘चीफ कोर्ट’ की स्थापना हुई।
प्रथम विश्वयुद्ध के समय महाराजा सुमेरसिंह तथा प्रतापसिंह अपनी सेना सहित अंग्रेजों की सहायता के लिए लंदन पहुँचे तथा फ्रांस के मोर्चो पर भी युद्ध करने पहुँचे।
सुमेरसिंह के समय ‘सुमेर कैमल कोर’ की स्थापना की गई।
जोधपुर के अजायबघर का नाम महाराजा सरदारसिंह के नाम पर ‘सरदार म्यूजियम’ रखा गया।


महाराजा उम्मेद सिंह (1918-1947 ई.) :-

महाराजा सुमेरसिंह के देहांत के पश्चात उनके छोटे भाई उम्मेदसिंह जोधपुर के शासक बने।
इस समय उम्मेदसिंह को शासनाधिकार तो दिए गए लेकिन वास्तविक शक्तियां ब्रिटिश सरकार के अधीन थी।
मारवाड़ के तत्कालीन चीफ मिनिस्टर सर डोनाल्ड फील्ड को ‘डीफैक्टो रूलर ऑफ जोधपुर स्टेट’ कहा जाता था।
1923 में उम्मेदसिंह के राज्याभिषेक के समय भारत के वायसराय लॉर्ड रीडिंग जोधपुर आये थे।
महाराजा उम्मेदसिंह ने ‘उम्मेद भवन पैलेस’ (1929-1942 ई.) का निर्माण करवाया जो ‘छीतर पैलेस’ के नाम से भी जाना जाता है। इस पैलेस के वास्तुविद विद्याधर भट्टाचार्य तथा सैमुअल स्विंटन जैकब थे तथा यह ‘इंडो-कोलोनियल’ कला में निर्मित है।
उम्मेदसिंह ने 24 जुलाई, 1945 को जोधपुर में विधानसभा के गठन की घोषणा की।


महाराजा हनुवंत सिंह (जून, 1947- मार्च, 1949)

महाराजा उम्मेदसिंह के देहांत के बाद हनुवंत सिंह शासक बने।
हनुवंत सिंह जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में शामिल करने के इच्छुक थे तथा ये मुहम्मद अली जिन्ना से मिलने पाकिस्तान भी गये।
वी.पी. मेनन तथा वल्लभ भाई पटेल के समझाने पर हनुवंत सिंह भारतीय संघ में शामिल होने के लिए तैयार हुए।
30 मार्च, 1949 को जोधपुर का संयुक्त राजस्थान में विलय कर दिया गया ।


{2 } बीकानेर के राठौड़ (bikaner ka rathore vansh)

राव बीका (1465-1504 ई.)

बीकानेर के राठौड़ वंश का संस्थापक राव जोधा का पुत्र राव बीका था।
राव बीका ने करणी माता के आशीर्वाद से 1465 ई. में जांगल प्रदेश में राठौड़ वंश की स्थापना की तथा सन् 1488 ई. में नेरा जाट के सहयोग से बीकानेर (राव बीका तथा नेरा जाट के नाम को संयुक्त कर नाम बना) नगर की स्थापना की।
राव बीका ने जोधपुर के राजा राव सुजा को पराजित कर राठौड़ वंश के सारे राजकीय चिह्न छीनकर बीकानेर ले गये।
राव बीका की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र ‘नरा‘ बीकानेर का शासक बना।


राव लूणकरण (1504-1526 ई.)

अपने बड़े भाई राव नरा की मृत्यु हो जाने के कारण राव लूणकरण राजा बना।
राव लूणकरण बीकानेर का दानी, धार्मिक, प्रजापालक व गुणीजनों का सम्मान करने वाला शासक था। दानशीलता के कारण बीठू सूजा ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ राव जैतसी रो छन्द में इसे ‘कर्ण‘ अथवा ‘कलियुग का कर्ण‘ कहा है।
सन् 1526 ई. में इसने नारनौल के नवाब पर आक्रमण कर दिया परन्तु धौंसा नामक स्थान पर हुए युद्ध में लूणकरण वीरगति को प्राप्त हुआ।
‘कर्मचन्द्रवंशोंत्कीकर्तनंक काव्यम्‘ में लूणकरण की दानशीलता की तुलना कर्ण से की गई है।


राव जैतसी (1526-1541 ई.)

बाबर के उत्तराधिकारी कामरान ने 1534 ई. में भटनेर पर अधिकार करके राव जैतसी को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा परन्तु जैतसी ने अपनी बड़ी सेना के साथ 26 अक्टूबर, 1534 को अचानक कामरान पर आक्रमण कर दिया और उन्हें गढ़ छोड़ने के लिए बाध्य किया।
बीकानेर का शासक राव जैतसी मालदेव (मारवाड़) के साथ पहोबा के युद्ध (1541 ई.) में वीरगति को प्राप्त, इस युद्ध का वर्णन बीठू सूजा के प्रसिद्ध ग्रन्थ राव जैतसी रो छन्द में मिलता है।


राव कल्याणमल (1544-1574 ई.)

राव कल्याणमल, राव जैतसी का पुत्र था जो जैतसी की मृत्यु के समय सिरसा में था।
1544 ई. में गिरी सुमेल के युद्ध में शेरशाह सूरी ने मारवाड़ के राव मालदेव को पराजित किया, इस युद्ध में कल्याणमल ने शेरशाह की सहायता की थी तथा शेरशाह ने बीकानेर का राज्य राव कल्याणमल को दे दिया।
कल्याणमल ने नागौर दरबार (1570 ई.) मे अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।
अकबर ने नागौर के दरबार के बाद सन् 1572 ई. में कल्याणमल के पुत्र रायसिंह को जोधपुर की देखरेख हेतु उसे प्रतिनिधि बनाकर जोधपुर भेज दिया।
कवि पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) कल्याणमल का ही पुत्र था।
पृथ्वीराज राठौड़ की प्रसिद्ध रचना ‘बेलि क्रिसन रूकमणी री’ है, कवि दुरसा आढ़ा ने इस रचना को पाँचवा वेद एवं 19वाँ पुराण कहा है। इटालियन कवि डॉ. तेस्सितोरी ने कवि पृथ्वीराज राठौड़ को ‘डिंगल का होरेस’ कहा है।
अकबर ने कवि पृथ्वीराज राठौड़ को गागरोन का किला जागीर में दिया था।


महाराजा रायसिंह (1574-1612 ई.)

कल्याणमल का उत्तराधिकारी रायसिंह बना जिसे दानशीलता के कारण प्रसिद्ध इतिहासकार मुंशी देवीप्रसाद ने ‘राजपूताने का कर्ण‘ कहा है।
अकबर ने इसे महाराजा की पदवी प्रदान की।
बीकानेर का शासक बनते ही रायसिंह ने ‘महाराजाधिराज‘ और महाराजा की उपाधियाँ धारण की। बीकानेर के राठौड़ नरेशों में रायसिंह पहला नरेश था जिसने इस प्रकार की उपाधियाँ धारण की थी।
मुगल बादशाह अकबर ने रायसिंह को सर्वप्रथम जोधपुर का अधिकारी नियुक्त किया था।
रायसिंह ने अपने मंत्री कर्मचन्द की देखरेख में राव बीका द्वारा बनवाये गये पुराने (जूना) किले पर ही नये किले जूनागढ़ का निर्माण सन् 1594 में करवाया। किले के अन्दर रायसिंह ने एक प्रशस्ति भी लिखवाई जिसे अब ‘रायसिंह प्रशस्ति‘ कहते हैं। किले के मुख्य प्रवेश द्वार सूरजपोल के बाहर जयमल-पत्ता की हाथी पर सवार पाषाण मूर्तियाँ रायसिंह ने ही स्थापित करवाई। इस दुर्ग में राजस्थान की सबसे पहली लिफ्ट स्थित है।
रायसिंह द्वारा सिरोही के देवड़ा सुरताण व जालौर के ताज खाँ को भी पराजित किया।
रायसिंह ने ‘रायसिंह महोत्सव’ व ‘ज्योतिष रत्नमाला’ ग्रन्थ की रचना की।
‘कर्मचन्द्रवंशोकीर्तनकंकाव्यम’ में महाराजा रायसिंह को राजेन्द्र कहा गया है तथा लिखा गया है कि वह हारे हुए शत्रुओं के साथ बड़े सम्मान का व्यवहार करता था।
इसके समय मंत्री कर्मचन्द ने उसके पुत्र दलपत सिंह को गद्दी पर बिठाने का षड़यंत्र किया तो रायसिंह ने ठाकुर मालदे को कर्मचन्द को मारने के लिए नियुक्त किया परन्तु वह अकबर के पास चला गया।


महाराजा दलपत सिंह (1612-13 ई.) :-

महाराजा रायसिंह अपने ज्येष्ठ पुत्र दलपत सिंह के बजाय सूरसिंह को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे परन्तु जहाँगीर ने दलपतसिंह को बीकानेर का शासक घोषित कर दिया।
दलपत सिंह का आचरण साम्राज्य विरोधी होने के कारण जहाँगीर ने इन्हें मृत्युदण्ड दिया तथा सूरसिंह को टीका भेजकर बीकानेर का शासक घोषित किया।


महाराजा सूरसिंह (1613-1631 ई.) :-

दलपत सिंह के बाद उनके भाई सूरसिंह बीकानेर के शासक बने।
जब खुर्रम ने विद्रोह किया तब जहाँगीर ने उसके विरूद्ध सूरसिंह को भेजा जिसमें इन्हें सफलता मिली।
इन्होंने जहाँगीर तथा शाहजहाँ के समय मुगलों को अपनी सेवाएं प्रदान की।


महाराजा कर्णसिंह (1631-1669 ई.)

सूरसिंह के पुत्र कर्णसिंह को औरंगजेब ने जांगलधर बादशाह की उपाधि प्रदान की।
कर्णसिंह ने विद्वानों के सहयोग से साहित्यकल्पदुम ग्रन्थ की रचना की।
1644 ई. में बीकानेर के कर्णसिंह व नागौर के अमरसिंह राठौड़ के बीच ‘मतीरा री राड़‘ नामक युद्ध हुआ।
इसके आश्रित विद्वान गंगानन्द मैथिल ने कर्णभूषण एवं काव्यडाकिनी नामक ग्रन्थों की रचना की।


महाराजा अनूपसिंह (1669-1698 ई.)

महाराजा अनूपसिंह द्वारा दक्षिण में मराठों के विरूद्ध की गई कार्यवाहियों से प्रसन्न होकर औरंगजेब ने इन्हें ‘महाराजा‘ एवं ‘माही भरातिव‘ की उपाधि से सम्मानित किया।
महाराज अनूपसिंह एक प्रकाण्ड विद्वान, कूटनीतिज्ञ, विद्यानुरागी एवं संगीत प्रेमी थे। इन्होंने अनेक संस्कृत ग्रन्थों – अनूपविवेक, काम-प्रबोध, अनूपोदय आदि की रचना की। इनके दरबारी विद्वानों ने अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की थी। इनमें मणिराम कृत ‘अनूप व्यवहार सागर‘ एवं ‘अनूपविलास‘, अनंन भट्ट कृत ‘तीर्थ रत्नाकर‘ तथा संगीताचार्य भावभट्ट द्वारा रचित ‘संगीत अनूपाकुंश‘, ‘अनूप संगीत विलास‘, ‘अनूप संगीत रत्नाकर‘ आदि प्रमुख हैं। उसने दक्षिण भारत से अनेकानेक ग्रन्थ लाकर अपने पुस्तकालय में सुरक्षित किये। अनूप पुस्तकालय में वर्तमान में बड़ी संख्या में ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण ग्रन्थों का संग्रह मौजूद है। दयालदास की ‘बीकानेर रा राठौड़ां री ख्यात‘ में जोधपुर व बीकानेर के राठौड़ वंश का वर्णन है।
अनूपसिंह द्वारा दक्षिण में रहते हुए अनेक मूर्तियाँ का संग्रह किया व नष्ट होने से बचाया। यह मूर्तियों का संग्रह बीकानेर के पास ‘तैंतीस करोड़ देवताओं के मंदिर‘ में सुरक्षित है।
महाराजा सूरजसिंह

16 अप्रेल, 1805 को मंगलवार के दिन भाटियों को हराकर इन्होंने भटनेर को बीकानेर राज्य में मिला लिया तथा भटनेर का नाम हनुमानगढ़ रख दिया (क्योंकि इन्होंने हनुमानजी के वार मंगलवार को यह जीत हासिल की थी)।


महाराजा स्वरूपसिंह (1698-1700 ई.)

अनूपसिंह की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र स्वरूपसिंह नौ वर्ष की आयु में बीकानेर के शासक बने।
स्वरूपसिंह औरगांबाद तथा बुरहानपुर में नियुक्त थे तब राजकार्य उनकी माता सिसोदणी संभालती थी।


महाराजा सुजानसिंह (1700-1735 ई.)

महाराजा स्वरूपसिंह के बाद सुजानसिंह बीकानेर के शासक बने।
इन्होंने मुगलों की सेवा दक्षिण में रहकर की। इस समय जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह ने बीकानेर पर आक्रमण किया लेकिन ठाकुर पृथ्वीराज तथा हिन्दूसिंह (तेजसिंह) ने इसका डटकर सामना किया जिस कारण जोधपुर की सेना को वापस लौटना पड़ा।
मथेरण जोगीदास ने वरसलपुर विजय (महाराजा सुजानसिंह रो रासो) नामक ग्रंथ की रचना की।


महाराजा जोरावर सिंह (1736-1746 ई.)

मंुशी देवी प्रसाद के अनुसार जोरावर सिंह संस्कृत भाषा के अच्छे कवि थे तथा इनके दाे ग्रंथ वैद्यकसागर तथा पूजा पद्धति बीकानेर के पुस्तकालय में है।
इनकी माता सीसोदिणी ने बीकानेर में चतुर्भुज मंदिर का निर्माण करवाया।


महाराजा गजसिंह (1746-1787 ई.)

इनके शासनकाल में बीदासर के नजदीक दड़ीबा गाँव में तांबे की खान का पता चला।
1757 ई. में गजसिंह ने नौहरगढ़ की नींव रखी।
बादशाह अहमदशाह ने इन्हें ‘माहीमरातिब’ की उपाधि प्रदान की।
चारण गाडण गोपीनाथ ने गजसिंह की प्रशंसा में ‘महाराज गजसिंह रौ रूपक’ नामक ग्रंथ की रचना की। इसके अतिरिक्त सिंढायच फतेराम ने ‘महाराज गजसिंह रौ रूपक’ तथा ‘महाराज गजसिंह रा गीतकवित दूहा’ नामक ग्रंथ की रचना की।
इनके बाद महाराजा राजसिंह बीकानेर के शासक बने। इनकी मृत्यु पर इनके सेवक मंडलावत संग्राम सिंह ने इनकी चिता में प्रवेश करके अपने प्राणों का त्याग किया।
राजसिंह के बाद प्रतापसिंह बीकानेर के शासक बने लेकिन इनका शासनकाल बहुत कम समय तक रहा।


महाराजा सूरतसिंह (1787-1828 ई.)

सूरतसिंह ने 1799 ई. में सूरतगढ़ का निर्माण करवाया।
इनके समय जॉर्ज टॉमस ने बीकानेर पर आक्रमण किया लेकिन दोनों पक्षों के बीच समझौता होने से यह युद्ध बंद हो गया।
1805 ई. में अमरचंद सुराणा के नेतृत्व में इनका भटनेर पर अधिकार हुआ तथा मंगलवार के दिन अधिकार होने के कारण इसका नाम हनुमानगढ़ रखा गया।
1807 ई. के गिंगोली के युद्ध में महाराजा सूरतसिंह ने जयपुर की सेना का साथ दिया था।
अंग्रेजों के साथ 1818 ई. की सहायक संधि महाराजा सूरतसिंह के समय इनकी ओर से ओझा काशीनाथ ने सम्पन्न की।


महाराजा रतनसिंह (1828-1851 ई.)

महाराजा सूरतसिंह के बाद इनके ज्येष्ठ पुत्र रतनसिंह बीकानेर के शासक बने।
1829 ई. में बीकानेर व जैसलमेर के मध्य वासणपी का युद्ध हुआ जिसमें बीकानेर राज्य की पराजय हुई। इस युद्ध में अंग्रेजों ने मेवाड़ के महाराणा जवानसिंह को मध्यस्थ बनाकर दोनों पक्षों में समझौता करवाया।
बादशाह अकबर द्वितीय ने रतनसिंह को ‘माहीमरातिब’ का खिताब प्रदान किया।
रतनसिंह ने राजपूत कन्याओं को न मारने के संबंध में नियम बनाये।
रतनसिंह ने राजरतन बिहारी का मंदिर बनवाया।
बीठू भोमा ने रतनविलास तथा सागरदान करणीदानोत ने रतनरूपक नामक ग्रंथ की रचना की।


महाराजा सरदारसिंह (1851-1872 ई.)

इनके समय राजस्थान में 1857 की क्रांति हुई जिसमें सरदारसिंह ने अंग्रेजों की सहायता की तथा अपनी सेना सहित विद्रोह के स्थानों पर पहुँचकर विद्रोहियों का दमन किया।
यह राजस्थान के एकमात्र शासक थे जिन्होंने राजस्थान से बाहर (पंजाब) जाकर विद्रोहियों का दमन किया।
1854 ई. में सरदारसिंह ने सतीप्रथा तथा जीवित समाधि प्रथा पर रोक लगवायी।
सरदारसिंह ने जनहित के लिए अनेक कानूनों का निर्माण करवाया तथा महाजनों से लिया जाने वाला बाछ कर माफ कर दिया।
सरदारसिंह ने अपने सिक्कों से मुगल बादशाह का नाम हटाकर महारानी विक्टोरिया का नाम अंकित करवाया।


महाराजा डूंगरसिंह (1872-1887 ई.)

महाराजा सरदारसिंह के कोई पुत्र नहीं होने के कारण कुछ समय तक शासन कार्य कप्तान बर्टन की अध्यक्षता वाली समिति ने किया।
वायसराय लॉर्ड नॉर्थब्रुक की स्वीकृति से कप्तान बर्टन ने डूंगरसिंह को बीकानेर का शासक बनाया।
डूंगरसिंह ने अंग्रेजों व अफगानिस्तान के मध्य हुए युद्ध में अंग्रेजों की सहायता की।
इन्होंने अंग्रेजों के साथ नमक समझौता किया।
डूंगरसिंह ने बीकानेर किले का जीर्णोद्वार करवाया तथा इसमें सुनहरी बुर्ज, गणपति निवास, लाल निवास, गंगा निवास आदि महल बनवाये।


महाराजा गंगासिंह (1887-1943 ई.)

महाराजा डूंगरसिंह के बाद गंगासिंह बीकानेर के शासक बने।
गंगासिंह की शिक्षा अजमेर के मेयो कॉलेज से सम्पन्न हुई। इनके लिए पंडित रामचंद्र दुबे को शिक्षक नियुक्त किया गया।
गंगासिंह ने देवली की छावनी से सैनिक शिक्षा भी प्राप्त की।
इनके समय अंग्रेजों की सहायता से ‘कैमल कोर’ का गठन किया गया जो ‘गंगा िरसाला’ के नाम से भी जानी जाती थी।
इनके समय विक्रम संवत 1956 (1899-1900 ई.) में भीषण अकाल पड़ा जिसे छप्पनिया अकाल भी कहते हैं। इस समय गंगासिंह ने कई अकाल राहत कार्य करवाये तथा गजनेर झील खुदवाई गई।
1900 ई. में गंगासिंह गंगा रिसाला के साथ चीन के बॉक्सर युद्ध में सम्मिलित हुए।
गंगासिंह ने महारानी विक्टाेरिया की स्मृति में बीकानेर में विक्टोरिया मेमोरियल का निर्माण करवाया।
अंग्रेजों ने डूंगरसिंह के समय की गई नमक संधि को रद्द करके गंगासिंह के साथ नई नमक संधि सम्पन्न की।
1913 में गंगासिंह ने बीकानेर में प्रजा प्रतिनिधि सभा की स्थापना की।
गंगासिंह ने प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया तथा युद्ध के बाद सम्पन्न वर्साय की शांति संधि पर हस्ताक्षर किए।
गंगासिंह ने लंदन से भारत लौटते समय रोम में एक नोट लिखा जो ‘रोम नोट’ के नाम से प्रसिद्ध है।
1921 में भारतीय राजाओं को साम्राज्य का भागीदार बनाने के लिए नरेन्द्र मंडल की स्थापना की गई जिसमें गंगासिंह को प्रथम चांसलर बनाया गया तथा वे इस पद पर 1921 से 1925 तक रहे।
गंगासिंह ने बटलर समिति से यह मांग की कि उनके संबंध भारतीय सरकार से न मानकर इंग्लैण्ड के साथ माने जाए।
गंगासिंह ने 1927 में गंगनहर का निर्माण करवाया। गंगासिंह को राजपूताने का भागीरथ तथा आधुनिक भारत का भागीरथ कहा जाता है।
गंगासिंह को आधुनिक बीकानेर का निर्माता कहा जाता है।
गंगासिंह ने अपने पिता की स्मृति में लालगढ़ पैलेस का निर्माण करवाया। यह महल लाल पत्थर से बना है।
गंगासिंह ने रामदेवरा स्थित रामदेवजी के मंदिर का निर्माण करवाया।


महाराजा शार्दुल सिंह (1943-1949 ई.)

महाराजा गंगासिंह के बाद शार्दुलसिंह बीकानेर के शासक बने।
ये बीकानेर रियासत के अंतिम शासक थे।
इन्होंने 7 अगस्त, 1947 को ‘इस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर किए।
इनके समय बीकानेर रियासत का 30 मार्च, 1949 को संयुक्त राजस्थान में विलय कर दिया गया।
अन्य तथ्य

1818 ई. में बीकानेर के राजा सूरजसिंह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से सुरक्षा संधि कर ली और बीकानेर में शांति व्यवस्था कायम करने में लग गये।
1834 ई. में जैसलमेर व बीकानेर की सेनाओं की बीच बासणी की लड़ाई हुई।
राजस्थान के दो राज्यों के बीच हुई यह अंतिम लड़ाई थी।
1848 ई. में बीकानेर नरेश रतनसिंह ने मुल्तान के दीवान मूलराज के बागी होने पर उसके दमन में अंग्रेजों की सहायता की।
1857 ई. की क्रान्ति के समय बीकानेर के महाराजा सरदार सिंह थे जो अंग्रेजों के पक्ष में क्रान्तिकारियों का दमन करने के लिए राजस्थान के बाहर पंजाब तक गये।
बीकानेर के लालसिंह ऐसे व्यक्ति हुए जो स्वयं कभी राजा नहीं बने परन्तु जिसके दो पुत्र-डूंगरसिंह व गंगासिंह राजा बने।
बीकानेर के राजा डूंगरसिंह के समय 1886 को राजस्थान में सर्वप्रथम बीकानेर रियासत में बिजली का शुभारम्भ हुआ।
1927 ई. में बीकानेर के महाराज गंगासिंह (आधुनिक भारत का भगीरथ) राजस्थान में गंगनहर लेकर आये जिसका उद्घाटन वायसराय लॉर्ड इरविन ने किया।
गंगासिंह अपनी विख्यात गंगा रिसाला सेना के साथ द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों के पक्ष में युद्ध लड़ने के लिये ब्रिटेन गये।
बीकानेर रियासत के अंतिम राजा सार्दूलसिंह थे।


(3) किशनगढ़ के राठौड़ ( kishangadh ka rathore vansh)

किशनगढ़ में राठौड़ वंश की स्थापना जोधपुर शासक मोटराजा उदयसिंह के पुत्र किशनसिंह ने 1609 ई. में की।
इन्होंने सेठोलाव के शासक राव दूदा को पराजित कर यहाँ अपनी स्वतंत्र जागीर की स्थापना की।
मुगल शासक जहाँगीर ने इन्हें महाराजा की उपाधि प्रदान की।
1612 ई. में किशनसिंह ने किशनगढ़ नगर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया।
किशनसिंह की हत्या जोधपुर महाराजा सूरसिंह के पुत्र गजसिंह ने की।
किशनसिंह की छतरी अजमेर में घूघरा घाटी में स्थित है।
किशनसिंह के बाद सहलमल तथा इनके बाद जगमाल सिंह किशनगढ़ के शासक बने।

महाराजा स्वरूप सिंह

स्वरूपसिंह ने रूपनगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया।
इन्होंने बदख्शां में पठानों द्वारा किए गए विद्रोह को दबाया।
स्वरूपसिंह सामूगढ़ के युद्ध (1658 ई.) में औरगंजेब के विरूद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।


महाराजा मानसिंह

महाराजा स्वरूपसिंह के बाद मानसिंह किशनगढ़ के शासक बने।
इनकी बहन चारूमति का विवाह मुगल शासक औरगंजेब से तय हुआ था लेकिन मेवाड़ महाराणा राजसिंह ने चारूमति से विवाह कर लिया।

महाराजा राजसिंह

मानसिंह के बाद राजसिंह किशनगढ़ के शासक बने।
राजसिंह ने बाहुविलास तथा रसपाय नामक ग्रंथ लिखे तथा इनके काव्य गुरु महाकवि वृंद थे।
किशनगढ़ चित्रकला शैली के विकास में इनका विशेष योगदान रहा।


महाराजा सावंतसिंह

सावंतसिंह का राज्याभिषेक दिल्ली में सम्पन्न हुआ।
ये किशनगढ़ के प्रसिद्ध शासक हुए जिन्होंने कृष्णभक्ति में राज-पाट त्याग दिया तथा वृंदावन चले गये।
इन्होंने अपना नाम नागरीदास रख दिया।
इनकी प्रेयसी का नाम ‘बणी-ठणी’ था।
चित्रकार मोरध्वज निहालचंद ने ‘बणी-ठणी’ का चित्र बनाया जिसे भारत की मोनालिसा कहा जाता है।
सावंतसिंह के काल को किशनगढ़ चित्रशैली के विकास का स्वर्णकाल कहा जाता है।
महाराजा सावंत सिंह ने मनोरथ मंजरी, रसिक रत्नावली, बिहारी चंद्रिका तथा देहदशा आदि ग्रंथों की रचना की।
यहाँ के शासक सरदार सिंह के समय किशनगढ़ राज्य के दो हिस्से किए गए जिसमें रूपनगढ़ क्षेत्र सरदारसिंह को तथा किशनगढ़ क्षेत्र बहादुरसिंह को दिया गया।


महाराजा बिड़दसिंह

बहादूरसिंह के निधन के बाद बिड़दसिंह किशनगढ़ के शासक बने।
इनके समय किशनगढ़ तथा रूपनगढ़ को पुन: एकीकृत कर एक रियासत बनाया गया।


महाराजा कल्याणसिंह

कल्याणसिंह ने 1817 ई. में अंग्रेजों के साथ सहायक संधि सम्पन्न की।
अंग्रेजों ने किशनगढ़ से खिराज नहीं लेना स्वीकार किया।
कल्याणसिंह ने अपने पुत्र मौखम सिंह को राजकार्य सौंपकर स्वयं मुगल बादशाह की सेवा में दिल्ली चले गये।

महाराजा पृथ्वीसिंह

महाराजा मौखम सिंह के बाद पृथ्वीसिंह शासक बने।
इनके समय किशनगढ़ राज्य का पहला दीवान अभयसिंह को बनाया गया।
1857 के संग्राम के समय किशनगढ़ के शासक पृथ्वीसिंह थे।

महाराजा शार्दूलसिंह

महाराजा पृथ्वीसिंह के बाद उनके पुत्र शार्दुलसिंह किशनगढ़ के शासक बने।
इन्होंने अपने पुत्र मदनसिंह के नाम पर मदनगंज मण्डी की स्थापना की।
पृथ्वीसिंह के बाद मदनसिंह शासक बने जिन्होंने किशनगढ़ राज्य में फाँसी की सजा को समाप्त कर दिया।


महाराजा सुमेरसिंह

सुमेरसिंह वर्ष 1939 में किशनगढ़ राज्य के शासक बने।
सुमेरसिंह को आधुनिक साइकिल पोलो का पिता कहा जाता था।
25 मार्च,1948 को द्वितीय चरण में किशनगढ़ का विलय राजस्थान संघ में कर दिया गया।

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