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rajasthan history in hindi | आमेर का कच्छवाहा वंश

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‘कच्छवाहा‘ अपने आपको भगवान श्री राम के पुत्र ‘कुश‘ की संतान मानते हैं।
संस्थापक – दुलहराय (तेजकरण), मूलतः ग्वालियर निवासी था।
1137 ई. में उसने बड़गुजरों को हराकर नवीन ढूँढाड़ राज्य की स्थापना की।
दुलहराय के वंशज कोकिलदेव ने 1207 ई. में मीणाओं से आमेर जीतकर अपनी राजधानी बनाया, जो 1727 ई. तक कच्छवाहा वंश की राजधानी रहा।
इसी वंश के शेखा ने शेखावटी मे अपना अलग राज्य बनाया।


भारमल (1547-1574 ई.) या बिहारीमल

1547 ई. में भारमल आमेर का शासक बना।
भारमल प्रथम राजस्थानी शासक था, जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार की व 1562 ई. में अपनी पुत्री हरखाबाई उर्फ मानमति या शाही बाई (मरियम उज्जमानी) का विवाह अकबर से किया।
मुगल बादशाह जहाँगीर हरखाबाई का ही पुत्र था।


भगवन्त दास (1574-1589 ई.)

भगवन्त दास या भगवान दास भारमल का पुत्र था।
उसने अपनी पुत्री मानबाई (मनभावनी) का विवाह शहजादे सलीम (जहाँगीर) से किया। मानबाई को ‘सुल्तान निस्सा‘ की उपाधि प्राप्त थी।
खुसरो इसी का पुत्र था।


मानसिंह (1589-1614 ई.)

मानसिंह भगवन्त दास का पुत्र था।
मानसिंह आमेर के कच्छवाहा शासकों में सर्वाधिक प्रतापी एवं महान् राजा था।
मानसिंह ने 52 वर्ष तक मुगलों की सेवा की।
मानसिंह 1573 में अकबर के दूत के रूप में राणा प्रताप से मिला था।
1576 ई. में हल्दीघाटी युद्ध में उसने शाही सेना का नेतृत्व किया था।
अकबर ने उसे फर्जन्द (पुत्र) एवं राजा की उपाधि प्रदान की। वह अकबर के नवरत्नों में शामिल था।
मानसिंह ने बंगाल में ‘अकबर नगर‘ तथा बिहार में ‘मानपुर नगर‘ को बसाया।
मानसिंह स्वयं कवि, विद्वान, साहित्य प्रेमी व विद्वानों का आश्रयदाता था।
शिलादेवी (आमेर), जगत शिरोमणी (आमेर) गोविन्द देवजी (वृंदावन) मंदिर उसी ने बनवाये थे।

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जयसिंह प्रथम या मिर्जा राजा जयसिंह (1621-1667 ई.)

इसने तीन मुगल बादशाहों जहाँगीर, शाहजहां व औरंगजेब को अपनी सेवाएँ दी।
उसने औरंगजेब की तरफ से शिवाजी को सन्धि के लिए बाध्य किया। यह सन्धि इतिहास में पुरन्दर की सन्धि (जून 1665 ई.) के नाम से प्रसिद्ध है।
उसकी योग्यता एवं सेवाओं से प्रसन्न होकर शाहजहाँ ने उसे ‘मिर्जा राजा‘ की उपाधि प्रदान की।
बिहारी सतसई के रचयिता कवि बिहारी उसके दरबारी कवि थे।
बिहारी का भांजा कुलपति मिश्र भी बड़ा विद्वान था, जिसने 52 ग्रन्थों की रचना की इनका दरबारी था।
इनकी मृत्यु बुरहानपुर के पास हुई थी।


महाराजा रामसिंह प्रथम (1667-1689 ई.) :-

मिर्जाराजा जयसिंह की मृत्यु के पश्चात् रामसिंह आमेर के शासक बने।
औरगंजेब ने रामसिंह की निगरानी में शिवाजी को महल में कैद रखा था लेकिन शिवाजी वहाँ से भाग निकले।
1669 ई. में औरगंजेब ने इन्हें आसाम विद्रोह का दमन करने के लिए भेजा।
रामसिंह को विद्रोह का दमन करने के लिए काबुल भेजा गया जहाँ 1689 ई. में इनकी मृत्यु हो गई।


महाराजा बिशनसिंह (1689-1700 ई.) :-

रामसिंह के बाद इनका पौत्र बिशनसिंह (विष्णुसिंह) आमेर का शासक बना क्योंकि इनके पुत्र किशनसिंह का दक्षिण में रहते हुए देहांत हो गया था।
इन्होंने सिनसिनी के जाटों के विद्रोह का दमन किया तथा उसके बाद उन्हें मुल्तान भेजा गया जहाँ इन्होेंने सक्खर का दुर्ग जीता।
बिशनसिंह मुअज्ज्म के साथ काबुल में पठानों के विद्रोह को दबाने के लिए गए जहाँ इनका देहांत हो गया।


जयसिंह द्वितीय या सवाई जयसिंह (1700-1743 ई.)

इनका वास्तविक नाम विजयसिंह था।
बादशाह औरंगजेब ने उसकी वाकपटुता से प्रभावित होकर उसकी तुलना जयसिंह प्रथम से की तथा उसे जयसिंह प्रथम से भी अधिक योग्य अर्थात् सवाया जानकर विजयसिह का नाम बदलकर सवाई जयसिंह कर दिया।
सवाई जयसिंह ने मुगलों के लिए तीन बार मराठों से युद्ध किये।
सवाई जयसिंह द्वारा जाटों पर मुगलों की विजय होने के उपलक्ष्य में बादशाह मुहम्मद शाह ने जयसिंह को राज राजेश्वर, राजाधिराज, सवाई की उपाधि प्रदान की।
सवाई जयसिंह ने मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय से मिलकर 1734 ई. में हुरड़ा (भीलवाड़ा) मे राजस्थान के राजपूत राजाओं का सम्मेलन आयोजित किया जिसका उद्देश्य सामुहिक शक्ति द्वारा मराठा आक्रमण को रोकना था।
वह संस्कृत, फारसी, गणित एवं ज्योतिष का प्रकाण्ड विद्वान था उसे ‘ज्योतिष शासक’ भी कहा गया है।
उसने ‘जयसिंह कारिका’ नामक ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की।
उसने जयपुर, दिल्ली, बनारस, उज्जैन व मथुरा में वैध शालाए बनवायी जिसमें सबसे बड़ी वेधशाला (जंतर-मंतर) जयपुर की है तथा सर्वप्रथम वेधशाला दिल्ली की है।
उसने 18 नवम्बर, 1727 ई. में जयपुर नगर की स्थापना की। जयपुर का प्रधान वास्तुकार बंगाली ब्राह्मण विद्याद्यर भट्टाचार्य था।
नाहरगढ़ दुर्ग, जयनिवास महल का निर्माण भी करवाया।
सवाई जयसिंह के समय ही आमेर राज्य का सर्वाधिक विस्तार हुआ।
वह अंतिम हिन्दू शासक था जिसने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन करवाया। इस यज्ञ का पुरोहित पुण्डरीक रत्नाकर था।
मुगल बादशाह बहादुर शाह ने सवाई जयसिंह को आमेर की गद्दी से अपदस्थ करके विजय सिंह को आमेर का शासक बनाया तथा आमेर का नाम ‘मोमिनाबाद‘ रखा था।
पुण्डरीक रत्नाकर ने ‘जयसिंह कल्पदुम‘ नामक पुस्तक लिखी।


सवाई ईश्वरी सिंह (1743-1750 ई.)

महाराजा सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र ईश्वरीसिंह ने राजकाज संभाला। परन्तु उनके भाई माधोसिंह ने राज्य प्राप्त करने हेतु मराठों एवं कोटा-बून्दी की संयुक्त सेना के साथ जयपुर पर आक्रमण कर दिया।
बनास नदी के पास 1747 ई. में राजमहल (टोंक) स्थान पर हुए युद्ध में ईश्वरीसिंह की विजय हुई, जिसके उपलक्ष्य में उन्होंने जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में एक ऊंची मीनार ईसरलाट (वर्तमान सरगासूली) का निर्माण कराया।
1750 ई. में मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर ने पुनः जयपुर पर आक्रमण किया। तब सवाई ईश्वरीसिंह ने आत्महत्या कर ली।


महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम (1750-1768 ई.)

जयपुर महाराजा ईश्वरीसिंह द्वारा आत्महत्या कर लेने पर माधोसिंह जयपुर की गद्दीपर बैठे।
माधोसिंह के राजा बनने के बाद मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर एवं जय अप्पा सिंधिया ने इससे भारी रकम की मांग की, जिसके न चुकाने पर मराठा सैनिकों ने जयपुर में उपद्रव मचाया, फलस्वरूप नागरिकों ने व्रिदोह कर मराठा सैनिकों का कत्लेआम कर दिया।
महाराजा माधोसिंह ने मुगल बादशाह अहमदशाह एवं जाट महाराजा सूरजमल (भरतपुर) एवं अवध नवाब सफदरजंग के मध्य समझौता करवाया। इसके परिणामस्वरूप बादशाह ने रणथम्भौर किला माधोसिंह को दे दिया। इससे नाराज हो कोटा महाराजा शत्रुसाल ने जयपुर पर आक्रमण कर नवम्बर, 1761 ई. में भटवाड़ा के युद्ध में जयपुर की सेना को हराया।
1768 ई. में इनकी मृत्यु हो गई। इन्होंने जयपुर में मोती डूंगरी पर महलों का निर्माण करवाया।


सवाई प्रतापसिंह (1778-1803 ई.)

महाराजा पृथ्वीसिंह की मृत्यु होने पर उनके छोटे भाई प्रतापसिंह ने 1778 ई. में जयपुर का शासन संभाला। इनके काल में अंग्रेज सेनापति जॉर्ज थॉमस ने जयपुर पर आक्रमण किया।
मराठा सेनापति महादजी सिंधिया को भी जयपुर राज्य की सेना ने जोधपुर नेरश महाराणा विजयसिंह के सहयोग से जुलाई, 1787 में तुंगा के मैदान में बुरी तरह पराजित किया।
प्रतापसिंह जीवन भर युद्धों में उलझे रहे फिर भी उनके काल में कला साहित्य में अत्यधिक उन्नति हुई। वे विद्वानों एवं संगीतज्ञों के आश्रयदाता होने के साथ-साथ स्वयं भी ब्रजनिधि नाम से काव्य रचना करते थे।
इन्होंने जयपुर में एक संगीत सम्मेलन करवाकर ‘राधागोविंद संगीत सार’ गंथ की रचना करवाई।


महाराजा जगतसिंह द्वितीय (1803-1818 ई.) :-

महाराजा सवाई प्रतापसिंह के बाद जगतसिंह द्वितीय जयपुर के शासक बने।
मेवाड़ महाराणा भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी का विवाह जोधपुर शासक भीमसिंह से तय हुआ परन्तु उनकी मृत्यु हो जाने के कारण कृष्णाकुमारी का विवाह जयपुर के जगतसिंह II के साथ तय हुआ। जोधपुर शासक मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा तथा 1807 ई. में गिंगोली का युद्ध हुआ जिसमें जयपुर की सेना ने जोधपुर की सेना को पराजित किया।
जगतसिंह II पर नर्तकी रसकपुर का काफी प्रभाव था।
1818 ई. में जगतसिंह II ने मराठों तथा पिण्डारियों से राज्य की रक्षा करने हेतु ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि की।

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महाराजा जयसिंह तृतीय (1818-1835 ई.) :-

जगतसिंह II की मृत्यु के समय इनका कोई वारिस नहीं होने के कारण नरवर के जागीरदार मोहनसिंह को शासक बनाया गया।
जगतसिंह II की मृत्यु के समय इनकी भटियाणी रानी गर्भवती थी जिसने कुंवर जयसिंह को जन्म दिया।
इसके बाद जयसिंह को जयपुर के सिंहासन पर बिठाया गया।
इनके समय इनकी माता भटियाणी रानी तथा रूपा बढ़ारण का हस्तक्षेप अधिक रहा।
1835 ई. में इनका अल्पायु में देहांत हो गया।


महाराजा रामसिंह द्वितीय (1835-1880 ई.)

महाराजा रामसिंह को नाबालिग होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने अपने संरक्षण में ले लिया। इनके समय मेजर जॉन लुडलो ने जनवरी, 1843 ई. में जयपुर का प्रशासन संभाला सरकार ने अपने संरक्षण में ले लिया।
इनके समय मेजर जॉन लुडलो ने जनवरी, 1843 ई. में जयपुर का प्रशासन संभाला तथा उन्होंने सतीप्रथा, दास प्रथा एवं कन्या वध, दहेज प्रथा आदि पर रोक लगाने के आदेश जारी किये।
महाराजा रामसिंह को वयस्क होने के बाद शासन के समस्त अधिकार दिये गये। 1857 ई. के स्वतंत्रता आन्दोलन में महाराजा रामसिंह ने अंग्रेजों की भरपूर सहायता की। अंगेजी सरकार ने इन्हें सितार-ए-हिन्द की उपाधि प्रदान की।
1870 ई. में गवर्नर जनरल एवं वायसराय लॉर्ड मेयो ने जयपुर एवं अजमेर की यात्रा की।
दिसम्बर, 1875 ई. में गवर्नर जनरल नार्थब्रुक तथा फरवरी, 1876 ई. प्रिंस अल्बर्ट ने जयपुर की यात्रा की। उनकी यात्रा की स्मृति में जयपुर में अल्बर्ट हॉल (म्यूजियम) का शिलान्यास प्रिंस अल्बर्ट के हाथों करवाया गया तथा जयपुर को गुलाबी रंग (1835 – 1880 ई.) से रंगवाया ।
इनके समय सन् 1845 में जयपुर में महाराजा कॉलेज तथा संस्कृत कॉलेज का निर्माण हुआ। महाराजा रामसिंह के काल में जयपुर की काफी तरक्की हुई। 1880 ई. में इनका निधन हो गया।
जयपुर के सवाई प्रतापसिंह ने 1799 ई. में हवामहल का निर्माण करवाया। हवामहल में 953 खिड़कियाँ है तथा यह पाँच मंजिला है।


सवाई माधोसिंह द्वितीय (1880-1922 ई.):-

सवाई रामसिंह द्वितीय के देहांत के पश्चात माधोसिंह द्वितीय जयपुर के शासक बने।
1902 ई. में माधोसिंह II ब्रिटिश सम्राट एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक में शामिल होने इंग्लैंड गये तब वे अपने साथ गंगा जल से भरे हुए चांदी के दो विशाल जार लेकर गये थे।
ये जार विश्व के सबसे बड़े जार है जो गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।
इन्होंने मदनमोहन मालवीय का जयपुर में भव्य स्वागत किया तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए 5 लाख रुपये दिये।
माधोसिंह द्वितीय ने जयपुर के सिटी पैलेस में मुबारक महल का निर्माण करवाया जो इस्लामिक तथा ईसाई शैली में निर्मित है।
इन्होंने नाहरगढ़ दुर्ग में अपनी नौ पासवानों के लिए नौ सुन्दर महलों का निर्माण करवाया।
माधोसिंह II ने वृंदावन में माधव बिहारी जी के मंदिर का निर्माण करवाया।
माधोसिंह II के कोई पुत्र न हाेने पर इन्होंने ईसरदा के ठाकुर सवाईसिंह के पुत्र मोरमुकुट सिंह को गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।


सवाई मानसिंह द्वितीय (1922-1949 ई.)

महाराजा माधोसिंह II के पश्चात मोरमुकुट सिंह 1922 में सवाई मानसिंह II के नाम से जयपुर के शासक बने।
इन्होंने अपने प्रधानमंत्री मिर्जा इस्माईल की सहायता से जयपुर को आधुनिक रूप दिया तथा अपने नाम से हॉस्पिटल, मेडिकल कॉलेज, स्कूल तथा स्टेडियम आदि बनवाये।
ये पोलो के एक अच्छे खिलाड़ी थे जिससे इन्होंने विश्वभर में प्रसिद्धि प्राप्त की।
इनकी एक रानी कूच बिहार के शासक की पुत्री गायत्री देवी थी जिसके लिए इन्होंने मोती डूंगरी पर तख्त-ए-शाही महलों का निर्माण करवाया।
मानसिंह II ने जयपुर में सिटी पैलेस म्यूजियम की स्थापना की।
30 मार्च, 1949 को इन्हें वृहत राजस्थान का प्रथम रामप्रमुख बनाया गया।
वर्ष 1960 में ये राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए तथा 1965 में इन्हें स्पेन में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया ।
“अलवर का कच्छवाहा वंश”

अलवर प्राचीन मत्स्य प्रदेश का हिस्सा था जिसकी राजधानी विराट नगर थी।
11 वीं शताब्दी में यह क्षेत्र चौहानों के अधीन था लेकिन पृथ्वीराज तृतीय की तराईन के द्वितीय युद्ध में पराजय के बाद यह क्षेत्र स्वतंत्र हो गया।
आमेर के कच्छवाहा शासक उदयकरण के पुत्र वीरसिंह ने मौजमाबाद की जागीर ली तथा इसी का पौत्र नरू हुआ जिसके वशंज नरूका कच्छवाहा कहलाये।
कल्याण सिंह नरूका आमेर शासक मिर्जाराजा जयसिंह के समय मौजमाबाद की जागीर का मालिक था तथा इन्होंने कल्याण सिंह को माचेड़ी की जागीर प्रदान की।


प्रताप सिंह नरूका (1775-1790 ई.)

प्रतापसिंह मोहब्बत सिंह का पुत्र था जिसने 1775 ई. में अलवर राज्य की स्थापना की।
प्रतापसिंह जयपुर के शासक सवाई माधोसिंह प्रथम की सेवा में था।
भरतपुर के जवाहर सिंह की सेना का जयपुर की सेना से मावंडा नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें प्रतापसिंह ने जयपुर की सेना का साथ दिया ।
इससे प्रसन्न होकर माधोसिंह ने प्रतापसिंह को ‘रावराजा’ की उपाधि प्रदान की।
1770 ई. में प्रतापसिंह ने राजगढ़ दुर्ग तथा टहला दुर्ग का निर्माण करवाया।
1772 ई. में मालाखेड़ा दुर्ग, 1773 में बलदेवगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया।
1774 ई. में मुगल सेनापति नजफ खाँ ने प्रतापसिंह की सहायता से आगरा के किले को भरतपुर के अधिकार से मुक्त करवाया।
1774 ई. में माचेड़ी की जागीर हमेशा के लिए जयपुर राज्य से स्वतंत्र हो गई।
1782 ई. में जयपुर शासक महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने राजगढ़ पर आक्रमण कर प्रतापसिंह के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।
अलवर के प्रतापसिंह ने महादजी सिंधिया की सहायता से जयपुर पर आक्रमण किया तब जयपुर के सवाई प्रतापसिंह तथा अवलर के प्रतापसिंह के मध्य समझौता हो गया।


बख्तावर सिंह (1790-1815 ई.) :-

प्रतापसिंह के बाद उनके पुत्र बख्तावर सिंह अलवर के शासक बने।
इन्हाेंने 1803 ई. के लासवाड़ी के युद्ध में मराठों के विरूद्ध अंग्रेजों की सहायता की तथा अंग्रेजों ने इन्हें ‘राठ’ नामक क्षेत्र दिया।
1803 ई. में बख्तावर सिंह ने अंग्रेजों के साथ सहयोग संधि की थी।


महाराजा विनय सिंह (1815-57 ई.)

बख्तावर सिंह ने देहांत के बाद कुछ सरदार उनके भतीजे विनयसिंह (बन्नेसिंह) को तथा कुछ सरदार उनकी पासवान से उत्पन्न पुत्र बलवंत सिंह को शासक बनाना चाहते थे।
अत: 1815 ई. में दोनाें विनयसिंह तथा बलवंत सिंह एक साथ सिंहासन पर बैठे तथा कम्पनी सरकार द्वारा दाेनों को बराबर का शासक होने की मान्यता दे दी गई।
बाद में विनयसिंह के दबाव के कारण बलवंत सिंह को शासक पद से हटा दिया गया तथा उन्हें नीमराणा तथा तिजारा की जागीर दे दी गई।
इस प्रकार नीमराणा अलवर से अलग एक रियासत बनी। 1845 ई. में बलवंत सिंह की नि:संतान मृत्यु होने से नीमराणा को पुन: अलवर में मिला दिया गया।
विनयसिंह ने मेव जाति से सुरक्षा के लिए रघुनाथगढ़ दुर्ग बनवाया।
1857 की क्रांति के समय अलवर के शासक विनयसिंह थे।


महाराजा शिवदानसिंह (1857-1874 ई.) :-

महाराजा विनयसिंह के देहांत के बाद शिवदान सिंह अलवर के शासक बने।
इनके अवयस्क होने के कारण शासन कार्य मुंशी अम्मूजान ने संभाला।
राजपूत सरदारों ने अम्मूजान के विरूद्ध विद्रोह कर दिया जिस कारण यह वहाँ से भाग निकले।
यहाँ फैली अशांति के कारण पॉलिटिकल एजेंट निक्सन ने स्वयं वहां आकर ठाकुर लखधीर सिंह की अध्यक्षता में एक कौंसिल का गठन किया।
अलवर के पॉलिटिकल एजेंट कप्तान इम्पी ने अलवर में ‘इम्पी तालाब’ का निर्माण करवाया।
अलवर में शिवदानसिंह के कुप्रशासन के कारण पोलिटिकल एजेंट की अध्यक्षता में कौंसिल का गठन किया तथा इन्हें पद से हटाकर कौंसिल का एक सदस्य मात्र बना दिया।

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महाराजा मंगलसिंह (1874-1892 ई.)

महाराजा शिवदानसिंह के बाद मंगलसिंह को अलवर रियासत का शासक बनाया गया।
इनके अवयस्क होने के कारण पण्डित मनफूल को इनका संरक्षक नियुक्त किया गया।
1888 ई. में अंग्रेज सरकार ने इन्हें कर्नल की उपाधि तथा महाराजा का खिताब प्रदान किया।


महाराजा जयसिंह (1892-1933 ई.)

महाराजा मंगलसिंह के बाद जयसिंह अलवर के शासक बने।
इन्होंने अलवर की राजभाषा उर्दू के स्थान पर हिन्दी को बनाया।
जयसिंह ने नरेन्द्र मंडल के सदस्य के रूप में प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया। नरेन्द्र मंडल को यह नाम जयसिंह ने ही दिया था।
इन्हीं के समय नीमूचाणा हत्याकांड (1925) हुआ था।
1933 में अंग्रेज सरकार ने इन्हें महाराजा के पद से हटाकर राज्य से निष्कासित कर दिया।


महाराजा तेजसिंह (1937-1948 ई.)

महाराजा जयसिंह के बाद चन्दपुरा के ठाकुर गंगासिंह के पुत्र तेजसिंह अलवर रियासत के शासक बने।
इन्होंने अलवर में कई स्कूल तथा हॉस्टल स्थापित करवाए।
18 मार्च, 1948 को मत्स्य संघ में अलवर का विलय किया गया तथा इस संघ की राजधानी अलवर तथा उपराजप्रमुख तेजसिंह बने।
“’शेखावटी के कच्छवाहा”

शेखावटी का क्षेत्र जयपुर रियासत का ही भाग था जिसमें सीकर झुंझुनूं का क्षेत्र आता था।
राव शेखा आमेर के कच्छवाहा वंश के राजपूत सरदार मोकल कच्छवाहा का पुत्र था।
इसने सीकर-झुंझुनूं पर अपना राज्य स्थापित किया तथा यह क्षेत्र राव शेखा के नाम से शेखावाटी कहलाया। इसके वंशज शेखावत कहलाये।
राव शेखा ने अपनी राजधानी अमरसर को बनाया।
राव शेखा के बाद क्रमश: राव रायमल, राव सूजा, राव लूणकर्ण आदि अमरसर के शासक बने।
राव मनोहर ने अपने पिता लूणकर्ण से जागीर छीन ली तथा स्वयं जागीरदार बना। इसने मनोहरपुर कस्बा बसाया।
इसके बाद के शेखावत शासकों ने कायमखानियों को परास्त कर झुंझुनूं, नरहर आदि क्षेत्र जीत लिया।
शेखावाटी के शासकों को जयपुर राज्य की ओर से ‘ताजिमी सरदार’ सम्मान से नवाजा गया।

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