biography of gautam buddha in hindi

gautam buddha biography in hindi | गौतम बुद्ध की जीवनी

biography की इस series में हम विश्व के सभी महान और महत्वपूर्ण लोगो की biography से आपको अवगत कराएंगे | और इसकी शुरुआत हम gautam buddha biography से कर रहे है तो बने रहे Popular Study के संग |

प्रारंभिक जीवन 

गौतम बुध का जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व में कपिलवस्तु के समीप लुंबिनी वन (आधुनिक रुमन्देई) में हुआ था उनके पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के शाक्य गण के प्रधान थे उनकी माता का नाम मायादेवी था जो कोलिय गणराज्य की कन्या थी गौतम के बचपन का नाम सिद्धार्थ था उनके जन्म के कुछ ही दिनों बाद उनकी माता माया का देहांत हो गया तथा उनका पालन पोषण विमाता प्रजापति गौतमी ने किया उनका पालन पोषण राजसी ऐश्वर्य एवं वैभव के वातावरण में हुआ उन्हें राजकुमारों के अनुरूप शिक्षा दीक्षा दी गई परंतु बचपन से ही वह अत्यधिक चिंतनशील स्वभाव के थे प्राय एकांत स्थान में बैठकर वे जीवन मरण सुख दुख आदि समस्याओं के ऊपर गंभीरतापूर्वक विचार किया करते थे उन्हें इस प्रकार सांसारिक जीवन से विरक्त होते देख उनके पिता को गहरी चिंता हुई उन्होंने बालक सिद्धार्थ को सांसारिक विषयों में फसाने की भरपूर कोशिश की विलासिता की सामग्रीया उन्हें प्रदान की गई इसी उद्देश्य से 16 वर्ष की अल्पायु में ही उनके पिता ने उनका विवाह उनके कुल की एक अत्यंत रूपवती कन्या के साथ करा दिया इस कन्या का नाम उत्तर कालीन बौद्ध ग्रंथों में यशोधरा बिंबागोपा आदि दिया गया है कालांतर में उसका यशोधरा नाम ही सर्व प्रचलित हुआ यशोधरा से सिद्धार्थ को एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ जिसका नाम राहुल पड़ा 

फिर गौतम बुद्ध ने प्रवज्या ग्रहण कर ली तो अब प्रश्न ये उठता है की उन्होंने प्रवज्या क्यों ग्रहण की ? 

परंपरागत उत्तर है कि उन्होंने प्रवज्या इसलिए ग्रहण की क्योंकि उन्होंने एक वृद्ध पुरुष,एक रोगी व्यक्ति तथा,एक मृतक की लाश को देखा था स्पष्ट रूप से यह उत्तर बेतुका है और असंगत है जिस समय सिद्धार्थ ने प्रवज्या ग्रहण की थी उस समय उनकी आयु 29 वर्ष की थी यदि सिद्धार्थ ने इन्हीं तीन दृश्यों के परिणामस्वरूप प्रवज्या ग्रहण की थी तो यह कैसे हो सकता है कि उन्होंने यह तीन दृश्य पहले कभी नहीं देखें यह जीवन की ऐसी सामान्य घटनाएं हैं जो प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में घटती रहती है और सिद्धार्थ इससे पूर्व में देख पाने में असफल नहीं रहे होंगे इस परंपरागत मान्यताओं को स्वीकार करना असंभव है कि 29 वर्ष की आयु होने पर भी सिद्धार्थ ने उन्हें पहली बार देखा यह व्याख्या विश्वसनीय और तर्कसंगत नहीं है  आज हम आपको इसके बारे मे सही जानकारी देंगे। 

ये जानने से पहले की उन्होंने प्रवज्या क्यों ग्रहण की हम शाक्य गण के बारे में जानेंगे ।

शाक्य संघ में प्रवेश

सिद्धार्थ शाक्य कुल से संबंधित थे  शाक्यों  का अपना संघ था जो एक गणराज्य था 20 वर्ष की आयु होने पर हर शाक्य युवक को शाक्य संघ में दीक्षित होकर संघ का सदस्य होना होता था ।

सिद्धार्थ गौतम 20 वर्ष के हो चुके थे अब उनके 

लिए यह समय था कि वह संघ में दीक्षित हो और उसका सदस्य बने । शाक्यों का अपना एक सभा भवन था जिसे वे संस्थागार कहते थे यह कपिलवस्तु में स्थित था संघ की सभाएं संस्थागार में ही होती थी सिद्धार्थ को संघ में दीक्षित करने का उद्देश्य से शुद्धोधन ने शाक्य पुरोहित को संघ की एक सभा बुलाने के लिए कहा उसके बाद कपिलवस्तु में शाक्यों के संस्थागर में संघ एकत्रित हुआ सभा में पुरोहित ने प्रस्ताव रखा कि सिद्धार्थ को संघ का सदस्य बनाया जाए 

शाक्य सेनापति अपने स्थान पर खड़ा हुआ और उसने संघ को संबोधित करते हुए कहाँ ” शाक्य कुल के शुद्धोधन के परिवार में  उत्पन्न सिद्धार्थ गौतम संघ का सदस्य बनना चाहता है उसकी आयु 20 वर्ष की है और वह हर तरह से संघ का सदस्य बनने के योग्य है इसलिए मेरा प्रस्ताव है कि उसे शाक्य संघ का सदस्य बनाया जाए मेरा विनम्र निवेदन है कि यदि कोई इस प्रस्ताव के विरुद्ध हो तो वह बोले ।”

प्रस्ताव के विरोध में कोई भी नहीं खड़ा हुआ । सेनापति ने कहा मैं दूसरी बार भी पूछता हूं कि यदि कोई प्रस्ताव के विरोध में है तो वह बोले प्रस्ताव के विरोध में बोलने के लिए कोई भी खड़ा नहीं हुआ सेनापति ने फिर कहा मैं तीसरी बार भी पूछता हूं कि यदि कोई प्रस्तावों के विरुद्ध है तो बोले तीसरी बार भी कोई प्रस्ताव के विरुद्ध नहीं बोला शाक्यों की कार्यप्रणाली में यह नियम था कि बिना प्रस्ताव के कोई कार्यवाही नहीं हो सकती थी और जब तक कोई प्रस्ताव तीन बार पारित ना हो जाए तब तक वह स्वीकृत नहीं समझा जाता था सेनापति का प्रस्ताव तीन बार निर्विरोध पारित हो जाने पर सिद्धार्थ के सदस्य के रूप में विधिवत शाक्य-संघ में सम्मिलित किए जाने की घोषणा कर दी गई तब शाक्यों का पुरोहित खड़ा हुआ और उसने सिद्धार्थ को अपने स्थान पर खड़े होने के लिए कहा सिद्धार्थ को संबोधित करके उसने पूछा “क्या आप इसका अनुभव करते हैं कि संघ ने आपको अपना सदस्य बना कर सम्मानित किया है” सिद्धार्थ का उत्तर था “हां मैं ऐसा ही अनुभव करता हूं” “क्या आप संघ के सदस्यों के कर्तव्य जानते हैं” “मुझे खेद है कि मैं उनसे परिचित नहीं हूं किंतु उन्हें जानकर मुझे प्रसन्नता होगी” सिद्धार्थ ने कहा 

पुरोहित बोला “मैं सर्वप्रथम आपको यह बताऊंगा कि संघ के सदस्य की हैसियत से आप के क्या कर्तव्य है उसने उन्हें क्रमश एक-एक करके गिनाया-1.आपको अपने तन मन और धन से शाक्यों के हितों की रक्षा करनी होगी ।

2.आपको कभी भी संघ की  सभाओं में अनुपस्थित नहीं रहना है 3.आपको बिना किसी पक्षपात के किसी भी शाक्य का दोष पता चलने पर खुलकर कह देना होगा यदि आप पर कभी कोई दोषारोपण किया जाए तो आप क्रोधित नहीं होंगे दोषी होने पर अपना दोष स्वीकार कर लेना होगा निर्दोष होने पर अपना पक्ष रख कर सफाई देने का पूरा अवसर प्राप्त होगा।”

 इसके आगे पुरोहित ने कहा “मैं अब आपको बताना चाहता हूं कि क्या करने पर आप संघ की सदस्यता से वंचित किए जा सकते हैं 1.व्यभिचार करने पर आप संघ के सदस्य नहीं रह सकेंगे 2.किसी की हत्या करने पर आप संघ के सदस्य नहीं रह सकेंगे 3.चोरी करने पर आप संघ के सदस्य नहीं रह सकेंगे 4.झूठे साक्ष्य देने का दोषी होने पर आप संघ के सदस्य नहीं रह सकेंगे”

 सिद्धार्थ ने कहा “मान्यवर में आपका कृतज्ञ हूं कि आपने मुझे संघ के अनुशासन से संबंधित नियमों से परिचित कराया मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैं उनके अर्थ और व्यंजन सहित पालन करने का प्रयास करूंगा।”

शाक्य संघ के साथ मतभेद और गृह त्याग की असली वजह

होनहार सिद्धार्थ को शाक्य संघ का सदस्य बने 8 वर्ष व्यतीत हो चुके थे वह संघ का अत्यंत समर्पित वफादार और दृढ़ सदस्यता जितनी रुचि उसे निजी मामलों में थी उतनी ही रुचि व संघ के मामलों में भी रखता था संघ के सदस्य के रूप में उसका आचरण आदर्श व एक उदाहरण था और उसने अपने व्यवहार  से स्वयं को सबका प्रिय बना लिया था उसकी सदस्यता के आठवें वर्ष में एक ऐसी घटना घटी जो शुद्धोधन के परिवार के लिए दुखद बन गई और सिद्धार्थ के जीवन में संकट पूर्ण स्थिति पैदा हो गई थी ।

इस दुखद प्रकरण का आरंभ इस प्रकार हुआ शाक्यों के राज्य की सीमा से सटा हुआ कोलियों का राज्य था रोहिणी नदी दोनों राज्यों की विभाजक रेखा थी शाक्यों और कोलियो दोनों ही रोहिणी नदी के पानी से अपने अपने खेत सींचते थे।

  हर फसल पर उनका आपस में विवाद होता था कि कौन रोहिणी के जल का पहले और कितना उपयोग करेगा यह विवाद कभी-कभी झगड़ों में बदल जाता था और झगड़े लड़ाइयो में ।

जब सिद्धार्थ की आयु 28 वर्ष की हुई उस वर्ष रोहिणी के पानी को लेकर शाक्यों के नौकरों में और कोलियों के नौकरों में एक विवाद के बाद बड़ा झगड़ा हो गया जिसमें दोनों पक्षों के लोग घायल हो गए इसका पता चलने पर शाक्यों और कोलियों ने सोचा कि इस विवाद को सदा सदा के लिए युद्ध के द्वारा हल कर लिया जाना चाहिए शाक्यों की सेनापति ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा के प्रश्न पर विचार करने के लिए शाक्य संघ का एक अधिवेशन बुलाया संघ के सदस्यों को संबोधित करके सेनापति ने कहा हमारे लोगों पर कोलियो ने आक्रमण किया इसलिए हमारे लोगों को पीछे हटना पड़ा कोलियों ने इससे पहले भी अनेक बार ऐसी आक्रामक कार्यवाही की है हमने अब तक उन्हें सहन किया है लेकिन ऐसा हमेशा नहीं चल सकता इसे रोका जाना चाहिए और इसे रोकने का एक ही रास्ता है कि कोलियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी जाए मेरा प्रस्ताव है कि कोलियों के विरुद्ध के संघ युद्ध की घोषणा कर”

 जो विरोध करना चाहे वह बोले सिद्धार्थ गौतम अपने स्थान पर खड़ा हुआ और बोला  “मैं इस प्रस्ताव का विरोध करता हूं युद्ध से किसी प्रश्न या समस्या का समाधान नहीं होता युद्ध छेड़ने से हमारे उद्देश्यों की पूर्ति नहीं होगी इससे एक दूसरे युद्ध का बीजारोपण हो जाएगा किसी की हत्या करने वाले को कोई दूसरा हत्या करने वाला मिल ही जाता है जो किसी को जीतना है उसे कोई दूसरा जीतने वाला मिल ही जाता है जो व्यक्ति किसी को लूटता है उसे कोई दूसरा लूटने वाला मिल ही जाता है सिद्धार्थ गौतम ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा मेरे विचार में साथियों को कोलियों के विरुद्ध युद्ध छेड़ने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए पहले सावधानी से इस बात की जांच करनी चाहिए कि वास्तव में दोषी पक्ष कौन सा है मैंने सुना है कि इस विवाद में हमारे आदमी भी आक्रामक रहे हैं यदि यह सत्य है तो हम भी निर्दोष नहीं है” सेनापति ने उत्तर दिया “यह ठीक है कि हमारे आदमी होने की पहल की और आक्रमक थे लेकिन यह भूलना नहीं चाहिए कि पहले पानी लेने की बारी हमारी ही थी सिद्धार्थ” गौतम ने कहा “इससे स्पष्ट है कि हम भी सर्वदा दोषमुक्त नहीं है इसलिए मेरा प्रस्ताव है कि हम अपने में से 2 आदमी चुने और कोलियों से भी कहा जाए कि वे भी अपने में से 2 आदमी चुने और फिर यह चारों मिलकर एक पांचवा आदमी चुने यह पांचो आदमी मिलकर झगड़े का समाधान करें”  सिद्धार्थ गौतम ने संशोधन हेतु जो प्रस्ताव रखा उसका विधिवत समर्थन हो गया किंतु सेनापति ने संशोधन का विरोध किया और कहा मुझे विश्वास है कि जब तक कोलियों को कठोर दंड नहीं दिया जाता तब तक उनका यह संत्रास समाप्त नहीं होगा  ।

 प्रस्ताव और संशोधन पर  मत लेना आवश्यक हो गया है पहले सिद्धार्थ के सुझाए संशोधन का प्रस्ताव ही मत के लिए प्रस्तुत हुआ वह बहुत बड़े बहुमत से अमान्य हो गया ।

 इसके बाद सेनापति ने स्वयं अपने प्रस्ताव पर मत मांगे सिद्धार्थ गौतम ने फिर खड़े होकर विरोध किया उन्होंने कहा “मेरी संघ से प्रार्थना है कि इस प्रस्ताव को स्वीकार न किया जाए शाक्य और कोली निकट संबंधी है यह बुद्धिमानी नहीं है कि वे एक दूसरे को बर्बाद करें सेनापति ने सिद्धार्थ गौतम के तर्क का घोर विरोध किया उसने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध में क्षत्रियों के लिए कोई अपना पराया नहीं होता उन्हें राज्य के हित में अपने सगे भाइयों से भी लड़ना ही होगा बलि कर्म ब्राह्मणों का कर्तव्य है युद्ध करना क्षत्रियों का कर्तव्य है धर्म है,व्यापार करना वैश्यों का कर्तव्य है और सेवा करना शुद्रो का कर्तव्य है हर वर्ग को अपना अपना कर्तव्य निभाने में ही पुण्य है शास्त्रों की ऐसी ही आज्ञा है सिद्धार्थ ने उत्तर दिया “जहां तक मैं समझता हूं धर्म तो इस बात को मानने में है कि वैर से वैर कभी शांत नहीं होता यह केवल अवैर प्रेम से ही शांत हो सकता है”

 सेनापति अधीर हो उठा और बोला इस दार्शनिक शास्त्रार्थ में पढ़ना बेकार है स्पष्ट बात तो यह है कि सिद्धार्थ को मेरा प्रस्ताव अमान्य है इसका मत लेकर इसका निश्चय करें कि संघ का क्या विचार है” उसके बाद सेनापति ने अपने प्रस्ताव पर लोगों के मत मांगे भारी बहुमत से प्रस्ताव पारित हो गया

 दूसरे दिन सेनापति ने शाक्य संघ की एक और सभा बुलाई जिसका उद्देश्य था उसकी अनिवार्य सैनिक भर्ती की योजना पर विचार करना जब संघ एकत्रित हुआ तो उसने प्रस्ताव रखा कि उसे यह आज्ञा जारी करने की अनुमति दी जाए कि वह 20 और 25 वर्ष के बीच के प्रत्येक शाक्य के लिए कोलियों के विरुद्ध लड़ने के निमित्त सेना में भर्ती होना अनिवार्य होगा सभा में दोनों पक्ष उपस्थित थे वह भी जिन्होंने संघ की पहली सभा में युद्ध घोषणा के पक्ष में मत दिया था और वे भी जिन्होंने इसके विरुद्ध मत दिया था  जिन्होंने इसके पक्ष में मत दिया था उनके लिए सेनापति का प्रस्ताव स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं हुई यह उनके पूर्व निर्णय का स्वाभाविक परिणाम था लेकिन जिस अल्पमत ने उक्त निर्णय के विरुद्ध मत दिया था उसके सामने एक समस्या थी वह समस्या थी बहुमत के निर्णय के आगे झुका जाए अथवा नहीं अल्पमत का दृढ़ निश्चय था कि बहुमत के आगे नहीं झुका जाए यही कारण था कि उन्होंने उस सभा में उपस्थित रहने का भी निर्णय  किया था । दुर्योग से किसी में यह साहस नहीं था कि इस बात को खुलकर कह सके क्योंकि वह बहुमत का विरोध करने के परिणामों से परिचित थे जब सिद्धार्थ ने देखा कि उसके  समर्थक मौन है तो वह उठ खड़ा हुआ और उसने संघ को संबोधित करते हुए कहा “मित्रों ! आप जो चाहे सो करें । आपके साथ बहुमत है लेकिन मुझे खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि मैं अनिवार्य सैनिक भर्ती का विरोध करूंगा मैं आपकी सेना में सम्मिलित नहीं होगा और मैं युद्ध में भी भाग नहीं लूंगा”

 सिद्धार्थ गौतम का उत्तर देते हुए सेनापति ने कहा “उस शपथ का स्मरण करो जो तुमने संघ का सदस्य बनते समय ग्रहण की थी यदि तुम उन में से किसी एक का भी पालन नहीं करोगे तो तुम सार्वजनिक निंदा के भजन बनोगे”

 सिद्धार्थ ने उत्तर दिया “हां मैंने अपने तन मन और धन से शाक्यों के हितों की रक्षा करने का वचन दिया था लेकिन मैं नहीं समझता कि यह युद्ध शाक्यों के हित में है शाक्यों के हित के मुकाबले में सार्वजनिक निंदा का मेरे लिए कोई मूल्य नहीं सिद्धार्थ ने संघ को सावधान करते हुए इस बात की याद दिलाई कि किस प्रकार कोलियों से निरंतर झगड़ते रहने के कारण शाक्य संघ बहुत कुछ कोसलराज के अधीन हो गया है इसकी कल्पना करना आसान है कि यह युद्ध शाक्य संघ की स्वतंत्रता को और भी कम करने के लिए कोसल राज्य को एक और अवसर देगा । सेनापति को क्रोध आ गया और वह सिद्धार्थ को संबोधित करते हुए बोला “तुम्हारा यह भाषण कौशल तुम्हारे किसी काम में आएगा तुम्हें इस संघ के बहुमत के निर्णय को मानना होगा शायद तुम्हें इस बात का बहुत भरोसा है कि कौशल राज की अनुमति के बिना संघ अपनी आज्ञा की अवहेलना करने वाले को फांसी आदेश निकालने का दंड नहीं दे सकता पर यदि इनसे कोई भी एक दंड तुम्हें दिया जाए तो कोसलराज इसकी अनुमति नहीं देगा लेकिन याद रखो कि तुम्हें संघ  दूसरे अनेक तरीकों से दंडित कर सकता है संघ तुम्हारे परिवार के सामाजिक बहिष्कार की घोषणा कर सकता है संघ तुम्हारे परिवार के खेतों को जब्त कर सकता है इसके लिए संघ को कोसलराज की अनुमति की आवश्यकता नहीं”

 सिद्धार्थ ने समझ लिया कि यदि उसने कोलियों के विरुद्ध युद्ध घोषणा करने के प्रस्ताव का अपना विरोध जारी रखा तो उसके क्या क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं इसलिए उसे अब तीन बातों में से एक को चुनना था  1.सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेना 2.फांसी पर लटकना या देश निकाला स्वीकार करना 3.अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिए राजी हो जाना । 

वह पहली बात किसी भी हालत में स्वीकार नहीं कर सकता था वह इस विषय में दृढ था तीसरी बात तो विचार तक नहीं कर सकता था इस परिस्थिति में उसने सोचा कि उसके लिए दूसरी बात ही सर्वाधिक ठीक है इसके बाद सिद्धार्थ गौतम ने संघ को संबोधित किया कृपया आप मेरे परिवार को दंडित ना करें सामाजिक बहिष्कार द्वारा उन्हें कष्ट ना दें उनके खेत जब्त  कर के उन्हें जीविकाविहीन ना करें । वे  निर्दोष है दोषी तो मैं हूं मुझे अकेले ही अपनी गलती का दंड भोगने दे, चाहे तो आप मुझे फांसी पर लटका दें और चाहे तो आप मुझे देश निकाला दे दे आप जो चाहे दंड दे मैं स्वेच्छा से इसे स्वीकार कर लूंगा और मैं वचन देता हूं मैं इसकी अपील कोसलराज से भी नहीं करूंगा

सेनापति ने कहा तुम्हारा सुझाव स्वीकार करना कठिन है क्योंकि यदि तुम स्वेच्छा से भी मृत्यु अथवा देश निकाला स्वीकार करोगे तो भी कोसलराज को इसका पता अवश्य लग जाएगा और वे इसी परिणाम पर पहुंचेंगे की शाक्य संघ ने ही  दंड दिया होगा पर तब वे शाक्यों के विरुद्ध कार्रवाई कर देंगे ।

यदि इसमें कठिनाई है तो मैं एक आसान उपाय सुझा सकता हूं सिद्धार्थ गौतम ने उत्तर दिया मैं परिवार्जक बन देश छोड़ जा सकता हूं यह भी एक प्रकार का देश निकाला ही तो है 

और फिर सभा ने सिद्धार्थ का यह  सुझाव स्वीकार किया

गृह त्याग और सत्य को खोज

इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी व पुत्र को सोते हुए छोड़कर घर त्याग दिया उस समय सिद्धार्थ की आयु 29 वर्ष की थी इस घटना को बौद्ध ग्रंथों में महाभिनिष्क्रमण की संज्ञा दी गई

इसके बाद ज्ञान की खोज में वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करने लगे सबसे पहले वे वैशाली के समीप आलारकलाम नामक सन्यासी के आश्रम में पहुंचे और वहां तपस्या की आलारकलाम सांख्य दर्शन के आचार्य थे तथा अपनी साधना शक्ति के लिए विख्यात थे परंतु यहां उन्हें शांति नहीं मिली यहां से वे रुद्रकर्मपुत्र नामक एक दूसरे धर्म आचार्य के समीप पहुंचे जो राजग्रह के समीप आश्रम में निवास करते थे। यहां भी उनके अशांत मन को संतोष नहीं मिल सका और उन्होंने उनका भी साथ छोड़ दिया फिर वह उरुवेला बोधगया नामक स्थान की तरफ गए यहां उनके साथ पांच ब्राह्मण सन्यासी भी आए थे अब उन्होंने अकेले तपस्या करने का निश्चय किया प्रारंभ में उन्होंने कठोर तपस्या किया जिससे उनका शरीर जर्जर हो गया कायाक्लेश की निस्सारता का  उन्हें अनुभव हुआ तब उन्होंने एक ऐसी साधना प्रारंभ की जिसकी पद्धति पहले की अपेक्षा कुछ सरल थी इस पर उनका अपने साथियों में मतभेद हो गया तथा वे उनका साथ छोड़कर सारनाथ में चले गए सिद्धार्थ अन्न जल ग्रहण करने लगे 6 वर्षों की साधना के  बाद 35 वर्ष की आयु में उन्हें वैशाख पूर्णिमा की रात को एक पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ अब उन्होंने दुःख के कारणों का पता लगाया इस समय से वे बुद्ध नाम से विख्यात हुआ । 

 धर्म प्रचार और मृत्यु

फिर वे अपने धर्म प्रचार के लिए यात्राएँ करने लगे ।। गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दिया । इस प्रथम उपदेश को धर्मचक्रप्रवर्तन की संज्ञा दी जाती है । यह उपदेश दुःख,दुःख के कारणों तथा उनके समाधान से सम्बंधित है । फिर गौतम बुद्ध ने मगध कोसल और वज्जि की यात्राएँ की और अपने धर्म का प्रचार किया अंत में 80 वर्ष को आयु में कुशीनारा में उनकी मृत्यु हो गई  ।

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