personality psychology | व्यक्तित्व , बुद्धि व संवेगात्मक बुद्धि

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इस series में हम psychology के notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
psychology notes के इस series में आज हम personality psychology के बारे में पढेंगे तो बने रहिए popularstudy के साथ |

  व्यक्तित्व , बुद्धि व संवेगात्मक बुद्धि 

व्यक्तित्व अंग्रेजी के पर्सनैलिटी शब्द का हिंदी अर्थ है पर्सनैलिटी शब्द लैटिन भाषा के Persona शब्द से बना है । जिसका अर्थ है – मुखौटा 

→ प्राचीन समय में बाह्य रूपरेखा के आधार पर व्यक्तित्व को परिभाषित किया जाता था ।

लेकिन आज परिभाषा बदल चुकी है ।

→  वर्तमान समय में बाह्य  व आंतरिक गुणों के समावेश को व्यक्तित्व कहा जाता है ।

ऑलपोट –  “व्यक्तित्व मनोदैहिक व्यवस्थाओं का गत्यात्मक संगठन है जो वातावरण के साथ अपूर्व समायोजन स्थापित कर लेता है”

मनोदैहिक – आंतरिक व बाह्य 

 गत्यात्मक –  परिवर्तनशील

 वैलेंटाइन

         “व्यक्तित्व जन्मजात व अर्जित प्रवृत्तियों का योग है”

नोट –  व्यक्तित्व पर वंशानुक्रम व वातावरण दोनों का प्रभाव पड़ता है ।

वुडवर्थ –  “व्यक्तित्व व्यक्ति की संपूर्ण गुणात्मकता है। “

→ व्यक्तित्व का वर्गीकरण – 

→ पाश्चात्य दृष्टिकोण से – 

क्रे. मर →  “इन्होंने शारीरिक संरचना के आधार पर व्यक्तित्व का वर्गीकरण किया है।”

→  स्थूलकाय, सुडोलकाय, क्षीणकाय, मिश्रित

  •  स्थूलकाय  — नाटे व्यक्ति 
  • सुडोलकाय — खिलाड़ी प्रवृत्ति वाले
  • क्षीणकाय — दुर्बल शरीर वाले 
  • मिश्रित -मिले-जुले 
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शैल्डन → इन्होंने भी शारीरिक संरचना के आधार पर व्यक्तित्व का वर्गीकरण किया है। 

  • गोलाकार
  •  आयताकार
  •  लंबाकार 

स्प्रेंगर :-  स्प्रेंगर ने समाजशास्त्रीय आधार पर व्यक्तित्व को 6 भागों में विभाजित किया है ।

  1. सैद्धांतिक प्रवृत्ति वाले 
  2. राजनीतिक प्रवृत्ति वाले 
  3. सामाजिक प्रवृत्ति वाले 
  4. सौंदर्यत्मक प्रवर्ती वाले 
  5. आर्थिक प्रवृत्ति वाले 
  6. धार्मिक प्रवृत्ति वाले

 जुंग → जुंग के द्वारा किया गया वर्गीकरण वर्तमान समय में सबसे प्रसिद्ध है । माना जाता है इन्होंने मनोवैज्ञानिक आधार पर व्यक्तित्व का वर्गीकरण किया है ।

  1.  अंतर्मुखी
  2.  बहिर्मुखी 
  3. उभयमुखी (अंतर्मुखी और बहिर्मुखी का मिश्रण )

भारतीय दृष्टिकोण से :- 

  • सतोगुणी –  ईश्वर व धर्म में
  •  रजोगुणी – कर्म में 
  • तमोगुण – सुख प्राप्ति में 

आधुनिक दृष्टिकोण से → 

  1.  भावुक 
  2. विचारशील 
  3. कर्मशील 

       उचित व्यक्तित्व होता है – संवेगिया स्तर 

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नोट :- सबसे प्राचीन प्रकार  सिद्धांत (टाइपोलॉजि )  ग्रांड चिकित्सा शास्त्री हिप्पोक्रेट्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘नेचर ऑफ मैन’ के अंतर्गत प्रतिपादित किया है  ।

उन्होंने स्वभाव के आधार पर व्यक्तित्व का वर्गीकरण किया है :-

  1. कालापित्त – उदास हताश निराशावादी 
  2. पीलापित्त –  गुस्सैल क्रोधी चिड़चिड़ा 
  3. रक्त प्रधान – रक्त खुशमिजाज प्रसन्नचित आशावादी ।
  4.  कफ प्रदान – विरक्त,भावशून्य ,आदि

     व्यक्तित्व मापन की विधियां

 प्रक्षेपी/प्रक्षेपण विधिया 

  1.   TAT
  2. CAT
  3. IBT
  4. SCT
  5. EWAT
  6. खेल व नाटक विधि

  अप्रक्षेपी/अन्य विधिया

  1.  आत्मनिष्ठ / व्यक्तिनिष्ठ विधियां
  2.  वस्तुनिष्ठ विधियां
  3.  आत्मकथा विधि व्यक्ति इतिहास विधि प्रश्नावली विधि साक्षात्कार 
  4. निरीक्षण विधि समाजमिति विधि कर्म निर्धारण मापनी शारीरिक परीक्षण
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परिक्षेपण विधियां  → 

परिक्षेपण शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सिगमंड फ्रायड ने किया प्रक्षेपण का अर्थ होता है अपनी बातों विचारों भावनाओं आदि को स्वयं न बताकर किसी अन्य उद्दीपक या पदार्थ के माध्यम से अभिव्यक्त करना ।

→  प्रक्षेपण विधियों के माध्यम से अवचेतन मन की बातों का पता लगाया जाता है ।

1.  प्रासंगिक अंतर्गत परीक्षण / कथा प्रसंग परीक्षण

 TAT – THEMATIC APPRECIATION TEST

निर्माणकर्ता – मोरगन मुरे (1935) 

कुल कार्ड → 30 + 1 = 31 

चित्रों से संबंधित कुल कार्ड = 30 

                     खाली कार्ड = 1

→  इस परीक्षण में 10 कार्डों पर पुरुषों से संबंधित चित्र 10 पर स्त्रियों से संबंधित तथा बाकी 10  पर दोनों से संबंधित चित्र बने हुए होते हैं ।

→ व्यक्ति को चित्र दिखाकर कहानी लिखने को कहा जाता है कम से भी कम 20 चित्रों पर कहानी लिखाई जाती है ।

→ यह परीक्षण व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों ही रुपो में प्रयोग किया जा सकता है तथा 14 वर्ष से अधिक आयु वालों के लिए विशेष उपयोगी है ।

2   बाल संप्रत्यय परीक्षण –  CAT ( CHILDREN APPRECIATION TEST )

निर्माण – लियोपोल्ड वैल्लोक (1948) तथा इसका विकास किया है डॉक्टर अर्नेष्ठ क्रिस ने

→  इस परीक्षण में 10 कार्डो पर जानवरों के चित्र बने होते हैं बालक को चित्र दिखाकर कहानी लिखने को कहा जाता है ।

→ यह परीक्षण भी व्यक्तित्व व सामूहिक दोनों रूपों में प्रयोग किया जा सकता है । तथा 3 से 11 वर्ष के बालकों के लिए विशेष उपयोगी है ।

3. रोर्शा स्याही धब्बा परीक्षण – IBT (INK BLOD TEST)

 निर्माण – हरमन रोर्शा (1921) 

→ इस परीक्षण में 10 कार्ड पर स्याही के धब्बे बने होते हैं 5 कार्ड पर काले और सफेद रंग के तथा बाकी पांच पर विभिन्न रंगों के धब्बे बने होते हैं ।

→ बालक को धब्बा दिखाकर आकृति के बारे में पूछा जाता है यह परीक्षण व्यक्तिगत रूप से किसी भी आयु वर्ग पर प्रयोग किया जा सकता है ।

4.वाक्य पूर्ति परीक्षण (SCT)

 निर्माण – 1930 में 

विकास –   पाइन एवं टेंडलर ने ।

 तथा इस दिशा में सबसे सराहनीय कार्य रोटर्स ने किया।

 इस परीक्षण में अधूरे वाक्य को पूरा करने को कहा जाता है ।

 जैसे :- 

     मैं बहुत खुश होता हूं जब _____।

     मेरे मित्र अक्सर ______।

     मैं बहुत दुखी होता हूं,जब_____।

5.  स्वतंत्र शब्द साहचर्य परीक्षण (FWAT) 

निर्माण – 1879 में गॉल्टन ने किया ।

इस परीक्षण के द्वारा व्यक्तित्व मापन के अलावा कई मानसिक रोगों का इलाज भी किया जाता है ।

6. खेल व नाटक विधि — 

 समर्थक –  मोरेनो 

यह भी एक प्रक्षेपी विधि है ।

 इस विधि में बालक की अभिव्यक्ति के माध्यम से अचेतन मन की बातों का पता लगाकर उसके व्यक्तित्व का मापन किया जाता है ।

आत्मनिष्ठ/व्यक्तिनिष्ठ विधियां

1.  आत्मकथा विधि / आत्मदर्शन विधि → 

 प्रवर्तक →  विलियम वुन्ट/ टीचरनर(शिष्य)

यह एक  प्राचीनतम विधि है इसमें व्यक्ति स्वयं स्वयं के बारे में लिखता है। 

 वैज्ञानिक विधि नहीं होने के कारण आज इसका प्रयोग बहुत कम किया जाता है ।

2.व्यक्ति इतिहास विधि  (केस स्टडी) 

  प्रवर्तक – टाइडमैन

निदानात्मक अध्ययनों की सर्वश्रेष्ठ विधि है । व्यक्ति इतिहास विधि असामान्य बालक के निदान की सर्वश्रेष्ठ विधि है ।

समस्या के कारण को जानना निदान कहलाता है जो कि मनोविज्ञान की सहायता से किया जाता है।

करण को दूर करना उपचार कहलाता है जो कि शिक्षा की सहायता से किया जाता है ।

बिना निदान के उपचार संभव नहीं है।

3. प्रश्नावली विधि / व्यक्तित्व अनुसूची 

सर्वप्रथम वुडवर्थ ने पर्सनल डाटा इंक्वायरी का निर्माण किया । 

कैटल ने 16 PF व्यक्तित्व कारक प्रश्नावली का निर्माण किया ।

 प्रश्नावली 3 से  4 प्रश्न विकल्प

 मापनी 5  से अधिक विकल्प 

प्रश्नावली विधि –  सुकरात (प्रश्न उत्तर )

प्रश्नावली विधि –  वुडवर्थ 

प्रश्नावली में आमने सामने होना जरूरी नहीं होता इसमें उत्तर के रूप में दो विकल्प (हाँ या ना ) या तीन विकल्प ( हाँ नहीं कभी नहीं) होते हैं ।

 मापनी में 5 विकल्प होते हैं ।

 प्रश्नावली के प्रकार 

  • बंद प्रतिबंधित प्रश्नावली – इसमें प्रश्नों के उत्तर हां अथवा नहीं या फिर किसी एक विकल्प का चयन करके देने होते हैं ।
  • खुली/प्रतिबंधित प्रश्नावली – इसमें प्रश्नों के उत्तर विस्तार पूर्वक व स्वतंत्रता पूर्वक देने होते हैं ।
  • चिंत्रित प्रश्नावली – इसमें चित्रों के माध्यम से पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने होते हैं ।
  • मिश्रित प्रश्नावली – उपरोक्त सभी का मिलाजुला रूप
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4. साक्षात्कार विधि

 पैनल का अर्थ होता है – लघु विशिष्ट समूह सदस्यों की संख्या 8 से 10

→  इसकी शुरुआत अमेरिका से हुई इसमें आमने सामने होना जरूरी होता है इसमें प्रश्नों का कोई बंधन नहीं होता और ना ही कोई समय सीमा निश्चित होती है ।

→ साक्षात्कार को वार्तालाप का एक रूप माना जाता है ।

→ साक्षात्कार के प्रकार 

  • निर्देशित साक्षात्कार – इसमें प्रश्नों की भाषा समय तरीका आदि पहले से ही निश्चित होते हैं यह सुनियोजित तरीके से किया जाने वाला साक्षात्कार है ।
  •  अनिर्देशित साक्षात्कार – इसे गहन निदानात्मक व केंद्रित साक्षात्कार भी कहते हैं इसमें कुछ भी पहले से निश्चित नहीं होता है प्रवृति  लचीली होती है। इसमें साक्षात्कारकर्ता प्रत्याशी को उन्मुक्त अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करता है ।
  • समाहार साक्षात्कार :-  उपरोक्त दोनों का मिला जुला रूप तथा साक्षात्कार की सर्वश्रेष्ठ वह वैध विधि।

वस्तुनिष्ठ विधियां –

  1.  निरीक्षण विधि/ बहिदर्शन विधि / सार्वभौमिक विधि —

 प्रवर्तक – वाटसन 

इस विधि में सामने वाले व्यक्ति के व्यवहार का विभिन्न परिस्थितियों में अध्ययन करके निष्कर्ष निकाला जाता है कि विषयी का व्यक्तित्व कैसा है ।

  1. समाजमिति विधि – 

 प्रवर्तक – जेएल मोरेनो 

इस विधि में व्यक्ति की सामाजिकता के बारे में समाज के व्यक्तियों से जानकारी लेकर निष्कर्ष निकाला जाता है कि विषयी का व्यक्तित्व कैसा है ।

  1. कर्म निर्धारण मापनी/ रेटिंग स्केल – 

सर्वप्रथम निर्माण किया – थस्टर्न 

 इस परीक्षण में कर्म निर्धारण मापनी के माध्यम से आंकड़े एकत्रित करके निष्कर्ष निकाला जाता है कि विषयी का व्यक्तित्व कैसा है ।

  1.  शारीरिक परीक्षण —  इस परीक्षण में व्यक्ति की शारीरिक जांच करके निष्कर्ष निकाला जाता है कि निर्धारित नौकरी के लिए व स्वस्थ है या नहीं  

इस series में हम psychology के notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
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शारीरिक विकास मनोविज्ञान

शारीरिक विकास

इस series में हम psychology के notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
psychology notes के इस series में आज हम शारीरिक विकास के बारे में पढेंगे तो बने रहिए popularstudy के साथ |

◆ शारीरिक विकास 

★  शारीरिक विकास के चक्र – 

  •  प्रथम चक्र. –  0 – 3 वर्ष  

विकास तीव्र गति से 

  • द्वितीय चक्र – 3 से 12 वर्ष 

मंद गति से 

  • तृतीय चक्र – 13 से 15 वर्ष 

विकास तीव्र गति से 

  • चतुर्थ चक्र – 16 से 18 वर्ष 

विकास मंद गति से 

श्रीमती हरलॉक – “विकास लयात्मक होता है नियमित नहीं” 

क्रो एंड क्रो – “मनुष्य सर्वप्रथम एक शारीरिक प्राणी है उसकी शारीरिक संरचना उसके व्यवहार व दृष्टिकोण का आधार है अतः शारीरिक विकास के सभी पक्षों का अध्ययन करना आवश्यक है।”

 ★ लंबाई → 

 शैशवावस्था में लड़कों की लंबाई अधिक होती है तथा बाल्यावस्था में लगभग बराबर और अधिक होती भी है  तो लड़कियों की होती है ।

और किशोरावस्था में लड़कों की लंबाई अधिक होती है। क्योंकि लड़कियों की लंबाई 16 वर्ष तक बढ़ती है जबकि लड़कों की लंबाई 18 वर्ष के बाद भी बढ़ती रहती है।

★ भार → 

शैशवावस्था में लड़कों का भार अधिक,बाल्यावस्था में लगभग बराबर और यदि अधिक होता है तो लड़कियों का ।

किशोरावस्था में लड़कों का भार अधिक होता है क्योंकि  लड़कों की हड्डियां अधिक मजबूत होती है ।

★ दांत → 

दांत निकलने की प्रक्रिया का आरंभ गर्भावस्था से हो जाता है । जन्म के समय शिशु के दांत नहीं होते है । 

पांचवे या छठे महीने में शिशु के दूध के दांत निकलना प्रारंभ हो जाते हैं 1 वर्ष में बालक के दांतो की संख्या लगभग 8 होती है तथा 4 वर्ष तक दूध के पूरे 20 दांत निकल आते हैं उसके बाद दूध के दांत गिरना शुरू होते तथा पांचवें या छठे वर्ष से नए दांत निकलना शुरू हो जाते हैं ।

12 से 13 वर्ष तक बालक के दांतो की संख्या 27 -28 होती है ।

किशोरावस्था के अंत तथा प्रौढावस्था के प्रारंभ में प्रज्ञा दंत निकलते है । इनकी संख्या चार होती है ।

स्थाई दांत –  12

अस्थाई दांत –  20

कुल दांत – 32

★ हड्डियां → 

  शैशवावस्था में हड्डियों की संख्या लगभग 250 से 300 के बीच होती है ।

यह हड्डियां कोमल तथा लचीली होती है । अतः धीरे-धीरे यह आपस में जुड़ना प्रारंभ होती है इस क्रिया को अस्थिकरण / दृढिकरण की क्रिया कहते हैं ।

किशोरावस्था में अस्थिकरण की क्रिया पूर्ण हो जाती है तो हड्डियों की संख्या 206 रह जाती है ।

किशोरावस्था में भुजाओं व टांगों की हड्डियों में तीव्र गति में वृद्धि होती है ।

★ मस्तिक → 

 शैशवावस्था में मस्तिष्क का भार लगभग 350 ग्राम होता है ।

बाल्यावस्था में 1260 ग्राम 

किशोरावस्था में 1260 – 1450

★ धड़कन → 

 जन्म के समय शिशु की धड़कन 1 मिनट में लगभग 140 बार धड़कती है ।

6 वर्ष की आयु तक 100 बार ।

12 वर्ष में 85 बार ।

किशोरावस्था में 72 बार।

★ बाल विकास के आधार

 संवेदना → 

जब एक नवजात शिशु किसी तेज आवाज को सुनकर चौक जाता है अतः उत्तेजित हो जाता है तो उसे संवेदना कहते हैं । यह जीव की सरलता व प्रारंभिक अनुभूति है इसे ज्ञान की पहली सीढ़ी माना जाता है ।

प्रत्यक्षीकरण → 

 जब शिशु किसी तेज आवाज को सुनकर यह जानने लगता है कि आवाज किसकी है तथा कहां से आ रही है तो इसे प्रत्यक्षीकरण कहते हैं ।

यह ज्ञान की दूसरी सीढ़ी है ।

प्रत्यक्षीकरण का पूर्व अनुभव से संबंध होता है 

संवेदना +  अर्थ = प्रत्यक्षीकरण 

या 

संवेदना + विचार = प्रत्यक्षीकरण

 संप्रत्यय निर्माण → 

जब बालक पक्षियों के झुंड के पास जाता है जोर से ताली बजाता है तो सारे पक्षी उड़ जाते हैं । यही से बालक के मस्तिस्क में संप्रत्यय का निर्माण होता है।   

धीरे-धीरे बालक में रंग संप्रत्यय,आकार संप्रत्यय ,भार संप्रत्यत,सौंदर्य संप्रत्यत आदि का निर्माण होने लगता है ।

आत्म संप्रत्यय → सर्वप्रथम आत्म संप्रत्यत की धारणा का प्रस्तुतीकरण विलियम जेम्स ने अपनी पुस्तक “प्रिंसिपल ऑफ साइकोलॉजी” के अंतर्गत किया ।

आत्म संप्रत्यय किशोरावस्था की पहचान है तथा एक विकसित व्यक्तित्व की पहचान है ।

 आत्म संप्रत्यय में व्यक्ति अपने बारे में जानता है समझता है तथा अपने बारे में विचार करता है ।

 अपनी आयु एवं बुराइयों शक्तियों एवं दुर्बलता और सफलताओं और असफलताओं के बारे में जानना तथा उनका आकलन करना है  आत्मसंप्रत्यय है ।

 खेल → 

  • खेल एक जन्मजात प्रवृत्ति हैं ।
  •  यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है ।
  • यह स्पूर्ति दायक क्रिया है ।
  • यह आनंददायक क्रिया है ।
  • यह आत्मप्रेरित क्रिया है ।
  • यह एक निर्देशयपूर्ण क्रिया है ।
  • खेल के साथ जब उद्देश्य जुड़ जाता है तो वह कार्य बन जाता है ।

खेल + जीविकोपार्जन = कार्य 

  • खेल का संबंध काल्पनिक जगत से होता है। जबकि कार्य का संबंध वास्तविक जगत से होता है ।
  •  बालक का सामाजिकरण प्रारंभ होता है – परिवार से 
  • बालक के समाजीकरण का सर्वाधिक प्रेरणास्पद घटक है खेल का मैदान।

जहाँ पर बालक में धैर्य सहनशीलता संयम संतुलन सामन्जस्य अनुशासन आज्ञाकारिता आदि गुणों का विकास होता है ।

इस series में हम psychology के notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
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bal vikas ke siddhant | मनोविज्ञान

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इस series में हम psychology के notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
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बाल विकास के सिद्धांत :-

1. मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत →  सिगमंड फ्रायड

2.मनोलैंगिक विकास → सिगमंड फ्रायड 

3. मनोसामाजिक विकास सिद्धांत – एरिक्सन 

4.संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत – जीन पियाजे 

5.संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत – वाईगोत्सी 

6. नैतिक विकास सिद्धांत – लॉरेंस कोहलबर्ग 

7.भाषा विकास सिद्धांत – नॉम चॉमस्की

1.मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत ( साइके एनालिटिकल थ्योरी ) – विएना ऑस्ट्रिया 

प्रवर्तक →  सिगमंड फ्रायड

★ सिगमंड फ्रायड ने मन की  3 दशाये / बतायी है ।

  •  चेतन मन 1/10 भाग – मस्तिष्क से जागृत अवस्था 
  • अवचेतन मन 9/10 भाग – कटु अनुभूतियों दुखद बातों तथा दमित इच्छाओं का भंडार।
  •  अर्द्धचेतन मन –   चेतन व अचेतन के बीच की अवस्था । याद की हुई बातों को अचानक भूल जाना, अटक जाना ,हकला जाना आदि बातें अर्द्ध चेतन मन को प्रदर्शित करती है ।

★ सिगमंड फ्रायड ने व्यक्तित्व संरचना की दृष्टि से तीन अवस्थाएं बतायी है → 

  •  इड
  •  ईगो
  •  सुपर ईगो 

इड(ID) –  सुखवादी सिद्धांत,इच्छाओं का भंडार ग्रह, अचेतन मन से संबंध,अनैतिक व अपराध कार्य कुसमायोजन के लिए जिम्मेदार ।

ईगो(EGO) – वास्तविक सिद्धांत,चेतन मन से संबंध, समायोजन की अवस्था,ID तथा SUPER EGO के बीच संतुलन का कार्य,व्यक्तित्व कार्यपालक ।

सुपर ईगो(SUPER EGO) – आदर्शवादी सिद्धांत,आध्यात्मिकता की ओर रुझान,नैतिक व आदर्शवादी बातें,आदर्शों की अधिकता व्यक्ति को कुसमायोजित कर सकती है ।

★ सिगमंड फ्रायड में दो मूल प्रवृत्ति बताई है ।

 मूल प्रवृत्ति →  जीवन प्रवृति 

                     मृत्युमूल प्रवृत्ति

★  नार्सिसिज्म –  अपने आप में मस्त रहने तथा अपने आप से प्रेम करने की क्रिया को नार्सिसिज्म कहते हैं ।

★ ऑडीपास व इलेक्ट्रो ग्रंथि – सिगमंड फ्रायड के अनुसार लड़कों में ऑडीपस ग्रंथि होने के कारण वे अपनी मां से अधिक प्रेम करते हैं तथा लड़कियों में इलेक्ट्रो ग्रंथि होने के कारण वे अपने पिता से अधिक प्रेम करती है ।

★ लिबिडो –  सिगमंड फ्रायड ने अपने काम प्रवृत्ति को लिबिडो कहा है । उनके अनुसार यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है और यदि इस प्रवृत्ति का दमन करने की कोशिश की जाती है तो व्यक्ति कुसमायोजित हो जाता है ।

★ शैशव कामुकता –  शैशव कामुकता की बात पर सिगमंड फ्रायड को उनके शिष्य जुंग के बीच मतभेद हो जाता है तथा मतभेद के उपरांत जुंग एक अलग सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं जिसका नाम है विश्लेषणात्मक सिद्धान्त ।

bal vikas ke siddhant
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2.  मनो लैंगिक विकास सिद्धांत ( साइकोसेक्सुअल डेवलपमेंट थ्योरी )

 सिगमंड फ्रायड के अनुसार बालक के विकास  पर उसकी  काम प्रवृत्ति का प्रभाव पड़ता है उनके अनुसार काम प्रवृत्ति बालक में जन्म से पाई जाती है तथा भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में इसका स्वरूप भिन्न भिन्न होता है ।

 इस आधार पर मनोलैंगिक विकास सिद्धांत को 5 अवस्थाओं के द्वारा समझाया है – 

  1.  मुख्य अवस्था/ मौखिक अवस्था –  0 से 1 साल 

इस पहली अवस्था में काम प्रवृत्ति मुख के क्षेत्र में केंद्रित होती है 

  1. गुदिय अवस्था – 1 से 3 वर्ष तक 

इस अवस्था में काम प्रवृत्ति गुदा क्षेत्र में केंद्रित होती है इस अवस्था में बालक जिद्दी आक्रामक व धारणात्मक हो जाता है ।

  1.  लैंगिक अवस्था –  3 से 6 वर्ष

 इस अवस्था में बालक का ध्यान जननांगों की तरफ जाता है। इसी अवस्था में ऑडीपस एवं इलेक्ट्रो ग्रंथियों का विकास होता है ।

  1.  अदृश्यावस्था / प्रसुप्ति अवस्था –  7 से 12 वर्ष 

इस अवस्था में काम प्रवृत्ति अदृश्य हो जाती है यह शरीर के किसी भाग में विद्यमान नहीं होती ।

  1.   जननेंद्रिय व्यवस्था 12 वर्ष के बाद इस अंतिम अवस्था में काम प्रवृत्ति का प्रयोग संतानोंत्पत्ति हेतु किया जाता है।

   3. मानसिक विकास सिद्धांत- एरिकसन 

  • एरिक्सन को नव्य फ्रायडवादी माना जाता है ।
  • क्योंकि एरिक्सन सिगमंड फ्रायड के विचारों से काफी हद तक सहमत है लेकिन एक बात पर सहमत नहीं है ।
  • एरिक्सन का मानना है कि बालक के विकास पर उसकी काम प्रवृत्ति का नहीं बल्कि सामाजिक अनुभूतियों का प्रभाव पड़ता है ।

 इस आधार पर एरिक्सन के मनोसामाजिक सिद्धांत को 8 अवस्थाओं के द्वारा समझाया है

  1.  0 से 2 वर्ष → विश्वास और अविश्वास की अवस्था ।
  2. 3 से 4 वर्ष → स्वतंत्रता संदेह की अवस्था ।
  3. 3 से 6 वर्ष → आत्मबल अपराध की अवस्था  ।
  4. 7 से 12 वर्ष → परिश्रम हीनता की अवस्था ।
  5.  13 से 18 वर्ष → पहचान भूमि की द्वंद की अवस्था ।
  6.  19 से 35 वर्ष → घनिष्ठता अलगाव की अवस्था। 
  7.  36 से 55 वर्ष → उत्पादकता निष्क्रियता की अवस्था 
  8. 55 वर्ष के बाद → इमानदारी निराशा की अवस्था
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4. संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत (कॉग्निटिव डेवलपमेंट थ्योरी ) :- 

 प्रवर्तक :- जीन पियाजे

               स्विट्ज़रलैंड 

  • सर्वप्रथम स्विट्जरलैंड के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक पक्ष का क्रमबद्ध तथा  वैज्ञानिक अध्ययन किया ।
  • संज्ञान प्राणी का विज्ञान है जिसे वह वातावरण/उद्दीपक जगत/बाह् जगत के माध्यम से ग्रहण करता है ।
  • संज्ञान के अंतर्गत अवदान,स्मरण चिंतन,कल्पना निरीक्षण,वर्गीकरण,तर्क वितर्क,समस्या समाधान, संप्रत्ययीकरण,प्रत्यक्षण आदि । मानसिक क्रियायें सम्मिलित होती है। ये क्रियाएं परस्पर अंतरसंबंधित होती है ।
  • जीन पियाजे के संज्ञानात्मक पक्ष पर बल देते हुए संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत का प्रतिपादन किया इसीलिए जीन पियाजे की विकासात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है ।
  • विकासात्मक मनोविज्ञान के अंतर्गत जन्मपूर्व अथार्त् गर्भावस्था से वृद्धावस्था तक होने वाले विकास का अध्ययन किया जाता है ।
  • बाल विकास के अंतर्गत गर्भावस्था से किशोरावस्था तक होने वाले विकास का अध्ययन किया जाता है ।
  •  विकास प्रारंभ होता है गर्भावस्था से संज्ञान विकास शैशवावस्था से प्रारंभ होकर जीवन पर्यंत चलता रहता है ।

जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत को चार अवस्थाओं के द्वारा समझाया है – 

  1. संवेदी पेशीय अवस्था/इंद्रिय जनित अवस्था – 0 से 2 वर्ष 

जन्म के समय शिशु बाहय जगत के प्रति अनभिज्ञ होता है धीरे-धीरे व आयु वृद्धि के साथ-साथ अपनी संवेदनाएं (ज्ञानेंद्रियों) व शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से बाह्य जगत का ज्ञान ग्रहण करता है ।

● वह वस्तु को देखकर सुनकर स्पर्श करके गंध के द्वारा तथा स्वाद के माध्यम से ज्ञान ग्रहण करता है ।

● छोटे छोटे शब्दों को बोलने लगता है ।

● परिचितों का मुस्कान के साथ स्वागत करता है तथा अपरिचितों को देखकर भय का प्रदर्शन करता है ।

● वस्तु स्थायित्व का अभाव पाया जाता है ।

2.पूर्व संक्रियात्मक अवस्था 2 से 7 वर्ष → 

 इस अवस्था में शिशु दूसरों के संपर्क से खिलौने से वह अनुकरण के माध्यम से सीखता है । खिलौनों की आयु इसी अवस्था को कहा जाता है  ।

  • शिशु अक्सर लिखना गिनती गिनना रंगों को पहचानना वस्तुओं को क्रम से रखना हल्की भारी का ज्ञान होना माता पिता की आज्ञा मानना पूछने पर नाम बताना घर के छोटे-छोटे कार्यों में मदद करना आदि सीख जाता है । लेकिन वह तर्क वितर्क करने योग्य नहीं होता इसलिए इसे अतार्किक चिंतन की अवस्था के नाम से भी जाना जाता है।
  • निर्जीव वस्तुओं में सजीव चिंतन करने लगता है ।  इसे जीववाद कहते हैं ।
  • प्रतीकात्मक सोच पाई जाती है ।
  • वस्तु स्थायित्व का भाव जाग्रत हो जाता है ।
  • शिशु अहमवादी होता है । तथा दूसरों को कम महत्व देता है ।
  • अनुक्रमणशीलता पाई जाती है ।

3.  स्थूल/मूर्त संक्रियात्मक अवस्था → 7 से 12 वर्ष 

इस अवस्था में तार्किक चिंतन प्रारंभ हो जाता है लेकिन बालक का चिंतन केवल मूर्त वस्तुओं तक ही समिति रहता है वह अपने सामने उपस्थित दो वस्तुओं के बीच तुलना करना अंतर करना समानता और असमानता बताना सही गलत वह उचित अनुचित में विभेद करना आदि सीख जाता है।  इसीलिए इसे मूर्त चिंतन की अवस्था के नाम से भी जाना जाता है ।

  • बालक दिन तारीख समय महीना वर्ष आदि बताने योग्य हो जाता है उत्क्रमण शीलता पाई जाती है ।

4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था →  12 वर्ष के बाद

  • इस अवस्था में किशोर मूर्त के साथ-साथ अमूर्त चिंतन करने योग्य भी हो जाता है । इसलिए इस अवस्था को तार्किक चिंतन की अवस्था के नाम से भी जाना जाता है । 
  • इस अवस्था में मानसिक योग्यताओं का पूर्ण विकास हो जाता है ।
  • परिकल्पनात्मक चिंतन पाया जाता है ।

नॉट :- परिकल्पना किसी भी समस्या पर संभावना व्यक्त करना परिकल्पना कहलाता है

   जीन पियाजे का शिक्षा में योगदान → 

  1. जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत का प्रतिपादन किया ।
  2.  बाल केंद्रित शिक्षा पर बल दिया ।
  3. जीन पियाजे शिक्षण में शिक्षक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहते हैं कि :- ◆ एक शिक्षक को बालक की समस्या का निदान करना चाहिए । ◆बालकों के अधिगम के लिए उचित वातावरण तैयार करना चाहिए ।
  4. जीन पियाजे ने बुद्धि को जीव विज्ञान की स्किमा की भांति बतलाकर बुद्धि की एक नवीन व्याख्या प्रस्तुत की ।
  5.  जीन पियाजे ने आत्मीकरण समंजन संतुलनीकरण व् स्किमा  जैसे-  नवीन शब्दों का प्रयोग कर शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया ।

स्कीमा – वातावरण द्वारा अर्जित संपूर्ण ज्ञान का संगठन ही स्किमा है ।

  1. मानसिक संरचना की व्यवहारगत समानांतर प्रक्रिया जीव विज्ञान में स्किमा कहलाती है । अथार्त् किसी उद्दीपक के प्रति विश्वसनीय अनुक्रिया को स्किमा कहते हैं ।
bal vikas ke siddhant
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5 . संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत –

 प्रवर्तक – वाइगोत्सी 

  •  वाईगोत्सी का मानना है कि बालक की संज्ञानात्मक विकास पर सामाजिक कारको  व भाषा का प्रभाव पड़ता है ।इसलिए इस सिद्धांत को सामाजिक सांस्कृतिक सिद्धांत के नाम से भी जाना जाता है ।
  • इस सिद्धांत के अनुसार संज्ञानात्मक विकास अंतर वैयक्तिक सामाजिक परिस्थिति में संपन्न होता है । अथार्त कुशन विद्वान व्यक्तियों के साथ अंत क्रिया के माध्यम से बालक का विकास होता है । इसलिए इस सिद्धांत को समीपस्थ विकास सिद्धांत क्षेत्र भी कहा जाता है

 6. नैतिक विकास का सिद्धांत ( मोरल डेवलपमेंट थ्योरी ) :- 

 लॉरेंस कोहलबर्ग 

लॉरेंस कोहलबर्ग का मानना है कि बालक के नैतिक विकास को  समझने के लिए उसके तर्क व चिंतन का विश्लेषण करना आवश्यक है । इस आधार पर उन्होंने नैतिक विकास सिद्धांत की छह अवस्थाएं बतायी है  तथा उन्हें भी तीन स्तरो में बांटा है ।

  1.  प्रीकनवेंशनल स्तर/पूर्व परंपरागत स्तर →  4 से 10 वर्ष

 इस स्तर में बालक के तर्क व चिंतन का आधार बाहरी घटना होती है । वह बाहरी घटना के आधार पर किसी को सही गलत तथा उचित व अनुचित बताता है । 

इस स्तर की दो अवस्थाएं है :- १ आज्ञा एवं दंड की अवस्था २ .अहंकार की अवस्था/अदला-बदली की अवस्था 

  1. कन्वेंशनल स्तर/परंपरागत स्तर → 10 से 13 वर्ष 

इस स्तर में बालक के तर्क व चिंतन का आधार सामाजिक होता है इसकी दो अवस्थाएं है :- १ प्रशंसा की अवस्था उत्तम लड़का अच्छी लड़की की अवस्था २ सामाजिक अवस्था के प्रति सम्मान की अवस्था

  1.  पोस्ट कन्वेंशनल/स्तर परंपरागत स्तर 13 वर्ष के बाद

 इस स्तर में बालक के तर्क व चिंतन का आधार विवेक होता है । इस स्तर की दो अवस्थाएं हैं १.सामाजिक समझौते की अवस्था २.विवेक की अवस्था 

लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत की 5 अवस्थाएं और बताइयी है – 

  1.  पूर्व नैतिक अवस्था – 0 से 2 वर्ष 
  2. स्वकेंद्रित अवस्था 2 से 7 वर्ष 
  3. परंपराओं को धारण  करने वाली अवस्था –  7 से 12 वर्ष 

इसी अवस्था से बालक का नैतिक अथवा चारित्रिक विकास प्रारंभ होता है 

  1. आधारहीन आत्मचेतना अवस्था –  13 से 12 वर्ष 

इस अवस्था में किशोर आधारहिन व खोखले आदर्शों की बातें करता है तो जो उसे यथार्थता के धरातल से दूर ले जाती है । इस अवस्था में किशोरों का व्यक्तित्व सिगमंड फ्रायड सुपर ईगो द्वारा संचालित होता है ।

इसीलिए इस अवस्था के व्यक्ति को देवदूत माना जाता है ।

  1. आधारयुक्त आत्माचेतना अवस्था – 18 वर्ष के बाद

 इस अवस्था में व्यक्ति की बातें आधारयुक्त  व तर्क सम्मत होती है । व्यक्ति केवल भावनाओं से ही नहीं बल्कि विचारों से भी काम लेता है ।

7  बांस भाषा विकास सिद्धांत 

नॉम चोमस्की के अनुसार → बालक में भाषा ग्रहण करने की जन्मजात प्रवृत्ति होती है ।  इसे भाषा अर्जन तंत्र के नाम से जाना जाता है ।

बालक जिस भाषा को सुनता है उसकी व्याकरण को अपने आप सीख जाता है इसलिए इस सिद्धान्त को जेनरेटिव ग्रामर थ्योरी भी कहा जाता है

भाषा विकास → 

1.पॉवलाव के अनुसार → बालक भाषा शब्द व अर्थ के मध्य संबंध स्थापित करके सीखता हैं । इस संबंध को प्रॉब्लम में अनुबंधन नाम दिया है ।  अतः पॉवलाव के अनुसार बालक भाषा अनुबंधन के माध्यम से सीखता है ।

2. स्किनर के अनुसार  → बालक भाषा अनुकरण व पुनर्वसन के माध्यम से सीखता है  ।

3. बाण्डुरा के अनुसार → बालक भाषा अनुकरण से सीखता है । बाण्डुरा ने भाषा विकास में  पुनर्वसन को महत्व दिया है ।

इस series में हम psychology के notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
psychology notes के इस series में आज हम bal vikas ke siddhant के बारे में पढेंगे तो बने रहिए popularstudy के साथ |

bal vikas | बाल विकास की अवस्थाएं

bal vikas

इस series में हम psychology के notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
psychology notes के इस series में आज हम bal vikas व बाल विकास की अवस्थाओं के बारे में पढेंगे तो बने रहिए popularstudy पर |

    **बाल विकास 【Child Development】**

परिचय → 

→ शताब्दियों पूर्व मनोविज्ञान को दर्शनशास्त्र की एक शाखा के रूप में माना जाता था ।

→ मनोविज्ञान को स्वतंत्र विषय बनाने के लिए इसे परिभाषित करना शुरू किया गया ।

→ सायकोलॉजी शब्द की उत्पत्ति लैटिन व यूनानी ग्रीक भाषा के दो शब्द साईंके(psyche) +  लोगस (logos)  से मिलकर हुई है ।

साइकी का अर्थ होता है – आत्मा का 

लोगस का अर्थ होता है अध्ययन करना / विज्ञान 

→ इसी शाब्दिक अर्थ के आधार पर सर्वप्रथम प्लेटो अरस्तु डेकार्टे आदि के द्वारा मनोविज्ञान को आत्मा का विज्ञान माना गया ।

→ आत्मा शब्द की स्पष्ट व्याख्या नहीं होने के कारण 16 वीं शताब्दी के अंत में यह परिभाषा अमान्य हो गई ।

→ 17 वीं शताब्दी में इटली के मनोवैज्ञानिक पोम्पोनाजी ने मनोविज्ञान को मन या  मस्तिष्क का विज्ञान माना ।

बाद में यह परिभाषा भी अमान्य हो गई ।

→  19वीं शताब्दी में विलियम वुन्ट विलियम जेम्स वाइल्स जेम्स आदि के द्वारा मनोवैज्ञानि को  चेतना का विज्ञान माना गया ।

 अपूर्ण अर्थ होने के कारण यह परिभाषा भी अमान्य हो गई ।

 विलियम वुन्ट ने जर्मनी के लिपजिंग स्थान पर 1873 में प्रथम मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला स्थापित की ।

  इसलिए विलियम वुन्ट को प्रयोगात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है। 

 इसी समय से 1879 में मनोविज्ञान दर्शनशास्त्र की शाखा के रूप में अलग होकर एक स्वतंत्र विषय के रूप में सामने आया ।

→  लिपजिंग विश्वविद्यालय को वर्तमान में कार्ल मार्क्स विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है ।

विलियम मैकडुगल ने अपनी पुस्तक आउटलाइन साइकोलॉजी के पृष्ठ नंबर-16  पर  चेतना शब्द की कड़ी निंदा की ।

→ बीसवीं शताब्दी मे मेंनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान माना गया तथा आज तक यही परिभाषा प्रचलित है ।

→ व्यवहार का विज्ञान मानने वाले प्रमुख मनोवैज्ञानिक है– वॉटसन इनके अलावा वुडवर्थ स्किनर, थॉर्नडाइक, मैकडुगल आदि के द्वारा मनोविज्ञान को व्यवहार का विज्ञान माना गया है ।

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→ व्यवहारवाद के जनक –  वाटसन तथा व्यवहारवादी वंशानुक्रम में कम विश्वास तथा वातावरण में अधिक विश्वास करते हैं ।

इसलिए वॉटसन ने परिभाषा दी है —

 “तुम मुझे कोई भी बालक दे दो मैं उसे जैसा चाहे वैसा बना सकता हूं ।” 

वुडवर्थ –

 “मनोविज्ञान में सर्वप्रथम अपनी आत्मा का त्याग किया फिर मन का त्याग किया फिर चेतना का त्याग किया और आज मनोविज्ञान व्यवहार की तिथि के स्वरूप को स्वीकार करता है।”

क्रो एंड क्रो –

“बीसवीं शताब्दी बच्चों की शताब्दी है ।”

  • मनोविज्ञान के जनक – अरस्तु
  •  शिक्षा मनोविज्ञान के जनक – थार्नडाइक
  •  प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के जनक – विलियम वुन्ट 
  • अमेरिकन मनोविज्ञान के जनक – विलियम जेम्स 
  • विकासात्मक मनोविज्ञान के जनक – जीन पियाजे
  •  किशोर मनोविज्ञान के जनक – स्टैनले हॉल 
  • व्यक्तित्व मनोविज्ञान के जनक ऑल पोर्ट
  •  मूल प्रवृत्ति के जनक – मैकडुगल

      ******* बाल विकास (bal vikas/Child Development) ********

→ 18वीं शताब्दी में सर्वप्रथम पेस्टोलॉजि के द्वारा बाल विकास का वैज्ञानिक विवरण प्रस्तुत किया गया । उन्होंने अपने ही साडे 3 वर्षीय पुत्र पर अध्ययन किया तथा बेबी बायोग्राफी तैयार की ।

→ 19वीं शताब्दी में अमेरिका में बाल अध्ययन आंदोलन की शुरुआत हुई । इसके जन्मदाता थे –  स्टैनले हॉल ।

उन्होंने चाइल्ड स्टडी सोसायटी व चाइल्ड वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन जैसी संस्थाओं की स्थापना की ।

→  1887 में न्यूयॉर्क में सबसे पहला ‘बाल सुधार गृह’ स्थापित किया गया ।

→ बीसवीं शताब्दी में बाल विकास पुस्तकों का प्रकाशन किया गया ।

→ भारत में बाल विकास के अध्ययन की शुरुआत  लगभग 1930 से मानी जाती है ।

बर्क के अनुसार–

“बाल विकास मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत जन्म पूर्व अथार्त् गर्भावस्था से किशोरावस्था तक होने वाले विकास का अध्ययन किया जाता है।”

अभिवृद्धि और विकास में अंतर – 

अभिवृद्धि                                                                       विकास

केवल शारीरिक पक्ष में होने वाला 

परिवर्तन                                       –                    संपूर्ण पक्षों में होने वाला परिवर्तन

 एकपक्षीय                                      –                                बहुपक्षीय 

 संकुचित अर्थ                                 –                              व्यापक अर्थ 

कुछ कुछ समय पश्चात रुक जाना।    –   जीवन पर्यंत चलना 

केवल आकार बढ़ने से संबंध                    –                    संपूर्ण परिवर्तनों से संबंध 

सीधे नापा- तौला जा सकता है                     –                   सीधा मापन संपन्न नहीं 

परिमाणात्मक/संख्यात्मक/मात्रात्मक    –    परिमाणात्मक एवं गुणात्मक 

                                                                          

रचनात्मक परिवर्तन                            –                      रचनात्मक एवं विनाशक परिवर्तन 

विवृद्धि सूचक।                                      –                        विवृद्धि सूचक व हास् सूचक 

→  श्रीमती हरलॉक ने विकास क्रम में होने वाले परिवर्तनों को चार भागों में बांटा है – 

  1. आकार में परिवर्तन 
  2. अनुपात में परिवर्तन 
  3. पुराने चिह्नों का लोप
  4.  नवीन चिन्हों का उदय

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विकास के नियम –

 1 समान प्रतिमान का नियम – विकास समान नियमों पर आधारित होता है । इसमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता ।

2 क्रमबद्धता का नियम / निश्चित शृंखला का नियम

 विकास क्रमानुसार होता है ।

3. सतत विकास का नियम /निरंतरता का नियम  – विकास जीवन पर्यंत चलता है ।

4 परस्पर सम्बन्ध का नियम – विकास के चारों पक्ष परस्पर संबंधित होते हैं लेकिन घनिष्ठ संबंध शारीरिक व मानसिक विकास में होता है ।

5 सामान्य से विशिष्ट क्रियाओं का नियम  – शिशु पहले सामान्य क्रियाओं करता है व उसके बाद विशिष्ट क्रियाये करता है ।

6 निश्चित दिशा का नियम/मस्तबोधमुखी नियम

 विकास हमेशा सिर से पैर की ओर होता है ।

7 .व्यक्तिगत विभिन्नता का नियम – जन्म से ही कोई बालक प्रतिभाशाली होता है कोई  सामान्य बुद्धि का होता है तो कोई मंदबुद्धि होता है ।

8 विकास की गति में विविधता का नियम – प्रतिभाशाली बालक का विकास तीव्र गति से सामान्य बुद्धि बालक का सामान्य गति से तथा मंदबुद्धि बालक का विकास मंदगति से होता है ।

9 निकट-दूर का नियम –  विकास केंद्र से शिरो की ओर होता है ।

10 अंत क्रिया का नियम – देखकर सुनकर व अनुकरण से सीखना  ।

दूसरा बालक तीव्र गति से सीखता है कि उसे अंत क्रियाओं का अधिक अवसर मिलता है ।

11 वर्तलुकार का नियम –  विकास केवल लंबाई में ना होकर अथार्त्  रेखीय ना होकर चारों और होता है ।

12 वंशानुक्रम और वातावरण के गुणनफल का नियम – व्यक्ति का विकास वंशानुक्रम व  वातावरण दोनों का प्रतिफल है ।

व्यक्ति  = वंशानुक्रम (H) + वातावरण(E)

विकास को प्रभावित करने वाले कारक :- 

【A】 वंशानुक्रम 

यह विकास को प्रभावित करने वाला प्रमुख कारण है ।

( वंशानुक्रम × वातावरण) 

बालक को अपने माता-पिता व पूर्वजों की जो विशेषताएं जन्म या गर्भाधान के समय से प्राप्त होती है उसे ही वंशानुक्रम या अनुवांशिकता कहते हैं ।

वंशानुक्रम के सिद्धांत 

2 बिज़मेल का जन्म द्रव्य की जनता का सिद्धांत → इस सिद्धांत के अनुसार शरीर का निर्माण करने वाला द्रव्य कभी भी नष्ट नहीं होता ।

यह पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता है ।

 यही कारण है कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में निरंतर गुणों का संचरण होता रहता है ।

3 उपार्जित / अर्जित गुणों के संचरण का सिद्धांत 

प्रवर्तक – लेयार्ड 

इस सिद्धांत के अनुसार अर्जित गुणों का संचरण होता है ।

 जिराफ की गर्दन संबंधी प्रयोग ।

4 गोल्टन का जीव सांख्यिकी सिद्धांत  – 

इस सिद्धांत के अनुसार बालक में गुणों का संचरण केवल माता-पिता से ना होकर पूर्वजों से भी होता है ।

5 मेंडल का सिद्धांत – 

मेंडल ने मटर के दानों तथा काले और सफेद चूहों पर प्रयोग करके यह निष्कर्ष निकाला है कि एक ही माता-पिता से उत्पन्न संतानों में भी विभिन्नता पाई जाती है ।

6 वंशानुक्रम के नियम 

समानता का नियम – जैसे माता-पिता वैसी संतान

 भिन्नता का नियम – जैसे माता-पिता उनसे कुछ भिन्न  संतान 

प्रत्यागमन का नियम  – जैसे माता-पिता उनके ठीक विपरीत संतान 

【B】वातावरण 

यह विकास को प्रभावित करने वाला दूसरा प्रमुख कारक है ।

वातावरण का पर्यायवाची शब्द – पर्यावरण जोकि दो शब्दों से मिलकर बना है  –

परी + आवरण 

परी का अर्थ होता है – चारों ओर

 आवरण का अर्थ होता है – घेरने वाला है ढकने वाला ।

 अर्थात जो कुछ भी हमें चारों ओर से घेरे हुए हैं वहीं पर्यावरण है ।

रोस –

   “वातावरण कोई बाहरी शक्ति है जो हमें प्रभावित करती है।”

नोट –  वातावरण के अंतर्गत बालक एक उच्च संगठित ऊर्जा तंत्र है ।

वातावरण के अंतर्गत निम्न कारक बालक के विकास को प्रभावित करते हैं ।

  1. पारिवारिक वातावरण ।
  2. विद्यालयी वातावरण 
  3. सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण
  4.  भौगोलिक वातावरण 
  5. मनोवैज्ञानिक वातावरण 
  6. जनसंचार माध्यम 

विकास की अवस्थाएं :- 

  • शैशवावस्था जन्म से 6 वर्ष तक 
  • बाल्यावस्था 7 से 12 वर्ष तक 
  • किशोरावस्था 13 से 18 वर्ष तक 
  • प्रौढ़ावस्था 18 वर्ष के बाद 

शैशवावस्था 

शैशवावस्था को निम्न नामों से जाना जाता है ।

  • जीवन का सबसे महत्वपूर्ण काल –  अतार्किक चिंतन की अवस्था 
  • भावी जीवन की आधारशिला
  •  संस्कारों के निर्माण की अवस्था
  •  सीखने का आदर्श कला 
  • खिलौने की आयु (क्षणिक मित्रता )
  • सीखने की आयु 
  • प्रिय लगने वाली अवस्था 
  • मन की मौजों में विचरण करने की अवस्था 
  • नाजुक अवस्था 
  • खतरनाक अवस्था
  •  नर्सरी स्कूल एज / पूर्व विद्यालयी आयु (3 – 6 वर्ष )
  • प्रारंभिक विद्यालय की पूर्व तैयारी की अवस्था

 शैशवावस्था के विकासात्मक कार्य एवं विशेषताएं :- 

 नोट :- सर्वप्रथम विकासात्मक कार्य का संप्रत्यय विचार हैविंग हर्बट के द्वारा दिया गया ।

विकासात्मक कार्य से तात्पर्य बालक की उम्र तथा अवस्था के अनुसार कार्य करने से है ।

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विशेषताएं – 

  1. शारीरिक व  मानसिक विकास तीव्र गति से ।
  2.  जिज्ञासा प्रवर्ति
  3.  सीखने की प्रक्रिया में तीव्रता 
  4. सीमित मात्रा में कल्पना
  5.  दूसरों पर निर्भर 
  6. दूसरे शिशु के प्रति रुचि
  7.  दोहराने की प्रवृत्ति 
  8. अनुकरण द्वारा सीखना
  9.  अपनी संवेदना (ज्ञानेंद्रियों) व शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से सीखना
  10.  स्वार्थी व स्वकेंद्रित 
  11. संवेगो  का प्रदर्शन 
  12. मूल प्रवत्यात्मक व्यवहार 
  13. नैतिक व सामाजिक भावना का अभाव
  14.  न तो सामाजिक और ना ही असामाजिक 
  15. कहानियां सुनना एवं सुनाना 
  16. दो वर्ष तक की आयु  तक मलमूत्र विसर्जन के संकेत देना 
  17. चार वर्ष की आयु तक मलमूत्र विसर्जन पर नियंत्रण करना
  18.  सुनना बोलना पढ़ना लिखना आदि भाषाई कौशलों की आधारभूत समझ ।

शैशवावस्था से संबंधित कथन :-

 सिगमंड फ्रायड के अनुसार – “जीवन के पहले चार पांच वर्षों में बालक भावी जीवन की नींव रख लेता है।”

वैलेंटाइन – “शैशवावस्था सीखने का आदर्श कला है।”

वाटसन – “शैशवावस्था में सीखने की सीमा और तीव्रता विकास की और किसी अवस्था से बहुत अधिक होती है।”

 गुडएनफ – “व्यक्ति का जितना भी मानसिक विकास होता है उसका आधा तीन वर्ष तक हो जाता है ।”

बाल्यवस्था 

  • संग्रह करने की प्रवृत्ति 
  • वैचारिक क्रिया अवस्था 
  • भाई बहनों में झगड़ा 
  • पक्षपात की भावना 
  • संवेग पर नियंत्रण 
  • नैतिक सामाजिक भावना का विकास 
  • मूर्त चिंतन की अवस्था 
  • निर्माणकारी काल 
  • अनोखा काल
  •  प्रारंभिक विद्यालय की आयु 
  • शैक्षिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण काल 
  • गैंग एज (टोली दल समूह की आयु )
  • मिथ्या/ह्रदय  परिपक्वता का काल 
  • प्रतिबंधात्मक समाजीकरण का काल 
  • गेम एज (खेल की आयु) 
  • उत्पाती अवस्था 

बाल्यावस्था के विकासात्मक कार्य व विशेषताएं 

  • शारीरिक व मानसिक विकास में स्थिरता 
  • जिज्ञासा प्रवृत्ति में प्रबलता 
  • यथार्थवादी दृष्टिकोण 
  • रचनात्मक प्रवृत्ति का विकास
  •  निरउद्देश्य भ्रमण करने की प्रवृत्ति 
  • संग्रह करने की प्रवृत्ति 
  • चोरी करना वह झूठ बोलना 
  • भाई बहनों में झगड़ा 
  • प्रशंसा पाने की इच्छा 
  • प्रतिस्पर्धा की भावना 
  • पक्षपात की भावना का शिकार हीन भावना का शिकार 
  • संवेगो पर नियंत्रण 
  • नैतिक व सामाजिक भावना का विकास 
  • संवेगात्मकता में सामाजिकता का विकास 
  • भाषा एवं संप्रेषण योग्यता का विकास 
  • समलिंगी समूह भवना
  •  नेता बनने की इच्छा 
  • खोखली मित्रता 
  • खेलों में रूचि
  • मृत चिंतन की योग्यता आदि ।

बाल्यावस्था से संबंधित कथन  – 

ब्लेयर जोन्स एवं सिम्पसन –  “बाल्यावस्था  वह काल है जब व्यक्ति के बुनियादी दृष्टिकोण मूल्य तथा आदर्श एक बड़ी सीमा तक निरूपित किए जाते हैं”

“शैक्षिक दृष्टिकोण से जीवन चक्र में बाल्यवस्था से महत्वपूर्ण और कोई अवस्था नहीं है।” 

 रास – “बाल्यावस्था मिथ्या परिपक्वता का काल है।” 

किलपैट्रिक – “बाल्यवस्था प्रतिबंधात्मक समाजीकरण का काल है।” 

कॉल एवं ब्रुश:-  “बाल्यावस्था प्रतिबंधात्मक समाजीकरण का काल  है ।” 

स्टैंग –  ऐसा शायद ही कोई खेल हो जिसे 10 वर्ष का बालक मत होता है ।

      किशोरावस्था 

सर्वप्रथम अमेरिका के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक स्टैनले हॉल ने किशोरावस्था का क्रमबद्ध व वैज्ञानिक अध्ययन किया उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Adolescence” के अंतर्गत 1904 में किशोरावस्था के एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया ।

किशोरावस्था के सिद्धांत –

त्वरित विकास का सिद्धांत :- स्टैनले हॉल 

इस सिद्धांत के अनुसार किशोरावस्था में विकास आकस्मिक होता है ।

क्रमिक विकास का सिद्धांत :- थार्नडाइक  होलिंग बर्थ 

इस सिद्धांत के अनुसार किशोरावस्था में विकास धीरे-धीरे अथार्त् कर्मानुसार होता है ।

किशोरावस्था को निम्न नामों से जाना जाता है 

  • जीवन का सबसे कठिन काल 
  • आंधी तूफान की अवस्था
  •  तनाव संघर्ष की अवस्था 
  • उलझन की अवस्था 
  • झंझावातों की अवस्था 
  • समस्याओं की आयु 
  • स्वर्ण काल
  •  बसंत ऋतु
  •  द्रुत एवं तीव्र विकास की अवस्था
  •  तार्किक चिंतन की अवस्था
  •  संक्रमण अगर प्रतिवर्ती अवस्था
  •  अस्पष्ट व्यक्तिक स्थिति की अवस्था 
  • विशिष्टता की खोज का समय
  •  परिवर्तन की अवस्था
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किशोरावस्था के विकासात्मक कार्य व विशेषताएं

  • चौमुखी विकास तथा शारीरिक मानसिक सामाजिक और संवेगात्मक विकास 
  • बुद्धि का अधिकतम विकास 
  • व्यक्तिगत एवं घनिष्ठ मित्रता
  •  कल्पना का बाहुल्य 
  • दिवास्वप्पनो की प्रवृत्ति 
  • वीर पूजा/नायक पूजा की प्रवृत्ति 
  • आत्मसम्मान को महत्व 
  • पीढ़ियों में अंतर के कारण विचारों में मतभेद 
  • समायोजन का अभाव 
  • मानसिक स्वतंत्रता का विद्रोह की स्थिति
  •  अपराध प्रकृति का विकास 
  • स्वतंत्र सोच का विकास
  •  ईश्वर तथा धर्म में विश्वास या अविश्वास 
  • समाज सेवा व देशभक्ति की भावना 
  • सामाजिक स्वीकृति की भावना 
  • विचारों व संदेशों में परिपक्वता 
  • संवेगात्मक परिवर्तन तीव्र गति से 
  • अपनों से बिछड़ने का गम 
  • समवयस्क समूह भावना 
  • नेतृत्व का विकास 
  • स्वपहचान 
  • आत्म चेतना की भावना 
  • आत्म संप्रत्यय की भावना 
  • आत्मनिर्भर बनाने की इच्छा 
  • व्यवसायिक चुनाव की चिंता
  •  अमूर्त चिंतन की योग्यता 
  • काम प्रवृत्ति 

आत्म प्रेम समलिंगी प्रेम विषमलिंगी प्रेम

  •  आत्मनिर्भरता बनाम निर्भरता 
  • आदर्शवाद बनाम यथार्थवाद 
  • समस्यात्मक बालक 
  • अध्ययन के प्रति गंभीर 
  • विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण 
  • जीवनसाथी के चुनाव की समस्या 
  • मादक पदार्थों के सेवन करने की समस्या 
  • वित्तीय समस्या 
  • आत्महत्या की समस्या 

किशोरावस्था से संबंधित कथन

स्टैनले हॉल –

“किशोरावस्था प्रबल दबाव व तनाव तूफान एवं संघर्ष का काल है।” 

दूसरी परिभाषा – “किशोरों में जो शारीरिक मानसिक व संवेगात्मक परिवर्तन होते है वे अकस्मात् होते हैं।”

वैलेंटाइन – “व्यक्तिगत एवं घनिष्ठ मित्रता किशोरावस्था की विशेषता होती है।”

 दूसरी परिभाषा – “किशोरावस्था अपराध प्रवृत्ति के विकास का भाव नाजुक समय है।” 

 किलपैट्रिक – “किशोरावस्था जीवन का सबसे कठिन काल है।”

जॉन्स –  “किशोरावस्था शैशवावस्था की पुनरावृत्ति है”

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abhiprerna in psychology | अभिप्रेरणा

abhiprerna in psycholog

इस series में हम psychology के notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
psychology notes के इस series की शुरुआत हम इसके पहलें अध्याय अधिगम,चिंतन,अभिप्रेरणा से करेंगे |आज हम psychology notes के अंतर्गत abhiprerna in psychology के बारे में पढेंगे तो बने रहिए popularstudy पर |

अभिप्रेरणा (Motivation)

 मोटिवेशन शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के मोटम (MOTAM) से हुई |

 इसका शाब्दिक अर्थ है →  गति करना |

अभिप्रेरणा एक ऐसा प्रेरक बल है, जो व्यक्ति को लक्ष्य प्राप्ति की ओर या निश्चित व्यवहार करने के लिए अग्रसर करता है,अथवा गति प्रदान करता है |

 क्रैच एवं क्रैचफील्ड →  “अभिप्रेरणा हमारे ‘क्यों’ का उत्तर देती है”

स्किनर →  “अभिप्रेरणा अधिगम का सर्वोत्कृष्ट राजमार्ग है |”

 गुड →  “किसी क्रिया को आरंभ करने उसे जारी रखने व नियंत्रित करने की प्रवृत्ति ही अभिप्रेरणा है |”

 अभिप्रेरणा की विशेषताएं ;–

  1. अभिप्रेरणा अधिगम का सर्वोत्तम सोपान है |
  2.  अभिप्रेरणा अधिगम का सर्वोत्कृष्ट राजमार्ग है |
  3.  अभिप्रेरणा अधिगम का हार्ट है (Heart Of Learning ) |
  4.  अभिप्रेरणा अधिगम का मुख्य चालक है |
  5.  अभिप्रेरणा अधिगम का स्वर्ण पथ है |
  6. अभिप्रेरणा अधिगम के लिए अनिवार्य स्थिति है |
  7. अधिगम सर्वोत्तम होगा जब अभिप्रेरणा  होगी |

अभिप्रेरणा के स्रोत :–

 1.आवश्यकता (Need) :- प्रत्येक व्यक्ति की कोई न कोई आवश्यकता होती है जो उसे क्रिया करने के लिए प्रेरित करती है |

 2.चालक/अंतर्नोद/Drive –  पर्णोंदान प्रत्येक आवश्यकता से जुड़ा हुआ एक चालक होता है |

     जैसे:-  भोजन की आवश्यकता से जुड़ा हुआ चालक भूख|

               पानी की आवश्यकता से जुड़ा हुआ चालक प्यास |

जो कि व्यक्ति को क्रिया करने के लिए प्रेरित करते हैं |

3. उद्दीपक/प्रोत्साहन/Incentive ;–  उद्दीपक सामने होने पर व्यक्ति क्रिया करने के लिए प्रेरित होता है | उद्दीपक के मिलने पर चालक शांत हो जाता है व तनाव समाप्त हो जाता है |

अभिप्रेरक(Motive) :–

 उपरोक्त तीनों का योग ही अभीप्रेरक है |

अभिप्रेरक  = आवश्यकता + चालक  + उद्दीपक

                   Motive  = N + O + I 

 अभिप्रेरक का वर्गीकरण :–

 मैंसलो के अनुसार     — १.जन्मजात अभिप्रेरक 

                                    २.अर्जित अभिप्रेरक 

 थॉमसन के अनुसार    —   १.स्वाभाविक अभिप्रेरक 

                                      २. कृत्रिम अभिप्रेरक 

गैरेट के अनुसार            —  १. जैविक/दैहिक  अभिप्रेरक |

                                      २. मनोवैज्ञानिक अभिप्रेरक |

                                      ३. सामाजिक अभिप्रेरक |

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 अभिप्रेरणा के सिद्धांत —

[1] मूलप्रवृत्यात्मक सिद्धांत 

    प्रवर्तक → विलियम मैकहुगल 

 सर्वप्रथम मनुष्य व जीव जंतुओं के व्यवहार की व्याख्या करने के लिए विलियम मैकहुगल  को मूलप्रवृत्यात्मक सिद्धांत का प्रतिपादन किया इसीलिए विलियम मैकहुगल  को “मूल प्रवृति” का जनक माना जाता है |

इन्होंने 14 मूल प्रवृत्तियां बनाई है और कहां है कि प्रत्येक मूल प्रवृत्ति से जुड़ा हुआ एक संवेग होता है |

 संवेद उत्पन्न होने पर जो क्रिया होती है उसे मूल प्रवृत्ति कहते हैं |

              संवेग                                           मूल प्रवृत्ति 

  • भय                                                 पलायन
  • क्रोध                                                युद्ध प्रवृत्ति 
  • भूख                                                भोजनान्वेषण
  • घृणा                                              अप्रियता/विकर्षण
  • वात्सल्य                                               पुत्र कामना
  • कष्ट                                                       संवेदना 
  • आत्महीनता                                          विनीत भाव 
  •  आत्माभिमान                                      आत्मप्रदर्शन
  •  एकाकीपन                                           सामूहिक 
  • अधिकार भावना                                        संग्रह 
  •  रचनानुभूति                                   रचना प्रवृत्ति/निर्माण कार्य
  • आमोद                                                     हास्य 
  • आश्चर्य                                                   जिज्ञासा 
  • कामुकता                                                   काम 

मूल प्रवृत्तियों की विशेषताए →

  •  मूल प्रवृत्ति जन्मजात होती है |
  • यह सार्वभौमिक होती है | मूल प्रवृत्तियां व्यवहार को संचालित करती है |
  •  सभी व्यक्तियों में मूल प्रवृत्तियों की मात्रा समान नहीं होती है |
  •  यह आदतों से भिन्न होती है |
  •  यह शोधनशील  या परिवर्तनशील होती है |
  • प्रत्येक मूल प्रवृत्ति में तीन क्रियाएं शामिल होती है |

       ज्ञानात्मक 

       भावात्मक

       क्रियात्मक

      [2] मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत

 प्रवर्तक →  सिगमंड फ्रायड

 इस सिद्धांत के अनुसार अचेतन मन में दमित इच्छाएं व्यक्ति को क्रिया करने के लिए प्रेरित करती है |

  [3] उपलब्धि अभिप्रेरणा सिद्धांत 

इस सिद्धांत का प्रतिपादन हावर्ड विश्व विद्यालय के मनोवैज्ञानिक डेविड सी मैकीलैंड के द्वारा किया गया |

उनके सहयोगी थे –  एटकिंसन व होयेंग एवं होयेंग |

 फर्नल्ड के अनुसार → 

                                  “उपलब्धि अभिप्रेरणा से तात्पर्य श्रेष्ठता के विशेष स्तर को प्राप्त करने की इच्छा से है |“

 इस सिद्धांत के अनुसार उपलब्धि की चाह व्यक्ति को क्रिया करने के लिए प्रेरित करती है,तथा व्यक्ति वहां तक पहुंचने की चाह रखता है जहां तक प्रयासों के द्वारा पहुंचा जा सकता है |

 5. आवश्यकता पदानुक्रमिक सिद्धांत/मानवतावादी सिद्धांत

 प्रवर्तक → मैंसलों

मैंसलों के अनुसार मानव की पांच आवश्यकता है उसे क्रिया करने के लिए प्रेरित करती है |

5 आत्म सिद्धि 

4 सम्मान की आवश्यकता 

3 संबद्धता / स्नेह की आवश्यकता

2 सुरक्षा की आवश्यकता 

1 वैहिकआवश्यकता

 5 सक्रियता का सिद्धांत → 

इस सिद्धांत के अंतर्गत सोलेसबरी मैल्यो लिंडस्ले के नाम महत्वपूर्ण है |

 यह सिद्धांत व्यवहार की दक्षता पर बल देता है तथा दक्षता के लिए मांसपेशियों को सक्रिय बनाने रखने के लिए प्रेरित करता है |

6  संतुलित स्थैर्य सिद्धांत →

इस सिद्धांत के अंतर्गत चैपलिन,कॉपरऐपल के नाम महत्वपूर्ण है | 

 यह सिद्धांत असंतुलन की स्थिति में भी संतुलन बनाए रखने के लिए प्रेरित करता है |

अभिप्रेरित करने के तरीके/उपाय/विधियां

  1.  प्रशंसा एवं निंदा द्वारा 
  2. आवश्यकताओं का ज्ञान कराकर 
  3. आकांक्षा का स्तर जानकर
  4.  सफलता का आभास कराकर 
  5. असफलता का भय दिखाकर 
  6. प्रतियोगिताओं के आयोजन द्वारा
  7.  प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत करके
  8.  उचित शिक्षण विधियों के प्रयोग द्वारा
  9.  श्रव्य दृश्य सामग्री के प्रयोग द्वारा
  10.  पाठ्य सहगामी क्रियाओं के आयोजन द्वारा 
  11. विद्यालय एवं कक्षा के उचित वातावरण द्वारा 

अधिगम में अभिप्रेरणा का महत्व ;–

  1.  व्यवहार के नियंत्रित करने में सहायक 
  2. रुचि जागृत करने में सहायक 
  3. अधिगम तत्परता जागृत करने में सहायक 
  4. ध्यान केंद्रित करने में सहायक 
  5. अनुशासन स्थापित करने में सहायक
  6.  मानसिक क्रियाओं के विकास में सहायक
  7.  लक्ष्य प्राप्ति में सहायक 
  8. चरित्र निर्माण में सहायक

इस series में हम psychology के notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
psychology notes के इस series की शुरुआत हम इसके पहलें अध्याय अधिगम,चिंतन,अभिप्रेरणा से करेंगे |आज हम abhiprerna in psycholog के अंतर्गत abhiprerna in psychology के बारे में पढेंगे तो बने रहिए popularstudy पर |

psychology notes in hindi | 3. चिंतन

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इस series में हम psychology notes in hindi में दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
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चिंतन 

चिंतन;- एक ऐसा ज्ञानात्मक पक्ष है जिसमें व्यक्ति आंतरिक रूप से चिन्हों प्रतीकों प्रतिभाओं आदि के रूप में घटनाओं का मानसिक चित्रण करते हुए समस्या का समाधान ढूंढने का प्रयास करता है | 

गैरेट के अनुसार → “चिंतन एक प्रकार का अदृश्य व अव्यक्त व्यवहार है जिसमें सामान्य रूप से प्रतीकों का प्रयोग होता है”

 मोहसीन के अनुसार →  “चिंतन समस्या समाधान संबंधी व्यवहार है”

 चिंतन की विशेषताएं ;–

  1. चिंतन ज्ञानात्मक पक्ष से संबंधित होता है |
  2.  चिंतन आंतरिक क्रिया है | 
  3.  चिंतन अदृश्य व् अव्यक्त व्यवहार है |
  4. चिंतन समस्या समाधान संबंधी व्यवहार है |
  5. चिंतन किसी लक्ष्य या उद्देश्य की ओर अग्रसर करता है |
  6. चिंतन के समय बाहरी गत्यात्मक क्रियाएं बंद हो जाती है |
  7. चिंतन एक मानसिक खोज है न कि गत्यात्मक खोज |

चिंतन के साधन 

  • संप्रत्यय/विचार |
  •  बिंब/प्रतिमान |
  • चिह्न /संकेत/प्रतीक |
  • भाषा |

अधिगम में चिंतन का महत्व ;–

                                    चिंतन सीखने सिखाने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण तत्व है हमारी सीखने की योग्यता चिंतन पर निर्भर करती है| जो व्यक्ति उचित स्पष्ट व क्रमबद्ध चिंतन करना जानता है वह व्यक्ति समाज में जिम्मेदार नागरिक की भूमिका का निर्वाह करता है |

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 एक बालक में चिंतन क्षमता का विकास करने के लिए निम्न उपाय अपनाने चाहिए ;-

  1. अनुभव व प्रत्यक्षीकरण का विकास |
  2. भाषा का विकास |
  3. रूठने की आदत को दूर करना |
  4.  रूचि व ध्यान का विकास करना |
  5. तर्क वितर्क व वाद-विवाद के अवसर प्रस्तुत करना  |
  6. उत्तरदायित्व के कार्य सौपना आदि |

 नोट ;–  चिंतन के लिए सबसे पहली आवश्यकता है – समस्या |

 समस्या समाधान →

                               जब व्यक्ति के सामने कोई समस्या आती है तो समस्या चिंतन को जन्म देती है तथा चिंतन के द्वारा व्यक्ति समस्या का समाधान खोजने का प्रयास करता है |

 स्किनर  के अनुसार “समस्या समाधान किसी लक्ष्य की प्राप्ति में बाधक बनती कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने की प्रक्रिया है |”

 वेस्ले एवं रोनास्को –  समस्या समाधान एक ऐसी चुनौती है | जिसका सामना करने के लिए अध्ययन तथा खोज की आवश्यकता होती है |

 खोज उपागम – जेरोम ब्रूनर के द्वारा दिया गया | इसमें बालक स्वयं खोज करके समस्या का समाधान ढूंढता है |

इस series में हम psychology notes in hindi में दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
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psychology notes | अधिगम के सिद्धांत

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इस series में हम psychology notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
psychology notes के इस series की शुरुआत हम इसके पहलें अध्याय अधिगम,चिंतन,अभिप्रेरणा से करेंगे |आज हम psychology notes के अंतर्गत अधिगम के सिद्धांत के बचे हुए सिद्धांत पढेंगे तो बने रहिए popularstudy पर |

 [3]  सक्रिय अनुबंधन सिद्धांत/क्रिया प्रसूत अनुबंधन सिद्धांत/कार्यात्मक अनुबंधन सिद्धांत

प्रवर्तक →  B.F.  स्किनर  (अमेरिकी निवासी)

 व्यवहारवादी 

(1938 में)

 स्किनर ने चूहे वकबूतर पर प्रयोग कियें |

प्रयोग → 

                          चूहा→  स्किनर बॉक्स में बंद→  उछलकूद (क्रिया) →   भोजन (पुनर्बलन)

  •  स्किनर क्रियाओं पर विशेष जोर देते हैं इसलिए उन्होंने थोर्नडाइक SR. सिद्धांत को RS में बदल  दिया|
  •  स्किनर  का मानना  है कि क्रिया करते रहना चाहिए सक्रिय करने के तुरंत बाद बालक को पुनर्बलन देना चाहिए क्योंकि पुनर्बलन से क्रिया करने की गति में और भी अधिक तीव्रता आ जाती है |

 शैक्षिक महत्व → 

  • बाधित अनुक्रियाओं के पुनर्बलिकरण से बालकों को प्रोत्साहन मिलता है और वे उचित व्यवहार करने लगते हैं
  • क्रिया के अनुसार सकारात्मक व नकारात्मक पुनर्बलन तुरंत देना चाहिए क्योंकि देर करने से इसका प्रभाव कम हो जाता है|
  •  इसके द्वारा बालकों में अपेक्षित व्यवहार परिवर्तन किया जाता है|
  •  इस सिद्धांत में चूहे को भोजन का मिलना उसके लिए उचित पुनर्बलन है |
  • इसी प्रकार प्रशंसा के दो शब्द पुरस्कार आदि बच्चों की दृष्टि से उचित पुनर्बलन है |
  • अभिक्रमित अनुदेशन इसी सिद्धांत पर आधारित है |

अभिक्रमित अनुदेशन → 

                                 इसका निर्माण 1954 में बीएफ स्किनर के द्वारा किया गया | इसे  शिक्षण मशीन का नाम दिया गया है| इसमें बालक स्वागती से सीखता है  |

अभिक्रमित अनुदेशन में विषय वस्तु के छोटे-छोटे फ्रेम बना लिए जाते हैं |  बालक एक प्रेम को पढ़कर अनुक्रिया करता है सही अनुक्रिया करने पर अगले फ्रेम के रूप में पुनर्बलन दिया जाता है |

 एक बार में केवल एक फ्रेम प्रस्तुत किया जाता है यह व्यक्तिगत रूप से प्रयोग किया जाता है तथा नियंत्रण अभिकर्मक (शिक्षक) के  हाथों में होता है|

अभिक्रमित अनुदेशन के पद ;–

  1. उद्दीपक 
  2. अनुक्रिया 
  3. पुनर्बलन 

अभिक्रमित अनुदेशन के सिद्धांत;–

  1.  लघु पदों का सिद्धांत 
  2. बाह्य अनुक्रिया का सिद्धांत
  3.  शीघ्र पृष्ठपोषण का सिद्धांत 
  4. स्वागति का सिद्धांत 
  5. स्व मूल्यांकन का सिद्धांत 

अभिक्रमित अनुदेशन के प्रकार;–

  1.  रेखीय अभिक्रमित अनुदेशन
  • BF स्किनर
  • स्किनेशियन(1954)
  • छोटे फ्रेम 
  • एक ही मार्ग का अनुसरण
  • ग़लतियाँ  होने की कम संभावना
  • पुनर्बलन
  1. शाखीय अभिक्रमित अनुदेशन 
  •  नॉर्मन ए क्राउडर 
  • क्रउडेरियन(1960)
  • बड़े फ्रेम
  •  चार विकल्प व पृष्ठ संख्या 
  • ग़लतियाँ होने की अधिक संभावना 
  • निदान व उपचार  
  1. अवरोही/मैथमेटिक्स अभिक्रमित अनुदेशन

               थॉमस एफ गिलबर्ट (1962)

  1. कंप्यूटर आधारित अभिक्रमित अनुदेशन 

लॉरेंस स्टालरों व डेनियल डेविस (1965)

                         [4] गेस्टाल्ट सिद्धांत/सूक्ष्म एवं अंतर्दृष्टि का सिद्धांत 

  • गेस्टाल्ट जर्मन भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ होता है पूर्णाकार/ समग्रकृति |
  • जर्मनी में 1920 में गेस्टाल्ट संप्रदाय का उदय हुआ है इस संप्रदाय से संबंधित व्यक्ति थे →  मैक्स वर्दीमर, कोहलर,  कोफ्का व  कुर्ट लेविन |
  •  और ये  सभी गेस्टाल्टवादी कहलायें, तथा  इन्होंने जो सिद्धांत दिया वह गेस्टाल्ट सिद्धांत कहलाया 
  •  कोहलर  सुल्तान नामक चिंपांजी पर प्रयोग किया\

 प्रयोग →

                 चिंपांजी →  कमरे में बंद → ऊंचाई पर लटके केले →  सूझबूझ का प्रयोग →  बॉक्स पर चढ़कर केले प्राप्त |

इस प्रयोग से इस सिद्धांत का दूसरा नाम निकलता है सूझ एवं अंतर्दृष्टि का सिद्धांत |

प्रवर्तक →  मैक्स वर्दीमर  (संज्ञानवादी)

 प्रयोगकर्ता →  कोहलर 

सहयोगकर्ता → कोफ्का कुर्ट लेविन

 शैक्षिक महत्व → 

  •  छोटे बालक जिनकी बुद्धि का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है वह प्रयास व त्रुटि द्वारा सीखते है | लेकिन किशोर जिनकी बुद्धि का पूर्ण विकास हो जाता है वे सूझ एवं अंतर्दृष्टि द्वारा ही सकते है |
  • पाठ्यक्रम का निर्माण इसी सिद्धांत पर आधारित है  |
  • पूर्ण से अंश की ओर शिक्षण सूत्र इसी सिद्धांत की देन है |
  • अध्यापक को चाहियें कि वह बालकों को समस्या का पूरा ज्ञान करा दें यदि समस्या के प्रति ज्ञान अपूर्ण होगा तो अंतर्दृष्टि विकसित नहीं होगी सकेगी |
  • इस सिद्धांत के द्वारा सीखने से विचार शक्ति कल्पना शक्ति निरीक्षण शक्ति आदि मानसिक योग्यताओं का विकास होता है |
  •  विज्ञान गणित व्याकरण जैसे कठिन विषयों को सीखने और सिखाने के लिए यह सिद्धांत विशेष उपयोगी है |
  • अनुसंधान व समस्या समाधान के क्षेत्र में इस सिद्धांत की विशेष उपयोगिता है 
  • यह सिद्धांत यांत्रिक तरीके से सीखने का खंडन करता है तथा तार्किक तरीके से सीखने पर बल देता है |

      [5]   सामाजिक अधिगम सिद्धांत 

प्रवर्तक →  अल्बर्ट बाणडूरा (संज्ञानवादि)

समाज द्वारा मान्य व्यवहार को अपनाने तथा अमान्य व्यवहार को त्यागने के कारण ही यह सामाजिक अधिगम सिद्धांत कहलाया |

गुड़िया तथा  जीवित जोकर पर किए गए प्रयोग से बाणडूरा ने यह निष्कर्ष निकाला कि बालक अनुकरण के माध्यम से सीखता है |

अनुकरण द्वारा सीखने की प्रक्रिया ;–

  1.  अवधान (ध्यान केंद्रण)
  2.  धारण
  3.  पून;  प्रस्तुतीकरण 
  4. पुनर्बलन 

नोट;– 1 दूसरों के व्यवहार को देखकर सीखना सामाजिक अधिगम कहलाता है |

नोट;– 2 जिसको देखकर बालक व्यवहार करना सीखता है उसे प्रतिमान (मॉडल) कहते हैं |

 शैक्षिक महत्व → 

  1.  बालक के व्यक्तित्व निर्माण में यह सिद्धांत विशेष उपयोगी है |
  2.  छोटे बालक सही व् गलत व्यवहार में अंतर करने में अपने को असमर्थ पाते हैं यही कारण है कि यह गलत व्यवहार को अनुकरण के माध्यम से सीख लेते हैं | बालक के सामने सही व्यवहार वाले प्रतिमान को आवर्ती तरीके से प्रस्तुत करना चाहिए|
  3. कक्षाकक्ष परिस्थितियों में बालक के सामने सदैव आदर्श व्यक्तित्व वाले प्रतिमान प्रस्तुत करने चाहिए |
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[6] संरचनात्मक निर्मितवाद 

जेरोम ब्रूनर का संज्ञानात्मक अधिगम सिद्धांत;–

 संरचनात्मकता शब्द से तात्पर्य — ज्ञान की संरचना या ज्ञान के निर्माण से हैं |

संरचनात्मक शब्द की उत्पत्ति मनोविज्ञान के संज्ञानात्मक चित्र से हुई |  इसीलिए जेरोम ब्रूनर का सिद्धांत आधुनिक संज्ञानात्मक क्षेत्र कि श्रेणी में आता है |

 जेरोम ब्रूनर का मानना है कि बालकों को इस प्रकार से पढ़ाया जाए कि वे स्वयं ज्ञान की संरचना कर सकें|

 जो भी विषय वस्तु पढ़ाई जाए उसकी मूल प्रकृति व संरचना से बालकों को अवगत कराया जायें |

 क्योंकि ऐसा करने से ;–

  1.  सीखना सरल हो जाता है |
  2.  बालक रूचि के साथ अधिगम करता है |
  3. ऐसा ज्ञान स्थाई होता है|
  4.  ऐसा ज्ञान अधिगम स्थानांतरण में सहायक होता है |
  5.  ऐसा ज्ञान बालों को निर्मितवादी बनाने में सहायक होता है | 

निर्मित वाद की मुख्य बातें ;–

  1.  निर्मितवाद एक छात्र केंद्रित क्रिया है |
  2. इसमें बालक स्वयं ज्ञान का सर्जन करते हैं |
  3. नवीन ज्ञान का सर्जन पूर्व ज्ञान के आधार पर किया जाता है |
  4. निर्मितवाद पूर्व ज्ञान के अनुभव पर बल देता है  |
  5. यह छात्रों की सक्रियता पर बल देता है |
  6. यह अर्थपूर्ण अधिगम पर बल देता है | 
  7. यह बालकों के ज्ञान की पर्याप्तता की जांच करता है |
  8. यह बालकों में आपसी जिम्मेदारी व उत्तरदायित्व की भावना जागृत करता है |
  9. यह बालको मैं आपसे साझेदारी व सहयोग की भावना जागृत करता है |
  10. शिक्षक की भूमिका मार्गदर्शक निर्देशक अथवा सुविधा प्रदाता की होती है |
  11.  शिक्षक द्वारा बालकों के समूह बनाकर प्रत्येक समूह को विषय संबंधी समस्या दी जाती है |
  12.  समूह के छात्रों से समस्या पर चर्चा करते है  विचार विमर्श करते हैं तथा पूर्व ज्ञान व नवीन ज्ञान की अंत क्रिया करते हुए समस्या का समाधान या निष्कर्ष निकालते हैं |

निर्मितवाद के मुख्य प्रकार ;– 

  •   संज्ञानात्मक निर्मितवाद 
  • सामाजिक निर्मितवाद 
  • प्रिज्मीय निर्मितवाद

 प्रिज्मीय निर्मितवाद के अनुसार ज्ञान व्यक्तिगत रूप से निर्मित होता है जो कि बालकों में  विशिष्ट परिस्तिथियों मैं प्रदान किया जाता है |

जेरोम ब्रूनर द्वारा बताई गई अधिगम की अवस्थाएं ;–

  1.   विधि निर्माण आधारित अधिगम की अवस्था 

                      0 से 2 वर्ष 

  1. प्रतिमा आधारित अधिगम की अवस्था 

      3 से 12 वर्ष 

  1. चिह्न आधारित अधिगम की अवस्था

                   12 वर्ष के बाद

[7 ]  पुनर्बलन/प्रबलन/सबलीकरण का सिद्धांत 

क्रमबद्ध व्यवहार सिद्धांत

 चालक न्यूनता सिद्धांत 

परिष्कृत या यथार्थ सिद्धांत

इस  का प्रतिपादन क्लार्क हल ने अपनी पुस्तक ‘प्रिंसिपल ऑफ बिहेवियर’ के अंतर्गत किया |

  • आवश्यकता की पूर्ति करना इस सिद्धांत का मुख्य तत्व है |
  • थार्नडाइक के अनुसार उद्दीपक को देखकर अनुक्रिया होती है लेकिन क्लार्क हल का मानना है कि अनुक्रिया उद्दीपक के कारण ना होकर आवश्यकता के कारण होती है |
  • आवश्यकता की पूर्ति के लिए उठाया गया हर एक सफल कदम व्यक्ति को पुनर्बलन देता है तथा व्यक्ति क्रमबद्ध तरीके से व्यवहार करता हुआ आगे बढ़ता है | तथा आवश्यकता की पूर्ति कर के अपने चालक को शांत करता है |
  •  क्लार्क हल के अनुसार — 

                          “सीखना आवश्यकता की पूर्ति के प्रक्रिया के द्वारा होता है | “

 स्किनर → “अब तक सीखने के जितने भी सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं उनमें यह सर्वश्रेष्ठ है”

 [8] अनुभवजन्य अधिगम सिद्धांत/अनुभाविक अधिगम सिद्धांत

प्रवर्तक →  कार्ल रोजस |

  •  यह सिद्धांत अनुभव द्वारा सीखने पर बल देता है |
  • इस सिद्धांत का मानना है कि बालकों को पुस्तकों के बोझ से नहीं लादना चाहिए |
  •  बालको पर क्या पढ़ना है कितना पढ़ना है कैसे पढ़ना है आदि बातों को थोपना नहीं चाहिए बल्कि उन्हें स्वतंत्रता पूर्वक अधिगम करने देना चाहिए |
  •  इसके लिए शिक्षक को विद्यालय में सेमिनार कार्यशाला परीचर्या शैक्षिक भ्रमण आदि कार्य नीतियों का आयोजन करना चाहिए | ताकि बालक स्वयं अनुभव करके सीख सकें क्योंकि अनुभव करके सीखा हुआ ज्ञान स्थाई होता है |

* अधिगम के प्रकार;– 

 रॉबर्ट गेने  ने अधिगम के 8 प्रकार बतायें है  तथा इन्हें सरल से जटिल क्रम में प्रस्तुत किया है |

8.समस्या समाधान अधिगम 

7.सिद्धांत अधिगम 

6.संप्रत्यय अधिगम

5. विभेद अधिगम

4. शाब्दिक अधिगम 

3. श्रंखला अधिगम 

2.उद्दीपक अनुक्रिया अधिगम 

1.संकेत अधिगम 

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक ; – 

  1. अभिप्रेरणा |
  2. सीखने वाले की इच्छा शक्ति |
  3.  सीखने वाले की अभिवृत्ति |
  4.  सीखने का समय व अवधि |
  5. सीखने की विधि |
  6. अभ्यास |
  7. समय सारणी |
  8. वातावरण |
  9. शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य |
  10. शिक्षकों को मनोविज्ञान का ज्ञान |
  11.  अनुभव |
  12. प्रस्तुतीकरण |
  13.  विषय वस्तु का स्वरूप |
  14. विषय वस्तु का आकार |
  15.  विषय वस्तु की भाषा शैली |
  16.  विषय वस्तु की उद्देश्यपूर्णता आदि |

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psychology notes | 1. अधिगम ,चिंतन,अभिप्रेरणा

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अधिगम,चिंतन,अभिप्रेरणा

अधिगम – एक ऐसी मानसिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति परिपक्वता की ओर बढ़ते हुए तथा अपने अनुभवो से लाभ उठाते हुए अपने व्यवहार में परिवर्तन/परिमार्जन करता है ।

अधिगम के सोपान-

1. अभिप्रेरणा 

2. विभिन्न अनुक्रियाये

3. बाधाये

4. पुनर्बलन

5. सही अनुक्रियाये 

6. अनुभवों का संगठन 

7. लक्ष्य 

 

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अधिगम की विशेषताएं – 

1 “सीखना,आदतों ज्ञान व अभिवृतियों का अर्जन है ।”  – क्रो & क्रो

2.”नवीन ज्ञान व नवीन प्रतिक्रियाओं को प्राप्त करने की प्रक्रिया सीखने की प्रक्रिया है।”- वुडवर्थ

3. “अनुभव के परिणामस्वरूप व्यवहार में परिवर्तन/संशोधन करना ही अधिगम है।” –क्रौनबैक

4.”अनुभव व प्रशिक्षण के द्वारा व्यवहार में परिवर्तन करना ही अधिगम है।”- गेट्स व अन्य 

5.सीखना सार्वभौमिक है ।

6.सीखना वातावरण की उपज है ।

7.सीखना जीवन पर्यंत चलता रहता है।

8.सीखना व्यवहार में परिवर्तन करना है।

9. सीखना वृद्धि में विकास करता है।

10. सीखना अनुभवों का संगठन है ।

11. सीखना एक खोज करना है ।

12. अधिगम सक्रिय रहकर होता है ।

13. अधिगम में समय लगता है ।

14. अधिगम से अपेक्षाकृत स्थाई परिवर्तन होता है ।

प्रश्न – बालक नवीन व्यवहार को खोजता है ?

A सुनकर 

B सीखकर 

C देखकर 

D अनुभव करके 

ANS – सीखकर

अधिगम के सिद्धांत :- 

1.  उद्दीपक अनुक्रिया सिद्धांत(Stimules Response Theory ) SR :-

प्रवर्तक –  थॉर्नडाइक (व्यवहारवादी)

निवासी – अमेरिका

सिद्धांत दिया –  1913 में । 

प्रयोग –

भूखी बिल्ली →  पिंजरे में बंद → बाहर मांस का टुकड़ा (उद्दीपक ) → अनुक्रिया

 भूखी बिल्ली पर किए गए प्रयोग से सिद्धांत का दूसरा नाम निकलता है ।

– प्रयास व त्रुटि का सिद्धांत 

– प्रयत्न एवं भूल का सिद्धांत

 थॉर्नडाइक के अनुसार उद्दीपक को देखकर अनुक्रिया होती है, अथार्त्  दोनों में संबंध अथवा बंधन होता है ।  इस आधार पर इस सिद्धांत का एक और नाम निकलता है ।

संबंधवाद्/ संयोजनवाद 

– बंध का सिद्धांत

थॉर्नडाइक द्वारा बताये गये अधिगम के नियम – 

मुख्य नियम-

1. तत्परता का नियम 

2.अभ्यास का नियम :- उपनियम→  उपयोग,व अनुप्रयोग का नियम ,

3 परिणाम व प्रभाव का नियम / संतोष व असंतोष का नियम ।

गौण नियम –

1.बहु प्रतिक्रिया का नियम 

2.मानसिक विन्यास का नियम 

3. आंशिक प्रक्रिया का नियम 

4.अत्मिकरण का नियम 

5.  साहचर्य परिवर्तन का नियम 

शैक्षिक महत्व 

1. अनुभव से लाभ उठाना,

2. निरंतर प्रयास पर बल,

3. अभ्यास की क्रिया पर आधारित,

4.करके सीखना 

5.असफलता में सफलता

6. निराशा में आशा 

7.आत्मविश्वास व आत्मनिर्भरता 

8.छोटे बालकों के सीखने के लिए विशेष उपयोगी 

9. मंद गति से सीखने वालों के लिए विशेष उपयोगी ।

* करत करत अभ्यास के जड़मति होता सुजान 

* सफलता से बढ़कर दूसरा पुरस्कार नहीं है ।

*  एक घोड़े को तालाब तक तो ले जा सकते हैं लेकिन उससे पानी पीने के लिए बाध्य नहीं कर सकते ।(तत्परता का नियम)

2. अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत :-

    (Conditioned Response Theory)

– शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत  

 – परंपरागत अनुबंधन सिद्धांत 

 – प्राचीन अनुबंधन सिद्धांत 

 – संबंध प्रतिक्रिया/संबंध प्रत्यावर्तन का सिद्धांत अनुबंधन का सिद्धांत 

प्रवर्तक – पॉवलव  (व्यवहारवादी)

 निवासी- रूस 

सिद्धांत दिया – 1904 में ।

 प्रयोग –

    अस्वाभाविक उद्दीपक    स्वाभाविक उद्दीपक कुत्ता  =>  घंटी (cs) =>  भोजन (UCS)

 अस्वाभाविक अनुक्रिया → लार(CR) लार → स्वाभाविक अनुप्रिया

→ जो क्रिया  (लार का गिरना)  पहले भोजन को देखकर हो रही थी, वही क्रिया घंटी की आवाज को सुनकर होने लगी इसी को हम अनुकूलित अनुक्रिया सिद्धांत कहते हैं |

 

→  स्वाभाविक → अनानुबंधित 

→ अस्वाभाविक → अनुबंधित

 

→  पुनरावृति के आधार पर जो संबंध स्थापित होता है उसे अनुबंधन कहते हैं |

 

→  पॉवलव को अनुबंधन का पिता माना जाता है |

 

→ रूसी शरीरशास्त्री पॉवलव को इसी सिद्धांत के परिणामस्वरूप नोबेल पुरस्कार मिला है |

 

→  मुख्य शब्दावली → 

 

                        विलोप/विलीनीकरण –

                                                    अनुबंधन स्थापित हो जाने के बाद यदि बार-बार मातअनुबंधित उद्दीपक (घंटी) ही प्रस्तुत किए जाने पर अंततोगत्वा अनुबंधित अनुक्रिया का बंद हो जाना विलोप कहलाता है |

 

उद्दीपक सामान्यीकरण→  बालक मिलती-जुलती परिस्थितियों के प्रति वैसा ही व्यवहार करता है जैसा वह पूर्व अनुभव में कर चुका है जैसे

 

  1. एक बालक को लाल गुलाब का कांटा चुभने पर चोट पहुंची तो किसी भी लाल वस्तु से डरने लगा |
  2. पॉवलव घंटी की आवाज के स्थान पर सिटी बजाए जो की घंटी की आवाज से मिलती-जुलती थी तो इस पर कुत्ते ने वही क्रिया कि जो वह घंटी की आवाज पर करता था |
  3.  वाटसन ने 11 माह के अल्बर्ट नामक बालक पर प्रयोग करके निष्कर्ष निकाला कि बालक खरगोश से तो डरने ही लगा साथ ही साथ रोयेंदार (सॉफ्ट टॉयज) चीजों से भी उसे डर लगा |

 

उद्दीपक विभेदीकरण → कुत्ते को घंटी की आवाज़ पर पुनर्बलित किया गया लेकिन सीटी की आवाज पर नहीं तो कुत्ता धीरे-धीरे दोनों उद्दीपको के बीच विभेद करना सीख गया और अब वह घंटी की आवाज पर ही क्रिया करता था तथा सीटी की आवाज पर नहीं |

 

समय कारक → दोनों उद्दीपकों के बीच अनुबंधन स्थापित होने के लिए पंच सेकंड से अधिक का अंतराल नहीं लेना चाहिए,अन्यथा अनुबंधन स्थापित होने में बाधा उत्पन्न होती है |

 

शैक्षिक  महत्व → 

  •  प्राणी तभी सीखता है जब वह सतर्क होता है |
  •  शिक्षण में श्रव्य दृश्य सामग्री का प्रयोग इसी सिद्धांत पर आधारित है |
  •  यह सिद्धांत क्रिया की पुनरावृति पर बल देता है |
  •  पुनरावृति के आधार पर अनुबंधन स्थापित करने पर बल देता है |
  • भाषा को सीखने और सिखाने के लिए यह सिद्धांत विशेष उपयोगी है |
  • आदत का निर्माण इसी सिद्धांत पर आधारित है |
  • इस सिद्धांत के द्वारा भय संबंधित मानसिक भ्रांतियों को दूर किया जा सकता है |
  • इस सिद्धांत के अनुसार बालको से कभी भी ऐसे शब्दों की पुनरावृति ना करें जो आगे चलकर कुण्ठाओं में बदल जाए क्योंकि इसी प्रकार बालक में प्रेम वह घृणा का विकास होता है |
  • ये सिद्धान्त यांत्रिक तरीके से सिखने पर बल देता है |