bal vikas ke siddhant

bal vikas ke siddhant | मनोविज्ञान

इस series में हम psychology के notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
psychology notes के इस series में आज हम bal vikas ke siddhant के बारे में पढेंगे तो बने रहिए popularstudy के साथ |

बाल विकास के सिद्धांत :-

1. मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत →  सिगमंड फ्रायड

2.मनोलैंगिक विकास → सिगमंड फ्रायड 

3. मनोसामाजिक विकास सिद्धांत – एरिक्सन 

4.संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत – जीन पियाजे 

5.संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत – वाईगोत्सी 

6. नैतिक विकास सिद्धांत – लॉरेंस कोहलबर्ग 

7.भाषा विकास सिद्धांत – नॉम चॉमस्की

1.मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत ( साइके एनालिटिकल थ्योरी ) – विएना ऑस्ट्रिया 

प्रवर्तक →  सिगमंड फ्रायड

★ सिगमंड फ्रायड ने मन की  3 दशाये / बतायी है ।

  •  चेतन मन 1/10 भाग – मस्तिष्क से जागृत अवस्था 
  • अवचेतन मन 9/10 भाग – कटु अनुभूतियों दुखद बातों तथा दमित इच्छाओं का भंडार।
  •  अर्द्धचेतन मन –   चेतन व अचेतन के बीच की अवस्था । याद की हुई बातों को अचानक भूल जाना, अटक जाना ,हकला जाना आदि बातें अर्द्ध चेतन मन को प्रदर्शित करती है ।

★ सिगमंड फ्रायड ने व्यक्तित्व संरचना की दृष्टि से तीन अवस्थाएं बतायी है → 

  •  इड
  •  ईगो
  •  सुपर ईगो 

इड(ID) –  सुखवादी सिद्धांत,इच्छाओं का भंडार ग्रह, अचेतन मन से संबंध,अनैतिक व अपराध कार्य कुसमायोजन के लिए जिम्मेदार ।

ईगो(EGO) – वास्तविक सिद्धांत,चेतन मन से संबंध, समायोजन की अवस्था,ID तथा SUPER EGO के बीच संतुलन का कार्य,व्यक्तित्व कार्यपालक ।

सुपर ईगो(SUPER EGO) – आदर्शवादी सिद्धांत,आध्यात्मिकता की ओर रुझान,नैतिक व आदर्शवादी बातें,आदर्शों की अधिकता व्यक्ति को कुसमायोजित कर सकती है ।

★ सिगमंड फ्रायड में दो मूल प्रवृत्ति बताई है ।

 मूल प्रवृत्ति →  जीवन प्रवृति 

                     मृत्युमूल प्रवृत्ति

★  नार्सिसिज्म –  अपने आप में मस्त रहने तथा अपने आप से प्रेम करने की क्रिया को नार्सिसिज्म कहते हैं ।

★ ऑडीपास व इलेक्ट्रो ग्रंथि – सिगमंड फ्रायड के अनुसार लड़कों में ऑडीपस ग्रंथि होने के कारण वे अपनी मां से अधिक प्रेम करते हैं तथा लड़कियों में इलेक्ट्रो ग्रंथि होने के कारण वे अपने पिता से अधिक प्रेम करती है ।

★ लिबिडो –  सिगमंड फ्रायड ने अपने काम प्रवृत्ति को लिबिडो कहा है । उनके अनुसार यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है और यदि इस प्रवृत्ति का दमन करने की कोशिश की जाती है तो व्यक्ति कुसमायोजित हो जाता है ।

★ शैशव कामुकता –  शैशव कामुकता की बात पर सिगमंड फ्रायड को उनके शिष्य जुंग के बीच मतभेद हो जाता है तथा मतभेद के उपरांत जुंग एक अलग सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं जिसका नाम है विश्लेषणात्मक सिद्धान्त ।

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2.  मनो लैंगिक विकास सिद्धांत ( साइकोसेक्सुअल डेवलपमेंट थ्योरी )

 सिगमंड फ्रायड के अनुसार बालक के विकास  पर उसकी  काम प्रवृत्ति का प्रभाव पड़ता है उनके अनुसार काम प्रवृत्ति बालक में जन्म से पाई जाती है तथा भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में इसका स्वरूप भिन्न भिन्न होता है ।

 इस आधार पर मनोलैंगिक विकास सिद्धांत को 5 अवस्थाओं के द्वारा समझाया है – 

  1.  मुख्य अवस्था/ मौखिक अवस्था –  0 से 1 साल 

इस पहली अवस्था में काम प्रवृत्ति मुख के क्षेत्र में केंद्रित होती है 

  1. गुदिय अवस्था – 1 से 3 वर्ष तक 

इस अवस्था में काम प्रवृत्ति गुदा क्षेत्र में केंद्रित होती है इस अवस्था में बालक जिद्दी आक्रामक व धारणात्मक हो जाता है ।

  1.  लैंगिक अवस्था –  3 से 6 वर्ष

 इस अवस्था में बालक का ध्यान जननांगों की तरफ जाता है। इसी अवस्था में ऑडीपस एवं इलेक्ट्रो ग्रंथियों का विकास होता है ।

  1.  अदृश्यावस्था / प्रसुप्ति अवस्था –  7 से 12 वर्ष 

इस अवस्था में काम प्रवृत्ति अदृश्य हो जाती है यह शरीर के किसी भाग में विद्यमान नहीं होती ।

  1.   जननेंद्रिय व्यवस्था 12 वर्ष के बाद इस अंतिम अवस्था में काम प्रवृत्ति का प्रयोग संतानोंत्पत्ति हेतु किया जाता है।

   3. मानसिक विकास सिद्धांत- एरिकसन 

  • एरिक्सन को नव्य फ्रायडवादी माना जाता है ।
  • क्योंकि एरिक्सन सिगमंड फ्रायड के विचारों से काफी हद तक सहमत है लेकिन एक बात पर सहमत नहीं है ।
  • एरिक्सन का मानना है कि बालक के विकास पर उसकी काम प्रवृत्ति का नहीं बल्कि सामाजिक अनुभूतियों का प्रभाव पड़ता है ।

 इस आधार पर एरिक्सन के मनोसामाजिक सिद्धांत को 8 अवस्थाओं के द्वारा समझाया है

  1.  0 से 2 वर्ष → विश्वास और अविश्वास की अवस्था ।
  2. 3 से 4 वर्ष → स्वतंत्रता संदेह की अवस्था ।
  3. 3 से 6 वर्ष → आत्मबल अपराध की अवस्था  ।
  4. 7 से 12 वर्ष → परिश्रम हीनता की अवस्था ।
  5.  13 से 18 वर्ष → पहचान भूमि की द्वंद की अवस्था ।
  6.  19 से 35 वर्ष → घनिष्ठता अलगाव की अवस्था। 
  7.  36 से 55 वर्ष → उत्पादकता निष्क्रियता की अवस्था 
  8. 55 वर्ष के बाद → इमानदारी निराशा की अवस्था
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4. संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत (कॉग्निटिव डेवलपमेंट थ्योरी ) :- 

 प्रवर्तक :- जीन पियाजे

               स्विट्ज़रलैंड 

  • सर्वप्रथम स्विट्जरलैंड के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे ने संज्ञानात्मक पक्ष का क्रमबद्ध तथा  वैज्ञानिक अध्ययन किया ।
  • संज्ञान प्राणी का विज्ञान है जिसे वह वातावरण/उद्दीपक जगत/बाह् जगत के माध्यम से ग्रहण करता है ।
  • संज्ञान के अंतर्गत अवदान,स्मरण चिंतन,कल्पना निरीक्षण,वर्गीकरण,तर्क वितर्क,समस्या समाधान, संप्रत्ययीकरण,प्रत्यक्षण आदि । मानसिक क्रियायें सम्मिलित होती है। ये क्रियाएं परस्पर अंतरसंबंधित होती है ।
  • जीन पियाजे के संज्ञानात्मक पक्ष पर बल देते हुए संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत का प्रतिपादन किया इसीलिए जीन पियाजे की विकासात्मक मनोविज्ञान का जनक माना जाता है ।
  • विकासात्मक मनोविज्ञान के अंतर्गत जन्मपूर्व अथार्त् गर्भावस्था से वृद्धावस्था तक होने वाले विकास का अध्ययन किया जाता है ।
  • बाल विकास के अंतर्गत गर्भावस्था से किशोरावस्था तक होने वाले विकास का अध्ययन किया जाता है ।
  •  विकास प्रारंभ होता है गर्भावस्था से संज्ञान विकास शैशवावस्था से प्रारंभ होकर जीवन पर्यंत चलता रहता है ।

जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत को चार अवस्थाओं के द्वारा समझाया है – 

  1. संवेदी पेशीय अवस्था/इंद्रिय जनित अवस्था – 0 से 2 वर्ष 

जन्म के समय शिशु बाहय जगत के प्रति अनभिज्ञ होता है धीरे-धीरे व आयु वृद्धि के साथ-साथ अपनी संवेदनाएं (ज्ञानेंद्रियों) व शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से बाह्य जगत का ज्ञान ग्रहण करता है ।

● वह वस्तु को देखकर सुनकर स्पर्श करके गंध के द्वारा तथा स्वाद के माध्यम से ज्ञान ग्रहण करता है ।

● छोटे छोटे शब्दों को बोलने लगता है ।

● परिचितों का मुस्कान के साथ स्वागत करता है तथा अपरिचितों को देखकर भय का प्रदर्शन करता है ।

● वस्तु स्थायित्व का अभाव पाया जाता है ।

2.पूर्व संक्रियात्मक अवस्था 2 से 7 वर्ष → 

 इस अवस्था में शिशु दूसरों के संपर्क से खिलौने से वह अनुकरण के माध्यम से सीखता है । खिलौनों की आयु इसी अवस्था को कहा जाता है  ।

  • शिशु अक्सर लिखना गिनती गिनना रंगों को पहचानना वस्तुओं को क्रम से रखना हल्की भारी का ज्ञान होना माता पिता की आज्ञा मानना पूछने पर नाम बताना घर के छोटे-छोटे कार्यों में मदद करना आदि सीख जाता है । लेकिन वह तर्क वितर्क करने योग्य नहीं होता इसलिए इसे अतार्किक चिंतन की अवस्था के नाम से भी जाना जाता है।
  • निर्जीव वस्तुओं में सजीव चिंतन करने लगता है ।  इसे जीववाद कहते हैं ।
  • प्रतीकात्मक सोच पाई जाती है ।
  • वस्तु स्थायित्व का भाव जाग्रत हो जाता है ।
  • शिशु अहमवादी होता है । तथा दूसरों को कम महत्व देता है ।
  • अनुक्रमणशीलता पाई जाती है ।

3.  स्थूल/मूर्त संक्रियात्मक अवस्था → 7 से 12 वर्ष 

इस अवस्था में तार्किक चिंतन प्रारंभ हो जाता है लेकिन बालक का चिंतन केवल मूर्त वस्तुओं तक ही समिति रहता है वह अपने सामने उपस्थित दो वस्तुओं के बीच तुलना करना अंतर करना समानता और असमानता बताना सही गलत वह उचित अनुचित में विभेद करना आदि सीख जाता है।  इसीलिए इसे मूर्त चिंतन की अवस्था के नाम से भी जाना जाता है ।

  • बालक दिन तारीख समय महीना वर्ष आदि बताने योग्य हो जाता है उत्क्रमण शीलता पाई जाती है ।

4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था →  12 वर्ष के बाद

  • इस अवस्था में किशोर मूर्त के साथ-साथ अमूर्त चिंतन करने योग्य भी हो जाता है । इसलिए इस अवस्था को तार्किक चिंतन की अवस्था के नाम से भी जाना जाता है । 
  • इस अवस्था में मानसिक योग्यताओं का पूर्ण विकास हो जाता है ।
  • परिकल्पनात्मक चिंतन पाया जाता है ।

नॉट :- परिकल्पना किसी भी समस्या पर संभावना व्यक्त करना परिकल्पना कहलाता है

   जीन पियाजे का शिक्षा में योगदान → 

  1. जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत का प्रतिपादन किया ।
  2.  बाल केंद्रित शिक्षा पर बल दिया ।
  3. जीन पियाजे शिक्षण में शिक्षक की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहते हैं कि :- ◆ एक शिक्षक को बालक की समस्या का निदान करना चाहिए । ◆बालकों के अधिगम के लिए उचित वातावरण तैयार करना चाहिए ।
  4. जीन पियाजे ने बुद्धि को जीव विज्ञान की स्किमा की भांति बतलाकर बुद्धि की एक नवीन व्याख्या प्रस्तुत की ।
  5.  जीन पियाजे ने आत्मीकरण समंजन संतुलनीकरण व् स्किमा  जैसे-  नवीन शब्दों का प्रयोग कर शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया ।

स्कीमा – वातावरण द्वारा अर्जित संपूर्ण ज्ञान का संगठन ही स्किमा है ।

  1. मानसिक संरचना की व्यवहारगत समानांतर प्रक्रिया जीव विज्ञान में स्किमा कहलाती है । अथार्त् किसी उद्दीपक के प्रति विश्वसनीय अनुक्रिया को स्किमा कहते हैं ।
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5 . संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत –

 प्रवर्तक – वाइगोत्सी 

  •  वाईगोत्सी का मानना है कि बालक की संज्ञानात्मक विकास पर सामाजिक कारको  व भाषा का प्रभाव पड़ता है ।इसलिए इस सिद्धांत को सामाजिक सांस्कृतिक सिद्धांत के नाम से भी जाना जाता है ।
  • इस सिद्धांत के अनुसार संज्ञानात्मक विकास अंतर वैयक्तिक सामाजिक परिस्थिति में संपन्न होता है । अथार्त कुशन विद्वान व्यक्तियों के साथ अंत क्रिया के माध्यम से बालक का विकास होता है । इसलिए इस सिद्धांत को समीपस्थ विकास सिद्धांत क्षेत्र भी कहा जाता है

 6. नैतिक विकास का सिद्धांत ( मोरल डेवलपमेंट थ्योरी ) :- 

 लॉरेंस कोहलबर्ग 

लॉरेंस कोहलबर्ग का मानना है कि बालक के नैतिक विकास को  समझने के लिए उसके तर्क व चिंतन का विश्लेषण करना आवश्यक है । इस आधार पर उन्होंने नैतिक विकास सिद्धांत की छह अवस्थाएं बतायी है  तथा उन्हें भी तीन स्तरो में बांटा है ।

  1.  प्रीकनवेंशनल स्तर/पूर्व परंपरागत स्तर →  4 से 10 वर्ष

 इस स्तर में बालक के तर्क व चिंतन का आधार बाहरी घटना होती है । वह बाहरी घटना के आधार पर किसी को सही गलत तथा उचित व अनुचित बताता है । 

इस स्तर की दो अवस्थाएं है :- १ आज्ञा एवं दंड की अवस्था २ .अहंकार की अवस्था/अदला-बदली की अवस्था 

  1. कन्वेंशनल स्तर/परंपरागत स्तर → 10 से 13 वर्ष 

इस स्तर में बालक के तर्क व चिंतन का आधार सामाजिक होता है इसकी दो अवस्थाएं है :- १ प्रशंसा की अवस्था उत्तम लड़का अच्छी लड़की की अवस्था २ सामाजिक अवस्था के प्रति सम्मान की अवस्था

  1.  पोस्ट कन्वेंशनल/स्तर परंपरागत स्तर 13 वर्ष के बाद

 इस स्तर में बालक के तर्क व चिंतन का आधार विवेक होता है । इस स्तर की दो अवस्थाएं हैं १.सामाजिक समझौते की अवस्था २.विवेक की अवस्था 

लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास सिद्धांत की 5 अवस्थाएं और बताइयी है – 

  1.  पूर्व नैतिक अवस्था – 0 से 2 वर्ष 
  2. स्वकेंद्रित अवस्था 2 से 7 वर्ष 
  3. परंपराओं को धारण  करने वाली अवस्था –  7 से 12 वर्ष 

इसी अवस्था से बालक का नैतिक अथवा चारित्रिक विकास प्रारंभ होता है 

  1. आधारहीन आत्मचेतना अवस्था –  13 से 12 वर्ष 

इस अवस्था में किशोर आधारहिन व खोखले आदर्शों की बातें करता है तो जो उसे यथार्थता के धरातल से दूर ले जाती है । इस अवस्था में किशोरों का व्यक्तित्व सिगमंड फ्रायड सुपर ईगो द्वारा संचालित होता है ।

इसीलिए इस अवस्था के व्यक्ति को देवदूत माना जाता है ।

  1. आधारयुक्त आत्माचेतना अवस्था – 18 वर्ष के बाद

 इस अवस्था में व्यक्ति की बातें आधारयुक्त  व तर्क सम्मत होती है । व्यक्ति केवल भावनाओं से ही नहीं बल्कि विचारों से भी काम लेता है ।

7  बांस भाषा विकास सिद्धांत 

नॉम चोमस्की के अनुसार → बालक में भाषा ग्रहण करने की जन्मजात प्रवृत्ति होती है ।  इसे भाषा अर्जन तंत्र के नाम से जाना जाता है ।

बालक जिस भाषा को सुनता है उसकी व्याकरण को अपने आप सीख जाता है इसलिए इस सिद्धान्त को जेनरेटिव ग्रामर थ्योरी भी कहा जाता है

भाषा विकास → 

1.पॉवलाव के अनुसार → बालक भाषा शब्द व अर्थ के मध्य संबंध स्थापित करके सीखता हैं । इस संबंध को प्रॉब्लम में अनुबंधन नाम दिया है ।  अतः पॉवलाव के अनुसार बालक भाषा अनुबंधन के माध्यम से सीखता है ।

2. स्किनर के अनुसार  → बालक भाषा अनुकरण व पुनर्वसन के माध्यम से सीखता है  ।

3. बाण्डुरा के अनुसार → बालक भाषा अनुकरण से सीखता है । बाण्डुरा ने भाषा विकास में  पुनर्वसन को महत्व दिया है ।

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