26 august current affairs 2020

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1.किस देश में आर्मी 2020 इंटरनेशनल मिलिट्री एंड टेक्निकल फोरम में इंडिया पवेलियन का उद्घाटन किया गया है ?

A इंग्लैंड 

B इंडोनेशिया 

C रूस 

D अमेरिका 

Ans – रूस 

2. किस देश की गोलपर सोफिया पापोव महिला ब्रिटिश ओपन 2020 खिताब जीता है ?

A जर्मनी 

B इंडिया

C  पाकिस्तान 

D इंग्लैंड

Ans – जर्मनी 

3. किसने डिजिटल सेवाओं के लिए सुपर ऐप लॉन्च किया है ?

A टाटा समूह 

B अमेज़न 

C रिलायंस

D  फ्लिपकार्ट 

Ans- टाटा समूह 

4.हाल में किस देश के खिलाड़ी कैमरून व्हाइट ने संन्यास लिया है ?

A ऑस्ट्रेलिया

B  साउथ अफ्रीका 

C न्यूजीलैंड

D  इंग्लैंड 

Ans – ऑस्ट्रेलिया

5.हाल ही में “हु पेंटेड माय लस्ट रेड”  नामक पुस्तक किसने लिखी है ?

A  रवीश कुमार

B  श्री अय्यर

C  सोमा मंडल 

D  अनीता कृपलानी 

Ans – श्री अय्यर

6.हाल ही में किस रेलवे स्टेशन पर “बैगेज सैनिटाइजिंग और रैपिंग मशीन” लांच की गई है ?

A  अहमदाबाद 

B जयपुर 

C बनारस

 D दिल्ली 

Ans – अहमदाबाद 

7. दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष किसे नियुक्त किया गया है ? 

 A शोएब मालिक

 B कुमार विश्वास

 C जाकिर खान

 D अमनतुल्ला खा

Ans – जाकिर खान

8.किस राज्य सरकार ने कोविड-19 महामारी के कारण इस शैक्षणिक वर्ष में पाठ्यक्रम 30% कम करने की घोषणा की है ?

A  असम

B  महाराष्ट्र 

C पश्चिम  बंगाल 

D हरियाणा

Ans – असम

9. किस राज्य के मुख्यमंत्री ने एन आर आई एकीकृत पोर्टल लॉन्च किया है ?

A राजस्थान 

B उत्तर प्रदेश

C  मध्य प्रदेश

D  पंजाब

Ans – उत्तर प्रदेश

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10. भारत ने किस देश के साथ राष्ट्रीय समन्वय समिति की अध्यक्षता की है ?

A  बांग्लादेश

B  उज़्बेकिस्तान

C  कजाकिस्तान

D  रूस

Ans – उज़्बेकिस्तान

11. वायु सेना में कैरियर से संबंधित जानकारी प्रदान करने के लिए माय आईएएफ एप  किस ने लांच की है ?

A नरेंद्र मोदी

B  आरकेएस भदौरिया

C  राजनाथ सिंह

D  लालजी टंडन

Ans – आरकेएस भदौरिया

12. बंगाल लॉकडाउन ऑनलाइन फिल्म फेस्टिवल में किस लघु फिल्म को अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिला है ?

A प्रवासी श्रमिक 

B अभिलाष 

C मजदूर

D  खेती 

Ans – अभिलाष 

13. दुर्जेह s-400 वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली के लिए रूस ने किस देश के साथ समझौता किया है ?

A इजरायल

B  तुर्की 

C इंडिया 

D जापान

Ans – तुर्की 

14. सतपाल सिंह सत्ती को किस राज्य के वित्त आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है ?

A  हिमाचल प्रदेश 

B महाराष्ट्र 

C गोवा 

D राजस्थान

Ans – हिमाचल प्रदेश 

15. हाल ही में डीआरडीओ प्रमुख जी सतीश रेड्डी का कार्यकाल कितने साल बढ़ाया गया है ?

A  1

B  2

C  3

D  4

Ans –  2

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गुहिल वंश का इतिहास

गुहिल वंश का इतिहास

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गुहिल वंश

I. मेवाड़ का गुहिल वंश

गुहिल

अबुल फजल ने मेवाड़ के गुहिलों को ईरान के बादशाह नौशेखाँ आदिल की सन्तान माना है।
मुहणौत नैणसी ने अपनी ख्यात में गुहिलों की 24 शाखाओं का जिक्र किया है। इन सभी शाखाओं में मेवाड़ के गुहिल सर्वाधिक प्रसिद्ध रहे हैं।
गुहादित्य या गुहिल इस वंश का संस्थापक था।
पिता का नाम – शिलादित्य, माता का नाम – पुष्पावती।
स्थापना 566 ई. में, हूण वंश के शासक मिहिरकुल को पराजित करके।
राजधानी – नागदा (उदयपुर के पास)।


बप्पा रावल या कालभोज

734 ई. में चित्तौड़गढ़ के अन्तिम मौर्य राजा मान मौर्य से चित्तौड़ दुर्ग जीता, एकलिंग मंदिर (कैलाशपुरी) का निर्माण, एकलिंग जी को कुलदेवता मानते थे। एकलिंग जी के पास इनकी समाधि ‘बप्पा रावल’ नाम से प्रसिद्ध।
बप्पारावल को कालभोज के नाम से जाना जाता है।
बप्पारावल को मेवाड़ का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
बप्पारावल ने कैलाशपुरी (उदयपुर) में एकलिंगनाथजी का मन्दिर बनवाया एकलिंगनाथजी मेवाड़ के कुल देवता थे।
734 ई. में बप्पारावल ने मौर्य शासक मानमौरी से चित्तौड़गढ़ का किला जीता तथा नागदा (उदयपुर) की राजधानी बनाया।
नोट – चित्तौड़ का किला (गिरि दुर्ग) गम्भीरी व बेड़च नदियों के किनारे पर मेसा के पठार पर स्थित चित्रांगद मौर्य (कुमारपाल संभव के अभिलेख के अनुसार चित्रांग) द्वारा बनाया गया। चित्तौड़ के किले में सात द्वार हैं। पाडनपोल, भैरवपोल, गणेशपोल, हनुमानपोल, जोडनपोल, लक्ष्मणपोल, रामपोल।

चित्तौड़ के किले के बारे में कहा गया है कि गढ तो बस चित्तौड़गढ़ बाकी सब….
क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा किला चित्तौड़ का किला है। यह व्हेल मछली की आकृति का किला है।
इसे राजस्थान का दक्षिणी-पूर्वी प्रवेश द्वार कहते हैं।
चित्तौड़ को राजस्थान में किलों का सिरमौर व राजस्थान का गौरव कहते हैं।
राजस्थान किलों की दृष्टि से देश में तीसरा स्थान रखता है। पहला महाराष्ट्र का, दूसरा मध्यप्रदेश का तीसरा राजस्थान का है।
बप्पारावल से सम्बन्धित प्रशस्तियाँ

  1. रणकपुर प्रशस्ति (1439) – बप्पारावल व कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया है। (देपाक/दिपा)
  2. कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति (1460) – बप्पारावल से लेकर राणा कुम्भा तक के राजाओं के विरूद्ध उपलब्धियों व युद्ध विजयों का वर्णन (अत्रि व उसके पुत्र महेश द्वारा रचित)
  3. कुम्भलगढ़ प्रशस्ति – कान्हाव्यास द्वारा 1460 में बप्पारावल को ब्राह्मण या विप्रवंशीय बताया है।
  4. एकलिंगनाथ के दक्षिण द्वार की प्रशस्ति – (1488 महेश भट्ट द्वारा रचित) – बप्पारावल के संन्यास लेने का उल्लेख है।
  5. संग्रामसिंह द्वितीय के काल में 1719 में लिखी गयी। वैद्यनाथ प्रशस्ति में हारित ऋषि से बप्पारावल को मेवाड़ साम्राज्य मिलने का उल्लेख है। (रूपभट्ट द्वारा रचित)

मेवाड़ के राजा एकलिंग जी को वास्तविक राजा व स्वयं इनका दीवान बनकर कार्य करते थे।
उदयपुर के राजा राजधानी छोड़ने से पूर्व एकलिंग जी की स्वीकृति लेते थे, जिसे ‘आसकां लेना‘ कहा जाता था।
बप्पा रावल के गुरु – हारीत ऋषि (लकुलीश शैवानुगामी परम्परा के)।
सी.वी. वैध ने बप्पा रावल को चार्ल्स मोर्टल कहा है।
बप्पा रावल के वंशज अल्लट (951-953) के समय मेवाड़ की बड़ी उन्नति हुई। आहड़ उस समय एक समृद्ध नगर व एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र था। अल्लट ने आहड़ को अपनी दूसरी राजधानी बनाया। यह भी माना जाता है कि अल्लट ने मेवाड़ में सबसे पहले नौकरशाही का गठन किया।
मालव के परमार शासक मुझ परमार से चित्तौड़गढ़ दुर्ग हार गया।
नोट- परमारों के प्रतापी शासक भोज परमार ने 1021-1031 तक चित्तौड़ पर शासन किया तथा चित्तौड़गढ़ में त्रिभुवन नारायण देव के मन्दिर का निर्माण करवाया।

इस मन्दिर का जीर्णोद्धार राणा मोकल ने करवाया। इसलिये इसे “मोकल का समीद्धेश्वर” मन्दिर भी कहा जाता है।

गुहिल वंश का इतिहास

गुहिल वंश का इतिहास
गुहिल वंश का इतिहास


रावल जैत्रसिंह (1213-50 ई.)

इल्तुतमिश के आक्रमण का सफल प्रतिरोध किया जिसका वर्णन जयसिंह कृत ‘हम्मीर-मान-मर्दन’ नामक नाटक में किया गया है।
1242-43 में जैत्रसिंह की गुजरात के त्रिभुवनपाल से लड़ाई हुई।
जैत्रसिंह ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ को बनाई।
तेजसिंह – 1260 ई. में मेवाड़ चित्र शैली का प्रथम ग्रन्थ ‘श्रावक प्रतिकर्मण सूत्र चुर्णि’ तेजसिंह के काल में लिखा गया।
नोट – मेवाड़ चित्रकला शैली की शुरूआत तेजसिंह के समय हुई।

रावल समरसिंह (1273-1301)

इसने आचार्य अमित सिंह सूरी के उपदेशों से अपने राज्य में जीव हिंसा पर रोक लगाई।


रावल रतनसिंह (1301-1303 ई.)

यह समरसिंह का पुत्र था जो 1301 ई. में शासक बना।
1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय लड़ते हुए शहीद, पत्नी पद्मिनी का जौहर, सेनापति गोरा-बादल (चाचा – भतीजा) का बलिदान। गोरा पद्मिनी का चाचा तथा बादल भाई था।
यह चित्तौड़ का प्रथम साका (राजपूतों का बलिदान एवं राजपूत महिलाओsं का सामुहिक जौहर) था।
अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद रखा व अपने पुत्र खिज्र खां को वहाँ का शासक बनाया।
चित्तौड़गढ़ के किले में पद्मिनी पैलेस, गौरा बादल महल, नौ गंजा पीर की दरगाह व कालिका माता का मन्दिर, कुम्भा द्वारा निर्मित विजय स्तम्भ, जीजा द्वारा जैन कीर्ति स्तम्भ, मोकल द्वारा पुनः निर्माण कराया गया। समिद्धेश्वर मन्दिर (त्रिभुवन नारायण) मीरां मन्दिर आदि दर्शनीय है।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में बाघसिंह की छतरी, जयमल पत्ता की छतरी, वीर कल्ला राठौड़ की छतरी (चार हाथों वाले देवता, शेषनाग का अवतार) मीरां के गुरू संत रैदास की छतरी, जौहर स्थल।
चैत्र कृष्ण एकादशी को जौहर मेला चित्तौड़गढ़ में लगता है।
1313 के बाद सोनगरा चौहान मालदेव को अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का प्रशासन सौंपा।
मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा शेरशाह सूरी के समय मसनवी शैली में रचित अवधी भाषा के प्रसिद्ध ग्रन्थ पद्मावत में रतनसिंह व पद्मिनी की प्रेम कथा का उल्लेख है।
पद्मावत को कुछ इतिहासकार जैसे ओझा, कानूनगो, लाल आदि कल्पना पर आधारित मानते हैं।
पद्मिनी का प्रिय तोता – हीरामन (राय जाति का तोता, जो वर्तमान में दर्रा अभ्यारण्य, कोटा एवं गागरोण में पाया जाता है)।
रावल रतनसिंह का विद्वान पण्डित – राघव चेतन (इसने रतनसिंह द्वारा देश निकाला दे दिये जाने पर अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में शरण ली)।
इस युद्ध (1303 ई. ) में इतिहासकार अमीर खुसरो उपस्थित था।
रतनसिंह गुहिलों की रावल शाखा का अंतिम शासक था।


राणा हम्मीर (1326-64 ई.)

अरिसिंह का पुत्र।
गुहिल वंश की एक शाखा सिसोदा का सामन्त, जिसने मालदेव सोनगरा (जालौर) के पुत्र जैसा (जयसिंह) को पराजित कर चित्तौड़ जीता।
सिसोदिया वंश का संस्थापक (1326 ई. में)।
प्रथम राणा शासक।
मेवाड़ के उद्धारक राजा के रूप में प्रसिद्ध।
उपाधियां – वीर राजा (रसिक प्रिया में उल्लिखित) व विषमघाटी पंचानन (कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में उल्लिखित)।
हम्मीर व मुहम्मद बिन तुगलक के बीच सिंगोली नामक स्थान पर युद्ध हुआ।

गुहिल वंश का इतिहास


राणा क्षेत्रसिंह (राणा खेता) (1364-82 ई.)

गुहिल वंश का इतिहास
गुहिल वंश का इतिहास

राणा हम्मीर का पुत्र। इसने बुंदी को अपने अधीन किया।


राणा लक्षसिंह (राणा लाखा) (1382-1421 ई.)

राणा खेता का पुत्र, वृद्धावस्था में मारवाड़ के शासक राव चूँड़ा राठौड़ की पुत्री व रणमल की बहिन हंसा बाई के साथ विवाह।
राणा लाखा के काल में एक बनजारे ने पिछौला झील का निर्माण कराया।
राणा लाखा ने ‘झोटिंग भट्ट‘ एवं ‘धनेश्वर भट्ट‘ जैसे विद्वान पंडितों को राज्याश्रय दिया।
राणा लाखा के काल में मगरा जिले के जावर गाँव में चाँदी की खान खोज निकाली, जिसमें चाँदी और सीसा बहुत निकलने लगा। कुँवर चूड़ा व राणा मोकल इसके पुत्र थे।


राणा मोकल (1421-1433 ई.)

राणा लाखा व हंसा बाई से वृद्धावस्था में उत्पन्न पुत्र।
इसके समय राठौड़ों का मेवाड़ में प्रभाव बढ़ गया था।
राणा मोकल ने समद्विश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया तथा द्वारिकानाथ (विष्णु) का मंदिर बनवाया।
राणा मोकल की हत्या महाराणा खेता की पासवान के पुत्र चाचा और मेरा नामक सामन्तों ने सन् 1433 में की।
कुँवर चूड़ा

लाखा का बड़ा पुत्र, राजपूताने का भीष्म, मारवाड़ के राव चूँडा
राठौड़ की पुत्री का विवाह लाखा के साथ एवं उसके पुत्र मोकल के उत्तराधिकारी बनने पर कुंवर चूंडा ने मोकल का साथ दिया।

कुम्भा या कुम्भकर्ण (1433-68 ई.)

मेवाड़ का महानतम शासक, राणा मोकल व सौभाग्य देवी का पुत्र।
महाराणा कुम्भा का काल ‘कला एवं वास्तुकला का स्वर्णयुग‘ कहा जाता है।
गुरु का नाम – जैनाचार्य हीरानन्द।
कुम्भा ने आचार्य सोमदेव को ‘कविराज‘ की उपाधि प्रदान की।
कुम्भा की पुत्री – रमाबाई (संगीत शास्त्र की ज्ञाता, उपनाम- वागीश्वरी)।
सारंगपुर का प्रसिद्ध युद्ध (1437 ई.) में मालवा के महमूद खिलजी प्रथम को हराया। इस विजय के उपलक्ष्य में विजय स्तम्भ/कीर्ति स्तम्भ (चित्तौड़) का निर्माण कराया, जो 1440 ई. में बनना शुरू होकर 1448 ई. में पूर्ण हुआ।
विजय स्तम्भ के शिल्पी जैता व उसके पुत्र नापा, पोमा व पूंजा थे। विजय स्तम्भ को ‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष‘ भी कहा जाता है। इसकी नौ मंजिलें है तथा तीसरी मंजिल पर अरबी भाषा में नौ बार ‘अल्लाह‘ लिखा हुआ है।
राजस्थान की वह पहली ऐतिहासिक इमारत जिस पर डाक टिकट जारी हुआ था – विजयस्तम्भ (15 अगस्त, 1949 को 1 रु. का डाक टिकट)। कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति के लेखक – कवि अत्रि व उसका पुत्र महेश।
रणकपुर का प्रसिद्ध जैन मंदिर इसी काल में निर्मित – 1439 ई. (चौमुख मन्दिर/आदिनाथ मन्दिर), इस मंदिर को ‘खम्भों का अजायबघर‘ तथा ‘स्तम्भों का वन’ कहा जाता है। कुल 1444 खम्भे, मंदिर परिसर में प्रसिद्ध वैश्या मंदिर।
निर्माता – धरणकशाह या धन्ना सेठ (कुम्भा का वित्त मंत्री), प्रधान शिल्पी – दैपाक/देपा।
इस मन्दिर को चतुर्मुख जिनप्रसाद भी कहा जाता है।
मेह कवि ने इस मन्दिर को त्रिलोक दीपक तथा विमलसूरी ने इस मन्दिर को नलिनी गुल्म विमान कहा है।
चित्तौड़ दुर्ग में जैन कीर्ति स्तम्भ का निर्माण इसी काल में, निर्माता – जैन महाजन जीजाशाह।
कुम्भलगढ़, अचलगढ़ (आबु पर्वत) सहित 32 दुर्गों का निर्माता (मेवाड़ में कुल 84 दुर्ग हैं जिनमें से 32 दुर्ग़ों का निर्माता कुम्भा स्वयं है)
कुम्भा की उपाधियाँ – 1. हालगुरु – गिरि दुर्गो का स्वामी होने के कारण। 2. राणो रासो – विद्वानों का आश्रयदाता होने के कारण। 3. हिन्दू सुरत्ताण – समकालीन मुस्लिम शासकों द्वारा प्रदत्त। 4. अभिनव भरताचार्य – संगीत के क्षेत्र में कुम्भा के विपुल ज्ञान के कारण। 5. राजगुरु – राजाओं को शिक्षा देने की क्षमता होने के कारण कहलाये। 6. तोडरमल – कुम्भा के हयेश (अश्वपति), हस्तीश (गजपति) और नरेश (पैदल सेना का अधिपति) होने से
कहलाये। 7. नाटकराज का कर्त्ता-नृत्यशास्त्र के ज्ञाता होने के कारण। 8. धीमान-बुद्धिमत्तापूर्वक निर्माणादि कार्य करने से। 9. शैलगुरु-शस्त्र या भाला का उपयोग सिखाने से। 10. नंदिकेश्वरावतार-नंदिकेश्वर के मत का अनुसरण करने के कारण।
राणा कुंभा को राजस्थान में स्थापत्य कला का जनक कहा जाता है।
कुम्भस्वामी मंदिर, एकलिंग मंदिर, मीरा मंदिर, शृंगार गोरी मंदिर आदि का चित्तौड़ दुर्ग में निर्माण।
इनके राज्याश्रित कान्ह व्यास द्वारा ‘एकलिंग-महात्म्य‘ पुस्तक रचित जिसमें ‘राजवर्णन‘ अध्याय स्वयं कुंभा ने लिखा। कुम्भा द्वारा रचित विभिन्न ग्रन्थ – 1. संगीत राज – यह कुंभा द्वारा रचित
सारे ग्रंथों में सबसे वृहद्, सर्वश्रेष्ठ, सिरमौर ग्रंथ है। भारतीय संगीत की गीत-वाद्य-नृत्य, तीनों विधाओं का गूढ़तम विशद् शास्त्रोक्त समावेश इस महाग्रंथ में हुआ है। 2. रसिक प्रिया – गीत गोविन्द की टीका। 3. कामराजरतिसार – यह ग्रंथ कुंभा के कामशास्त्र विशारद होने का परिचायक ग्रंथ है।

अन्य ग्रंथ – संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबन्ध, संगीत रत्नाकर टीका, चण्डी शतक टीका आदि।
प्रसिद्ध वास्तुकार मण्डन को आश्रय, कुम्भलगढ़ दुर्ग का प्रमुख शिल्पी मण्डन था।
मण्डन – ये खेता ब्राह्मण के पुत्र तथा कुंभा के प्रधान शिल्पी थे। इनके द्वारा
रचित ग्रन्थ हैं –

  1. प्रासाद मंडन – इस ग्रंथ में देवालय निर्माणकला का विस्तृत विवेचन है।
  2. राजवल्लभ मंडन – इस ग्रंथ में नागरिकों के आवासीय गृहों, राजप्रासाद एवं नगर रचना का विस्तृत वर्णन है।
  3. रूप मंडन – यह मूर्तिकला विषयक ग्रंथ है।
  4. देवतामूर्ति प्रकरण (रूपावतार) – इस ग्रंथ में मूर्ति निर्माण और प्रतिमा स्थापना के साथ ही प्रयुक्त होने वाले विभिन्न उपकरणों का विवरण दिया गया है।
  5. वास्तु मंडन – वास्तुकला का सविस्तार वर्णन है।
  6. वास्तुसार – इसमें वास्तुकला संबंधी दुर्ग, भवन और नगर निर्माण संबंधी वर्णन है।
  7. कोदंड मंडन – यह ग्रंथ धनुर्विद्या संबंधी है।
  8. शकुन मंडन – इसमें शगुन और अपशगुनों का वर्णन है।
  9. वैद्य मंडन- इसमें विभिन्न व्याधियों के लक्षण और उनके निदान के उपाय बताए गए हैं।

मंडन के भाई नाथा ने वास्तुमंजरी तथा पुत्र गोविन्द ने कलानिधि नामक ग्रन्थों की रचना की।
कुंभाकालीन जैन आचार्य – सोमसुन्दर सूरि, जयशेखर सूरि, भुवन कीर्ति एवं सोमदेव।
कुम्भा के समय माण्डलगढ़ पर महमूद खिलजी प्रथम ने 3 बार आक्रमण किए।
कुम्भा के समय गुजरात व मेवाड़ में संघर्ष का मुख्य कारण नागौर के उत्तराधिकार का मामला था।
मालवा व गुजरात के मध्य चम्पानेर की संधि (1456) कुम्भा के विरूद्ध हुई।
कुम्भा की हत्या उसके पुत्र उदा (उदयकरण) ने सन् 1468 ई. में कटारगढ़ (कुम्भलगढ़) में की परन्तु कुंभा के बाद उसका दूसरा पुत्र रायमल राजा बना।
कुम्भलगढ़ दुर्ग कुम्भा द्वारा अपनी पत्नी कमलदेवी की याद में 1443-1459 के बीच बनवाया गया। कुम्भलगढ़ दुर्ग को कुभलमेर दुर्ग, मछीदरपुर दुर्ग, बैरों का दुर्ग, मेवाड़ के राजाओं का शरण स्थली भी कहा जाता है।
कुम्भलगढ़ दुर्ग की प्राचीर भारत में सभी दुर्ग़ों की प्राचीर से लम्बी है। इसकी प्राचीर 36 किमी. लम्बी है। अतः इसे भारत की मीनार भी कहते हैं। इसकी प्राचीर पर एक साथ चार घोड़े दौड़ाए जा सकते हैं।
कुम्भलगढ़ दुर्ग के लिए अबुल-फजल ने कहा है कि, “यह दुर्ग इतनी बुलन्दी पर बना है कि नीचे से ऊपर देखने पर सिर पर रखी पगड़ी गिर जाती है।
कर्नल टॉड ने कुम्भलगढ़ दुर्ग को “एस्ट्रुकन” दुर्ग की संज्ञा दी है।
कुम्भलगढ़ दुर्ग में पाँच द्वार हैं-

  1. ओरठपोल 2. हल्लापोल 3. हनुमानपोल 4. विजयपोल 5. रामपोल

कुम्भलगढ़ दुर्ग में सबसे ऊँचाई पर बना एक छोटा दुर्ग कटारगढ़ है। इस कटारगढ़ दुर्ग को मेवाड़ की आँख कहते हैं।
कटारगढ़ दुर्ग कुम्भा का निवास स्थान था।
कुम्भलगढ़ दुर्ग में 1537 ई. में उदयसिंह का राज्याभिषेक हुआ।
मेवाड़ प्रजामण्डल के संस्थापक माणिक्यलाल वर्मा (मेवाड़ का गांधी) को प्रजामण्डल के समय कुम्भलगढ़ दुर्ग ही नजरबंद करके रखा गया था।
हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) के बाद 1578 ई. में महाराणा प्रताप ने कुम्भलगढ़ दुर्ग का अपनी राजधानी बनाया तथा यहीं महाराणा प्रताप का 1578 ई. में दूसरा औपचारिक रूप से राज्याभिषेक हुआ।
नोट – कटारगढ़ दुर्ग में 9 मई, 1540 को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ।

कुम्भा ने अचलगढ़ दुर्ग (सिरोही), बसंतगढ़ (सिरोही), भीलों की सुरक्षा हेतु भोमट दुर्ग (सिरोही) तथा बैराठ दुर्ग (बंदनौर, भीलवाड़ा) का निर्माण करवाया।
रायमल – रायमल के तीन पुत्र थे- (i) जयमल (ii) पृथ्वीराज (iii) राणासांगा।

  1. जयमल – बूंदी के सूरजन हाड़ा की पुत्री तारा से विवाह किया (टोडा टोंक को नहीं जीत सका) तो सुरजन हाड़ा ने इसे मरवा दिया।
  2. पृथ्वीराज – तेज गति से घोड़ा चलाने के कारण इसे उड़ना राजकुमार कहते हैं। इसने टोडा टोंक को जीता तो सुरजन हाड़ा की पुत्री तारा से विवाह किया। नोट – इसने अपनी पत्नी तारा के नाम पर अजयमेरू दुर्ग का नाम तारागढ़ रखा।

गुहिल वंश का इतिहास

गुहिल वंश का इतिहास

महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) (1509-28 ई.)

रायमल का पुत्र।
24 मई, 1509 ई. को महाराणा संग्राम सिंह का राज्याभिषेक हुआ उस समय दिल्ली में लोदी वंश का सुल्तान सिकन्दर लोदी, गुजरात में महमूदशाह बेगड़ा और मालवा में नासिरूद्दीन खिलजी का शासन था।
मेवाड़ का सबसे प्रतापी शासक, ‘हिन्दूपत‘ कहलाता था।
मालवा के महमूद खिलजी द्वितीय से सांगा का संघर्ष मेदिनीराय नामक राजपूत को शरण देने के कारण हुआ।
सन् 1519 को गागरोन (झालावाड़) युद्ध मे मालवा के शासक महमूद खिलजी द्वितीय को हराकर बंदी बनाया, फिर रिहा किया।
खातोली (बूँदी) के युद्ध (1517 ई.) व बाड़ी (धौलपुर) के युद्ध (1519 ई.) में दिल्ली के शासक इब्राहिम लोदी को हराया।
पंजाब के दौलत खां व इब्राहिम लोदी के भतीजे आलम खां लोदी ने फरगना (काबुल) के शासक बाबर को भारत आमंत्रित किया।
बाबर ने अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-बाबरी (तुर्की भाषा) में राणा सांगा द्वारा बाबर को भारत आमंत्रित करने का उल्लेख किया। तुजुक-ए-बाबरी में बाबर ने कमल के फूल के बाग का वर्णन किया है जो धौलपुर में है।
राणा सांगा का गुजरात से संघर्ष ईडर के मामले को लेकर हुआ (गुजरात का सुल्तान मुजफ्फर)।
1526 ई. के बयाना (भरतपुर) के युद्ध में बाबर को हराया।
ऐतिहासिक खानवा (भरतपुर की रूपवास तहसील में) के युद्ध- 17 मार्च 1527 ई. में मुगल शासक बाबर से हारा, घायलावस्था में युद्ध क्षेत्र से बाहर, खानवा के युद्ध में बाबर से पराजित होने का प्रमुख कारण बाबर का तोपखाना था।
खानवा के इस निर्णायक युद्ध के बाद मुस्लिम (मुगल) सत्ता की वास्तविक स्थापना हुई। खानवा स्थान गंभीरी नदी के किनारे है।
खानवा विजय के बाद बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की तथा खानवा युद्ध में जिहाद का नारा दिया।
खानवा युद्ध में राणा सांगा ने सभी राजपूत हिन्दू राजाओं को पत्र लिखकर युद्ध में आमंत्रित किया। राजपूतों में इस प्रथा को पोती परवण कहा जाता है।
राणा सांगा अन्तिम हिन्दू राजपूत राजा था जिसके समय सारी हिन्दू राजपूत जातियां विदेशियों को बाहर निकालने के लिए एकजुट हो गई थी।
खानवा के युद्ध में आमेर का – पृथ्वीराज कच्छवाह मारवाड़ का – मालदेव, बूंदी का – नारायण राव, सिरोही का – अखैहराज देवड़ा प्रथम, भरतपुर का – अशोक परमार, बीकानेर का – कल्याणमल ने।
अपनी-अपनी सेना का नेतृत्व किया। अशोक परमार की वीरता से प्रभावित होकर राणा सांगा ने अशोक परमार को बिजौलिया ठिकाना भेंट किया।
हसन खां मेवाती खानवा युद्ध में राणा सांगा के युद्ध में सेनापति था।
खानवा के युद्ध में झाला अज्जा ने सांगा का राज्य चिह्न व मुकुट लेकर सांगा की सहायता की व अपना बलिदान दिया।
30 जनवरी 1528 को कालपी (मध्यप्रदेश) में सरदारों द्वारा विष दिये जाने के कारण बसवां (दौसा) में मृत्यु।
मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में सांगा का दाह संस्कार हुआ तथा वहीं पर उसकी छतरी है।
राणा सांगा के दाह संस्कार के समय उसके शरीर पर 80 घाव लगे हुए थे। इसलिए राणा सांगा को सैनिकों का भग्नावशेष भी कहा जाता है।


विक्रमादित्य (1531-35 ई.)

राणा सांगा का अल्पवयस्क पुत्र, उसकी माता कर्णावती (कर्मावती) या कमलावती ने संरक्षिका बनकर शासन किया।

कर्णावती ने 1534 ई. में बहादुरशाह (गुजरात) के आक्रमण के समय हुमायुं को सहायता हेतु राखी भेजी।

सन् 1535 में बहादुरशाह के आक्रमण के समय चित्तौड़ दुर्ग में जौहर (चित्तौड़ का दूसरा साका)।

बनवीर (1536-37 ई.)

सांगा के भाई पृथ्वीराज का अवैध दासी पुत्र।
इसने विक्रमादित्य की हत्या कर राजकुमार उदयसिंह की हत्या करने के लिए महल में प्रवेश किया, किन्तु पन्नाधाय द्वारा अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह की रक्षा की गई।


उदयसिंह (1537-72 ई.)

सन् 1537 मे मेवाड़ का शासक बना (जोधपुर के राजा मालदेव की सहायता से)।
शेरशाह मारवाड़ विजय के बाद चित्तौड़ की ओर बढ़ा तो उदयसिंह ने कूटनीति से काम ले किले की कूंजियाँ (चाबियाँ) शेरशाह के पास भेज दी।
1559 ई. मे उदयपुर की स्थापना।
सन् 1567-68 में अकबर द्वारा चित्तौड़ पर आक्रमण के समय किले का भार जयमल राठौड़ व पत्ता सिसोदिया (साला-बहनोई) को सौंपकर अरावली पहाड़ियों में प्रस्थान।
सन् 1568 में अकबर का चित्तौड़ पर कब्जा, जयमल, पत्ता, वीर कल्ला जी राठौड़ शहीद, अकबर ने जयमल व पत्ता की वीरता से प्रभावित होकर आगरे के किले के दरवाजे पर पाषाण मूर्तियां स्थापित करवायी तथा बीकानेर के रायसिंह ने जूनागढ़ किले की सूरजपोल पर भी जयमल-पत्ता की हाथी पर सवार पाषाण मूर्तियाँ स्थापित करवाई।
1568 ई. में यह चित्तौड़ का युद्ध चित्तौड़ का तीसरा साका था।
उदयसिंह का 1572 ई. को गोगुन्दा (उदयपुर) में देहान्त हो गया जहाँ उनकी छतरी बनी हुई है।
उदयसिंह ने अपनी प्रिय भटियाणी रानी के पुत्र जगमाल सिंह को युवराज नियुक्त किया था।


महाराणा प्रताप (1572-97 ई.)

उदयसिंह व जयवन्ती बाई (पाली के अखैराज सोनगरा (चौहान) की पुत्री) का पुत्र, जन्म 9 मई 1540 ई. में पाली में अपने ननिहाल में हुआ।
प्रताप का विवाह जैसलमेर की छीरबाई से हुआ था इन्होंने 17 और भी विवाह किए थे।
उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात गोगुन्दा (उदयपुर) में राणा प्रताप का राज्याभिषेक हुआ तथा बाद में राज्याभिषेक समारोह कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ।
राणा कीका एवं पातल नाम से भी जाने जाते थे।
बादशाह अकबर ने अपनी अधीनता स्वीकार करवाने हेतु सर्वप्रथम जलाल खाँ को महाराणा प्रताप के पास नवम्बर, 1572 ई. में भेजा। मार्च, 1573 ई. में अपने सेनापति कच्छवाहा मानसिंह को महाराणा प्रताप के पास भेजा लेकिन प्रयत्न निष्फल रहा।
पुनः सितम्बर, 1573 में आमेर के शासक भगवन्तदास (मानसिंह के पिता) एवं दिसम्बर, 1573 में राजा टोडरमल महाराणा प्रताप को राजी करने हेतु भेजे गये परन्तु प्रताप ने अकबर के अधीन होना स्वीकार नहीं किया। फलतः अकबर ने उन्हें अधीन करने हेतु 2 अप्रेल, 1576 ई. को मानसिंह को सेना देकर मेवाड़ भेजा।
अकबर की अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव अस्वीकार।
हल्दीघाटी का युद्ध या खमनौर का युद्ध या गोगुन्दा का युद्ध – कर्नल टॉड ने मेवाड़ की थर्मोपल्ली कहा, जो 21 जून 1576 (A.L. श्रीवास्तव के अनुसार 18 जून 1576) को अकबर के सेनापति मानसिंह (आमेर) के विरुद्ध लड़ा जिसमें प्रताप की जीत, प्रिय अश्व चेतक मारा गया।
इस युद्ध में पहले मुगल सेना हार रही थी लेकिन मुगलों की ओर से मिहतर खाँ ने अकबर के आने की अफवाह फैला दी जिससे मुगल सैनिकों में जोश आ गया था।
इस युद्ध में विख्यात मुगल लेखक अल बदायूंनी भी उपस्थित था। उसने अपनी पुस्तक ‘मुन्तखव-उल-तवारीख’ में युद्ध का वर्णन किया। इस युद्ध में मुगलों का सेनापति आसफ खां था। महाराणा प्रताप का मुस्लिम सेनापति हकीम खां सूरी था।
अबुल फजल ने हल्दीघाटी (राजसमन्द में) के युद्ध को खमनौर का युद्ध तथा अल बदायूंनी ने गोगुन्दा का युद्ध कहा है।
1580 में अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना को प्रताप के विरूद्ध भेजा था।
मुगलों के विरूद्ध युद्ध में सादड़ी (पाली) के जाये-जन्में दानी भामाशाह ने राणा प्रताप को अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया।
कर्नल जेम्स टॉड ने दिवेर के युद्ध को ‘मेवाड़ का मेराथन‘ कहा है।
सन् 1585 से 1615 ई. तक चावण्ड मेवाड़ की राजधानी रही। यहीं 19 जनवरी 1597 को प्रताप का देहान्त हुआ।
चावण्ड के पास बाण्डोली गाँव मे प्रताप की छत्री बनी हुई।

गुहिल वंश का इतिहास

गुहिल वंश का इतिहास


महाराणा अमरसिंह प्रथम (1597-1620 ई.)

अमरसिंह प्रथम महाराणा प्रताप के पुत्र थे।
अमरसिंह का राज्याभिषेक चांवड़ में हुआ था।
सन् 1615 ई. में जहाँगीर की अनुमति से खुर्रम व अमरसिंह के बीच सन्धि हुई जिसे मुगल-मेवाड़ सधि के नाम से जाना जाता है। इसके द्वारा मेवाड़ ने भी मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली।
अमरसिंह का पुत्र कर्णसिंह जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ था।
आहड़ में महासतियों के पास गंगो गाँव मे अमरसिंह की छतरी बनी हुई है।
बादशाह जहांगीर महाराणा को अधीन करने के इरादे से 8 नवम्बर, 1613 को अजमेर पहुंचा और शाहजादा खुर्रम को सेना लेकर मेवाड़ भेजा। अंतः युद्धों से जर्जर मेवाड़ की अर्थव्यवस्था के मध्यनजर सभी सरदारों एवं युवराज कर्णसिंह के निवेदन पर महाराणा अमरसिंह ने 5 फरवरी, 1615 को निम्न शर्त़ों पर शहजादा खुर्रम से संधि की।
(1) महाराणा बादशाह के दरबार में कभी उपस्थित न होगा।

(2) महाराणा का ज्येष्ठ कुँवर शाही दरबार में उपस्थित होगा।

(3) शाही सेना में महाराणा 1000 सवार रखेगा।

(4) चित्तौड़ के किले की मरम्मत न की जाएगी।

महाराणा कर्णसिंह (1620-1628 ई.)

महाराणा कर्णसिंह का जन्म 7 जनवरी, 1584 को और राज्याभिषेक 26 जनवरी, 1620 को हुआ।
1622 ई. में शाहजादा खुर्रम ने अपने पिता जहाँगीर से विद्रोह किया। उस समय शाहजादा उदयपुर में महाराणा के पास भी आया। माना जाता है कि वह पहले कुछ दिन देलवाड़ा की हवेली में ठहरा, फिर जगमंदिर में। महाराणा कर्णसिंह ने जगमंदिर महलों को बनवाना शुरू किया, जिसे उनके पुत्र महाराणा जगतसिंह प्रथम ने समाप्त किया। इसी से ये महल जगमंदिर कहलाते हैं।
महाराणा जगतसिंह प्रथम (1628-1652 ई.)

कर्णसिंह के बाद उसका पुत्र जगतसिंह प्रथम महाराणा बना।
जगतसिंह बहुत ही दानी व्यक्ति था। उसने जगन्नाथ राय (जगदीश) का भव्य विष्णु का पंचायतन मंदिर बनवाया। यह मंदिर अर्जुन की निगरानी और सूत्रधार (सुथार) भाणा और उसके पुत्र मुकुन्द की अध्यक्षता में बना। उक्त मंदिर की प्रतिष्ठा 13 मई, 1652 को हुई इस मंदिर की विशाल प्रशस्ति जगन्नाथ राय प्रशस्ति की रचना कृष्णभ़ट्ट ने की।
महाराणा ने पिछोला में मोहनमंदिर और रूपसागर तालाब का निर्माण कराया। जगमंदिर में जनाना महल आदि बनवाकर उसका नाम अपने नाम पर जगमंदिर रखा।
जगदीश मंदिर के पास वाला धाय का मंदिर महाराणा की धाय नौजूबाई द्वारा बनवाया गया। महाराणा जगतसिंह के समय ही प्रतापगढ़ की जागीर मुगल बादशाह शाहजहाँ द्वारा मेवाड़ से स्वतंत्र करा दी गई।


महाराणा राजसिंह (1652-80 ई.)

महाराणा जगतसिंह के पुत्र राजसिंह का राज्याभिषेक 10 अक्टूबर, 1652 ई. को हुआ।
इन्होंने गोमती नदी के पानी को रोककर राजसंमद झील का निर्माण करवाया। इसी झील के उत्तर में नौ चौकी पर 25 शिलालेखों पर संस्कृत का सबसे बड़ा शिलालेख ‘राज-प्रशस्ति’ अंकित है, जिसके लेखक रणछोड़ भट्ट तैलंग है।
राजसिंह ने किशनगढ़ की राजकुमारी चारूमति से विवाह किया जिससे औरगंजेब स्वयं विवाह करना चाहता था। अतः दोनों मे कटुता उत्पन्न हुई।
महाराणा राजसिंह ने 1664 ई. में उदयपुर में अम्बा माता का तथा कांकरोली में द्वारिकाधीश मंदिर बनवाया।
महाराणा राजसिंह रणकुशल, साहसी, वीर, निर्भीक, सच्चा क्षत्रिय, बुद्धिमान, धर्मनिष्ठ और दानी राजा था। उसने महाराणा जगतसिंह द्वारा प्रारंभ की गई चित्तौड़ के किले की मरम्मत का कार्य जारी रखा और बादशाह औरंगजेब के 2 अप्रेल, 1679 को हिन्दुओं पर जजिया लगाने, मूर्तियाँ तुड़वाने आदि अत्याचारों का प्रबल विरोध किया।
जोधपुर के अजीतसिंह को अपने यहाँ आश्रय दिया और जजिया कर देना स्वीकार नहीं किया।

महाराणा जयसिंह (1680-1698 ई.)

इन्होंने 1687 ई. में गोमती, झामरी, रूपारेल एवं बगार नामक नदियों के पानी को रोककर ढेबर नामक नाके पर संगमरमर की जयसमंद झील बनवाना प्रारंभ किया गया जो 1691 ई. में बनकर तैयार हुई।
इसे ढेबर झील भी कहते हैं।

महाराणा अमरसिंह द्वितीय (1698-1710 ई.)

वागड़ व प्रतापगढ़ को पुनः अपने अधीन किया एवं जोधपुर व आमेर को मुगलों से मुक्त कराकर क्रमशः अजीतसिंह एवं सवाई जयसिंह को वापस वहाँ का शासक बनने में सहायता की।
इन्होंने अपनी पुत्री का विवाह जयपुर महाराजा सवाई जयसिंह से किया।
महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय (1710 – 1734)

  • इन्होंने मराठों के विरूद्ध राजस्थान के राजपूत राजाओं को संगठित करने के लिए जयपुर के सवाई जयसिंह के साथ मिलकर हुरड़ा सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई लेकिन इस सम्मेलन के आयोजित होने से पूर्व ही इनका देहान्त हो गया।
  • इनके द्वारा उदयपुर में सहेलियों की बाड़ी, वैद्यनाथ मंदिर, नाहर मगरी के महल तथा उदयपुर के महलों में चीनी की चित्रशाला आदि का निर्माण करवाया गया।
  • इनके काल में मुगल शासक फर्रु‌खशियर ने जजिया कर हटाने का आदेश जारी किया।
  • इनके समय रामपुरा जागीर पुन: मेवाड़ को प्राप्त हुई जो अकबर के समय मुगलों के अधीन हो गई थी।
  • दुर्गादास राठौड़ को मेवाड़ से निकाले जाने पर वह संग्राम सिंह की सेवा में आए तथा इन्होंने दुर्गादास को विजयपुर की जागीर दी।
  • कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार बप्पा रावल की गद्दी का गौरव बनाये रखने वाला यह अन्तिम राजा था।

जगत सिंह द्वितीय (1734 – 1751)

  • इनके शासन काल में मराठों ने पहली बार मेवाड़ से कर वसूल किया।
  • इनके समय अफगान आक्रमणकारी नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया था।
  • इन्होंने पिछोला झील में जगत निवास महल का निर्माण करवाया तथा इनके दरबारी कवि नेकराम ने जगत विलास ग्रंथ की रचना की।
  • इन्होंने 17 जुलाई, 1734 को आयोजित हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता की।
  • इनकी मृत्यु के बाद प्रतापसिंह शासक बने तथा तीन वर्ष शासन करने के बाद प्रतापसिंह की मृत्यु हो गई।
  • प्रतापसिंह के बाद राजसिंह द्वितीय मेवाड़ के शासक बने तथा 7 वर्ष के शासनकाल के बाद 1761 में इनकी मृत्यु हो गई।
  • राजसिंह द्वितीय की निसंतान मृत्यु होने के कारण इनके छोटे भाई अरिसिंह को मेवाड़ का शासक बनाया गया।

महाराणा भीमसिंह (1778 – 1828)

  • महाराणा भीमसिंह को 7 जनवरी, 1778 को मेवाड़ के सिंहासन पर बिठाया गया।
  • इनके समय मेवाड़ के चूंडावत एवं शक्तावत सरदारों के बीच विरोध प्रबल हो गया था।
  • इनके समय मराठों के हस्तक्षेप तथा लूटमार के कारण मेवाड़ की स्थिति दयनीय हो गई थी।
  • कृष्णा कुमारी विवाद :- भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी के विवाह को लेकर जोधपुर तथा जयपुर के मध्य संघर्ष हुआ क्योंकि भीमसिंह ने अपनी पुत्री का विवाह जोधपुर शासक भीमसिंह से तय किया था लेकिन विवाह से पूर्व ही जोधपुर शासक भीमसिंह की मृत्यु हो गई जिसके बाद कृष्णा कुमारी का विवाह जयपुर नरेश जगतसिंह से होना तय किया गया।
  • इस रिश्ते का जोधपुर शासक मानसिंह ने विरोध किया तथा कृष्णा कुमारी का रिश्ता स्वयं से करने के लिए कहा।
  • इस कारण जयपुर शासक जगतसिंह ने अमीर खाँ पिण्डारी की सहायता से वर्ष 1807 में गिंगोली नामक स्थान पर जोधपुर की सेना को युद्ध में पराजित किया।
  • इसके बाद महाराणा भीमसिंह ने अमीर खाँ पिण्डारी की सलाह पर कृष्णा कुमारी को जहर देकर इस विवाद को समाप्त किया।
  • वर्ष 1818 में भीमसिंह ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि कर ली।
  • इनके समय किसना आढा ने भीम विलास ग्रंथ की रचना की।
  • महाराणा भीमसिंह के बाद जवानसिंह मेवाड़ के शासक बने।
  • 1831 में गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक की अजमेर यात्रा के समय महाराणा ने उनसे मुलाकात की।
  • महाराणा जवानसिंह ने पिछोला झील के तट पर जल निवास महलों का निर्माण करवाया।
  • जवानसिंह की मृत्यु के बाद सरदारसिंह मेवाड़ के महाराणा बने तथा इन्हीं के समय वर्ष 1841 में भीलों के उपद्रव को दबाने के लिए “मेवाड़ भील कोर’ का गठन किया गया।

गुहिल वंश का इतिहास

गुहिल वंश का इतिहास

महाराणा स्वरूप सिंह (1842 – 1861)

  • महाराणा स्वरूप सिंह ने वर्ष 1844 में कन्या वध पर तथा वर्ष 1853 में डाकन प्रथा पर प्रतिबंध लगाया। इन्होंने 1861 में सतीप्रथा पर रोक लगाने के लिए आदेश जारी किया।
  • इन्होंने मेवाड़ में जाली सिक्कों के प्रचलन को समाप्त करने के लिए स्वरूपशाही सिक्के चलाए।
  • इनके शासनकाल में बिजली गिरने से विजय स्तंभ का ऊपरी भाग क्षतिग्रस्त हो गया था जिसे इन्होंने पुन: निर्मित करवाया।
  • 1857 का स्वतंत्रता संग्राम इन्हीं के शासनकाल में हुआ।
  • महाराणा स्वरूप सिंह मृत्यु पर इनकी एक पासवान ऐंजाबाई सती हुई।

महाराणा शंभुसिंह (1861 – 1874)

  • महाराणा की अवयस्कता के कारण पॉलिटिकल एजेंट मेजर टेलर की अध्यक्षता में एक परिषद का गठन कर शासन चलाया जाने लगा।
  • इनके समय शंभु पलटन नाम से नई सेना का गठन किया गया।
  • इनके समय सती प्रथा, दास प्रथा तथा बच्चों के क्रय-विक्रय आदि पर कठोर प्रतिबंध लगाये गये।
  • मेवाड़ के यह पहले शासक थे जिनके साथ कोई सती नहीं हुई।

महाराणा सज्जनसिंह (1874 – 1884)

  • महाराणा सज्जनसिंह के समय गवर्नर जनरल लॉर्ड नार्थब्रुक उदयपुर की यात्रा पर आए। यह उदयपुर आने वाले प्रथम गवर्नर जनरल थे।
  • कविराज श्यामलदास की सलाह पर महाराणा ने इजलास खास का गठन किया जिसमें 15 सदस्य थे। यह दीवानी, फौजदारी तथा अपील संबंधी मामलों की परिषद थी।
  • 20 अगस्त, 1880 को महाराणा ने प्रजा को न्याय दिलाने तथा न्यायपूर्ण शासन प्रदान करने के लिए इजलास खास के स्थान पर महेन्द्राज सभा का गठन किया। इसमें 17 सदस्य थे।
  • अंग्रेजी सरकार ने इन्हें GCSI (Grand Commandor of The Star of India) की उपाधि प्रदान की। यह उपाधि लॉर्ड रिपन द्वारा स्वयं चित्तौड़ आकर महाराणा को प्रदान की।
  • महाराणा ने सज्जन निवास उद्यान बनवाया तथा सज्जन मंत्रालय की स्थापना करवाई।
  • इन्होंने कवि श्यामलदास को कविराज की उपाधि प्रदान की तथा सज्जनवाणी विलास नामक पुस्तकालय की स्थापना करवाकर श्यामलदास को इसका प्रमुख नियुक्त किया।

महाराणा फतेहसिंह (1884 – 1930)

  • इनके शासनकाल में वर्ष 1885 में गवर्नर जनरल डफरिन उदयपुर आए।
  • इन्होंने 1887 में महाराणी विक्टोरिया के शासन के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य पर सज्जन निवास बाग में विक्टोरिया हॉल का निर्माण करवाया।
  • महाराणा फतेहसिंह ने फतेह सागर झील का निर्माण करवाया।
  • 1911 में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के दिल्ली आगमन पर भव्य दरबार का आयोजन किया गया, जिसमें महाराणा फतेहसिंह दिल्ली गए लेकिन दरबार में हाजिर नहीं हुए।

महाराणा भूपाल सिंह (1930 – 1947)

  • इनके शासनकाल में बिजौलिया किसान आंदोलन, बेंगू किसान आंदोलन तथा मेवाड़ प्रजामण्डल आंदोलन आदि घटनाएं हुईं।
  • राजस्थान के एकीकरण के समय मेवाड़ के शासक भूपालसिंह थे।
  • इनके समय 18 अप्रैल, 1948 को उदयपुर रियासत का विलय संयुक्त राजस्थान में हो गया।

गुहिल वंश का इतिहास समाप्त

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rajasthan history in hindi | आमेर का कच्छवाहा वंश

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‘कच्छवाहा‘ अपने आपको भगवान श्री राम के पुत्र ‘कुश‘ की संतान मानते हैं।
संस्थापक – दुलहराय (तेजकरण), मूलतः ग्वालियर निवासी था।
1137 ई. में उसने बड़गुजरों को हराकर नवीन ढूँढाड़ राज्य की स्थापना की।
दुलहराय के वंशज कोकिलदेव ने 1207 ई. में मीणाओं से आमेर जीतकर अपनी राजधानी बनाया, जो 1727 ई. तक कच्छवाहा वंश की राजधानी रहा।
इसी वंश के शेखा ने शेखावटी मे अपना अलग राज्य बनाया।


भारमल (1547-1574 ई.) या बिहारीमल

1547 ई. में भारमल आमेर का शासक बना।
भारमल प्रथम राजस्थानी शासक था, जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार की व 1562 ई. में अपनी पुत्री हरखाबाई उर्फ मानमति या शाही बाई (मरियम उज्जमानी) का विवाह अकबर से किया।
मुगल बादशाह जहाँगीर हरखाबाई का ही पुत्र था।


भगवन्त दास (1574-1589 ई.)

भगवन्त दास या भगवान दास भारमल का पुत्र था।
उसने अपनी पुत्री मानबाई (मनभावनी) का विवाह शहजादे सलीम (जहाँगीर) से किया। मानबाई को ‘सुल्तान निस्सा‘ की उपाधि प्राप्त थी।
खुसरो इसी का पुत्र था।


मानसिंह (1589-1614 ई.)

मानसिंह भगवन्त दास का पुत्र था।
मानसिंह आमेर के कच्छवाहा शासकों में सर्वाधिक प्रतापी एवं महान् राजा था।
मानसिंह ने 52 वर्ष तक मुगलों की सेवा की।
मानसिंह 1573 में अकबर के दूत के रूप में राणा प्रताप से मिला था।
1576 ई. में हल्दीघाटी युद्ध में उसने शाही सेना का नेतृत्व किया था।
अकबर ने उसे फर्जन्द (पुत्र) एवं राजा की उपाधि प्रदान की। वह अकबर के नवरत्नों में शामिल था।
मानसिंह ने बंगाल में ‘अकबर नगर‘ तथा बिहार में ‘मानपुर नगर‘ को बसाया।
मानसिंह स्वयं कवि, विद्वान, साहित्य प्रेमी व विद्वानों का आश्रयदाता था।
शिलादेवी (आमेर), जगत शिरोमणी (आमेर) गोविन्द देवजी (वृंदावन) मंदिर उसी ने बनवाये थे।

rajasthan history in hindi
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जयसिंह प्रथम या मिर्जा राजा जयसिंह (1621-1667 ई.)

इसने तीन मुगल बादशाहों जहाँगीर, शाहजहां व औरंगजेब को अपनी सेवाएँ दी।
उसने औरंगजेब की तरफ से शिवाजी को सन्धि के लिए बाध्य किया। यह सन्धि इतिहास में पुरन्दर की सन्धि (जून 1665 ई.) के नाम से प्रसिद्ध है।
उसकी योग्यता एवं सेवाओं से प्रसन्न होकर शाहजहाँ ने उसे ‘मिर्जा राजा‘ की उपाधि प्रदान की।
बिहारी सतसई के रचयिता कवि बिहारी उसके दरबारी कवि थे।
बिहारी का भांजा कुलपति मिश्र भी बड़ा विद्वान था, जिसने 52 ग्रन्थों की रचना की इनका दरबारी था।
इनकी मृत्यु बुरहानपुर के पास हुई थी।


महाराजा रामसिंह प्रथम (1667-1689 ई.) :-

मिर्जाराजा जयसिंह की मृत्यु के पश्चात् रामसिंह आमेर के शासक बने।
औरगंजेब ने रामसिंह की निगरानी में शिवाजी को महल में कैद रखा था लेकिन शिवाजी वहाँ से भाग निकले।
1669 ई. में औरगंजेब ने इन्हें आसाम विद्रोह का दमन करने के लिए भेजा।
रामसिंह को विद्रोह का दमन करने के लिए काबुल भेजा गया जहाँ 1689 ई. में इनकी मृत्यु हो गई।


महाराजा बिशनसिंह (1689-1700 ई.) :-

रामसिंह के बाद इनका पौत्र बिशनसिंह (विष्णुसिंह) आमेर का शासक बना क्योंकि इनके पुत्र किशनसिंह का दक्षिण में रहते हुए देहांत हो गया था।
इन्होंने सिनसिनी के जाटों के विद्रोह का दमन किया तथा उसके बाद उन्हें मुल्तान भेजा गया जहाँ इन्होेंने सक्खर का दुर्ग जीता।
बिशनसिंह मुअज्ज्म के साथ काबुल में पठानों के विद्रोह को दबाने के लिए गए जहाँ इनका देहांत हो गया।


जयसिंह द्वितीय या सवाई जयसिंह (1700-1743 ई.)

इनका वास्तविक नाम विजयसिंह था।
बादशाह औरंगजेब ने उसकी वाकपटुता से प्रभावित होकर उसकी तुलना जयसिंह प्रथम से की तथा उसे जयसिंह प्रथम से भी अधिक योग्य अर्थात् सवाया जानकर विजयसिह का नाम बदलकर सवाई जयसिंह कर दिया।
सवाई जयसिंह ने मुगलों के लिए तीन बार मराठों से युद्ध किये।
सवाई जयसिंह द्वारा जाटों पर मुगलों की विजय होने के उपलक्ष्य में बादशाह मुहम्मद शाह ने जयसिंह को राज राजेश्वर, राजाधिराज, सवाई की उपाधि प्रदान की।
सवाई जयसिंह ने मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय से मिलकर 1734 ई. में हुरड़ा (भीलवाड़ा) मे राजस्थान के राजपूत राजाओं का सम्मेलन आयोजित किया जिसका उद्देश्य सामुहिक शक्ति द्वारा मराठा आक्रमण को रोकना था।
वह संस्कृत, फारसी, गणित एवं ज्योतिष का प्रकाण्ड विद्वान था उसे ‘ज्योतिष शासक’ भी कहा गया है।
उसने ‘जयसिंह कारिका’ नामक ज्योतिष ग्रन्थ की रचना की।
उसने जयपुर, दिल्ली, बनारस, उज्जैन व मथुरा में वैध शालाए बनवायी जिसमें सबसे बड़ी वेधशाला (जंतर-मंतर) जयपुर की है तथा सर्वप्रथम वेधशाला दिल्ली की है।
उसने 18 नवम्बर, 1727 ई. में जयपुर नगर की स्थापना की। जयपुर का प्रधान वास्तुकार बंगाली ब्राह्मण विद्याद्यर भट्टाचार्य था।
नाहरगढ़ दुर्ग, जयनिवास महल का निर्माण भी करवाया।
सवाई जयसिंह के समय ही आमेर राज्य का सर्वाधिक विस्तार हुआ।
वह अंतिम हिन्दू शासक था जिसने अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन करवाया। इस यज्ञ का पुरोहित पुण्डरीक रत्नाकर था।
मुगल बादशाह बहादुर शाह ने सवाई जयसिंह को आमेर की गद्दी से अपदस्थ करके विजय सिंह को आमेर का शासक बनाया तथा आमेर का नाम ‘मोमिनाबाद‘ रखा था।
पुण्डरीक रत्नाकर ने ‘जयसिंह कल्पदुम‘ नामक पुस्तक लिखी।


सवाई ईश्वरी सिंह (1743-1750 ई.)

महाराजा सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र ईश्वरीसिंह ने राजकाज संभाला। परन्तु उनके भाई माधोसिंह ने राज्य प्राप्त करने हेतु मराठों एवं कोटा-बून्दी की संयुक्त सेना के साथ जयपुर पर आक्रमण कर दिया।
बनास नदी के पास 1747 ई. में राजमहल (टोंक) स्थान पर हुए युद्ध में ईश्वरीसिंह की विजय हुई, जिसके उपलक्ष्य में उन्होंने जयपुर के त्रिपोलिया बाजार में एक ऊंची मीनार ईसरलाट (वर्तमान सरगासूली) का निर्माण कराया।
1750 ई. में मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर ने पुनः जयपुर पर आक्रमण किया। तब सवाई ईश्वरीसिंह ने आत्महत्या कर ली।


महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम (1750-1768 ई.)

जयपुर महाराजा ईश्वरीसिंह द्वारा आत्महत्या कर लेने पर माधोसिंह जयपुर की गद्दीपर बैठे।
माधोसिंह के राजा बनने के बाद मराठा सरदार मल्हार राव होल्कर एवं जय अप्पा सिंधिया ने इससे भारी रकम की मांग की, जिसके न चुकाने पर मराठा सैनिकों ने जयपुर में उपद्रव मचाया, फलस्वरूप नागरिकों ने व्रिदोह कर मराठा सैनिकों का कत्लेआम कर दिया।
महाराजा माधोसिंह ने मुगल बादशाह अहमदशाह एवं जाट महाराजा सूरजमल (भरतपुर) एवं अवध नवाब सफदरजंग के मध्य समझौता करवाया। इसके परिणामस्वरूप बादशाह ने रणथम्भौर किला माधोसिंह को दे दिया। इससे नाराज हो कोटा महाराजा शत्रुसाल ने जयपुर पर आक्रमण कर नवम्बर, 1761 ई. में भटवाड़ा के युद्ध में जयपुर की सेना को हराया।
1768 ई. में इनकी मृत्यु हो गई। इन्होंने जयपुर में मोती डूंगरी पर महलों का निर्माण करवाया।


सवाई प्रतापसिंह (1778-1803 ई.)

महाराजा पृथ्वीसिंह की मृत्यु होने पर उनके छोटे भाई प्रतापसिंह ने 1778 ई. में जयपुर का शासन संभाला। इनके काल में अंग्रेज सेनापति जॉर्ज थॉमस ने जयपुर पर आक्रमण किया।
मराठा सेनापति महादजी सिंधिया को भी जयपुर राज्य की सेना ने जोधपुर नेरश महाराणा विजयसिंह के सहयोग से जुलाई, 1787 में तुंगा के मैदान में बुरी तरह पराजित किया।
प्रतापसिंह जीवन भर युद्धों में उलझे रहे फिर भी उनके काल में कला साहित्य में अत्यधिक उन्नति हुई। वे विद्वानों एवं संगीतज्ञों के आश्रयदाता होने के साथ-साथ स्वयं भी ब्रजनिधि नाम से काव्य रचना करते थे।
इन्होंने जयपुर में एक संगीत सम्मेलन करवाकर ‘राधागोविंद संगीत सार’ गंथ की रचना करवाई।


महाराजा जगतसिंह द्वितीय (1803-1818 ई.) :-

महाराजा सवाई प्रतापसिंह के बाद जगतसिंह द्वितीय जयपुर के शासक बने।
मेवाड़ महाराणा भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी का विवाह जोधपुर शासक भीमसिंह से तय हुआ परन्तु उनकी मृत्यु हो जाने के कारण कृष्णाकुमारी का विवाह जयपुर के जगतसिंह II के साथ तय हुआ। जोधपुर शासक मानसिंह ने इसे अपना अपमान समझा तथा 1807 ई. में गिंगोली का युद्ध हुआ जिसमें जयपुर की सेना ने जोधपुर की सेना को पराजित किया।
जगतसिंह II पर नर्तकी रसकपुर का काफी प्रभाव था।
1818 ई. में जगतसिंह II ने मराठों तथा पिण्डारियों से राज्य की रक्षा करने हेतु ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि की।

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महाराजा जयसिंह तृतीय (1818-1835 ई.) :-

जगतसिंह II की मृत्यु के समय इनका कोई वारिस नहीं होने के कारण नरवर के जागीरदार मोहनसिंह को शासक बनाया गया।
जगतसिंह II की मृत्यु के समय इनकी भटियाणी रानी गर्भवती थी जिसने कुंवर जयसिंह को जन्म दिया।
इसके बाद जयसिंह को जयपुर के सिंहासन पर बिठाया गया।
इनके समय इनकी माता भटियाणी रानी तथा रूपा बढ़ारण का हस्तक्षेप अधिक रहा।
1835 ई. में इनका अल्पायु में देहांत हो गया।


महाराजा रामसिंह द्वितीय (1835-1880 ई.)

महाराजा रामसिंह को नाबालिग होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने अपने संरक्षण में ले लिया। इनके समय मेजर जॉन लुडलो ने जनवरी, 1843 ई. में जयपुर का प्रशासन संभाला सरकार ने अपने संरक्षण में ले लिया।
इनके समय मेजर जॉन लुडलो ने जनवरी, 1843 ई. में जयपुर का प्रशासन संभाला तथा उन्होंने सतीप्रथा, दास प्रथा एवं कन्या वध, दहेज प्रथा आदि पर रोक लगाने के आदेश जारी किये।
महाराजा रामसिंह को वयस्क होने के बाद शासन के समस्त अधिकार दिये गये। 1857 ई. के स्वतंत्रता आन्दोलन में महाराजा रामसिंह ने अंग्रेजों की भरपूर सहायता की। अंगेजी सरकार ने इन्हें सितार-ए-हिन्द की उपाधि प्रदान की।
1870 ई. में गवर्नर जनरल एवं वायसराय लॉर्ड मेयो ने जयपुर एवं अजमेर की यात्रा की।
दिसम्बर, 1875 ई. में गवर्नर जनरल नार्थब्रुक तथा फरवरी, 1876 ई. प्रिंस अल्बर्ट ने जयपुर की यात्रा की। उनकी यात्रा की स्मृति में जयपुर में अल्बर्ट हॉल (म्यूजियम) का शिलान्यास प्रिंस अल्बर्ट के हाथों करवाया गया तथा जयपुर को गुलाबी रंग (1835 – 1880 ई.) से रंगवाया ।
इनके समय सन् 1845 में जयपुर में महाराजा कॉलेज तथा संस्कृत कॉलेज का निर्माण हुआ। महाराजा रामसिंह के काल में जयपुर की काफी तरक्की हुई। 1880 ई. में इनका निधन हो गया।
जयपुर के सवाई प्रतापसिंह ने 1799 ई. में हवामहल का निर्माण करवाया। हवामहल में 953 खिड़कियाँ है तथा यह पाँच मंजिला है।


सवाई माधोसिंह द्वितीय (1880-1922 ई.):-

सवाई रामसिंह द्वितीय के देहांत के पश्चात माधोसिंह द्वितीय जयपुर के शासक बने।
1902 ई. में माधोसिंह II ब्रिटिश सम्राट एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक में शामिल होने इंग्लैंड गये तब वे अपने साथ गंगा जल से भरे हुए चांदी के दो विशाल जार लेकर गये थे।
ये जार विश्व के सबसे बड़े जार है जो गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।
इन्होंने मदनमोहन मालवीय का जयपुर में भव्य स्वागत किया तथा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए 5 लाख रुपये दिये।
माधोसिंह द्वितीय ने जयपुर के सिटी पैलेस में मुबारक महल का निर्माण करवाया जो इस्लामिक तथा ईसाई शैली में निर्मित है।
इन्होंने नाहरगढ़ दुर्ग में अपनी नौ पासवानों के लिए नौ सुन्दर महलों का निर्माण करवाया।
माधोसिंह II ने वृंदावन में माधव बिहारी जी के मंदिर का निर्माण करवाया।
माधोसिंह II के कोई पुत्र न हाेने पर इन्होंने ईसरदा के ठाकुर सवाईसिंह के पुत्र मोरमुकुट सिंह को गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।


सवाई मानसिंह द्वितीय (1922-1949 ई.)

महाराजा माधोसिंह II के पश्चात मोरमुकुट सिंह 1922 में सवाई मानसिंह II के नाम से जयपुर के शासक बने।
इन्होंने अपने प्रधानमंत्री मिर्जा इस्माईल की सहायता से जयपुर को आधुनिक रूप दिया तथा अपने नाम से हॉस्पिटल, मेडिकल कॉलेज, स्कूल तथा स्टेडियम आदि बनवाये।
ये पोलो के एक अच्छे खिलाड़ी थे जिससे इन्होंने विश्वभर में प्रसिद्धि प्राप्त की।
इनकी एक रानी कूच बिहार के शासक की पुत्री गायत्री देवी थी जिसके लिए इन्होंने मोती डूंगरी पर तख्त-ए-शाही महलों का निर्माण करवाया।
मानसिंह II ने जयपुर में सिटी पैलेस म्यूजियम की स्थापना की।
30 मार्च, 1949 को इन्हें वृहत राजस्थान का प्रथम रामप्रमुख बनाया गया।
वर्ष 1960 में ये राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए तथा 1965 में इन्हें स्पेन में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया ।
“अलवर का कच्छवाहा वंश”

अलवर प्राचीन मत्स्य प्रदेश का हिस्सा था जिसकी राजधानी विराट नगर थी।
11 वीं शताब्दी में यह क्षेत्र चौहानों के अधीन था लेकिन पृथ्वीराज तृतीय की तराईन के द्वितीय युद्ध में पराजय के बाद यह क्षेत्र स्वतंत्र हो गया।
आमेर के कच्छवाहा शासक उदयकरण के पुत्र वीरसिंह ने मौजमाबाद की जागीर ली तथा इसी का पौत्र नरू हुआ जिसके वशंज नरूका कच्छवाहा कहलाये।
कल्याण सिंह नरूका आमेर शासक मिर्जाराजा जयसिंह के समय मौजमाबाद की जागीर का मालिक था तथा इन्होंने कल्याण सिंह को माचेड़ी की जागीर प्रदान की।


प्रताप सिंह नरूका (1775-1790 ई.)

प्रतापसिंह मोहब्बत सिंह का पुत्र था जिसने 1775 ई. में अलवर राज्य की स्थापना की।
प्रतापसिंह जयपुर के शासक सवाई माधोसिंह प्रथम की सेवा में था।
भरतपुर के जवाहर सिंह की सेना का जयपुर की सेना से मावंडा नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें प्रतापसिंह ने जयपुर की सेना का साथ दिया ।
इससे प्रसन्न होकर माधोसिंह ने प्रतापसिंह को ‘रावराजा’ की उपाधि प्रदान की।
1770 ई. में प्रतापसिंह ने राजगढ़ दुर्ग तथा टहला दुर्ग का निर्माण करवाया।
1772 ई. में मालाखेड़ा दुर्ग, 1773 में बलदेवगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया।
1774 ई. में मुगल सेनापति नजफ खाँ ने प्रतापसिंह की सहायता से आगरा के किले को भरतपुर के अधिकार से मुक्त करवाया।
1774 ई. में माचेड़ी की जागीर हमेशा के लिए जयपुर राज्य से स्वतंत्र हो गई।
1782 ई. में जयपुर शासक महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने राजगढ़ पर आक्रमण कर प्रतापसिंह के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।
अलवर के प्रतापसिंह ने महादजी सिंधिया की सहायता से जयपुर पर आक्रमण किया तब जयपुर के सवाई प्रतापसिंह तथा अवलर के प्रतापसिंह के मध्य समझौता हो गया।


बख्तावर सिंह (1790-1815 ई.) :-

प्रतापसिंह के बाद उनके पुत्र बख्तावर सिंह अलवर के शासक बने।
इन्हाेंने 1803 ई. के लासवाड़ी के युद्ध में मराठों के विरूद्ध अंग्रेजों की सहायता की तथा अंग्रेजों ने इन्हें ‘राठ’ नामक क्षेत्र दिया।
1803 ई. में बख्तावर सिंह ने अंग्रेजों के साथ सहयोग संधि की थी।


महाराजा विनय सिंह (1815-57 ई.)

बख्तावर सिंह ने देहांत के बाद कुछ सरदार उनके भतीजे विनयसिंह (बन्नेसिंह) को तथा कुछ सरदार उनकी पासवान से उत्पन्न पुत्र बलवंत सिंह को शासक बनाना चाहते थे।
अत: 1815 ई. में दोनाें विनयसिंह तथा बलवंत सिंह एक साथ सिंहासन पर बैठे तथा कम्पनी सरकार द्वारा दाेनों को बराबर का शासक होने की मान्यता दे दी गई।
बाद में विनयसिंह के दबाव के कारण बलवंत सिंह को शासक पद से हटा दिया गया तथा उन्हें नीमराणा तथा तिजारा की जागीर दे दी गई।
इस प्रकार नीमराणा अलवर से अलग एक रियासत बनी। 1845 ई. में बलवंत सिंह की नि:संतान मृत्यु होने से नीमराणा को पुन: अलवर में मिला दिया गया।
विनयसिंह ने मेव जाति से सुरक्षा के लिए रघुनाथगढ़ दुर्ग बनवाया।
1857 की क्रांति के समय अलवर के शासक विनयसिंह थे।


महाराजा शिवदानसिंह (1857-1874 ई.) :-

महाराजा विनयसिंह के देहांत के बाद शिवदान सिंह अलवर के शासक बने।
इनके अवयस्क होने के कारण शासन कार्य मुंशी अम्मूजान ने संभाला।
राजपूत सरदारों ने अम्मूजान के विरूद्ध विद्रोह कर दिया जिस कारण यह वहाँ से भाग निकले।
यहाँ फैली अशांति के कारण पॉलिटिकल एजेंट निक्सन ने स्वयं वहां आकर ठाकुर लखधीर सिंह की अध्यक्षता में एक कौंसिल का गठन किया।
अलवर के पॉलिटिकल एजेंट कप्तान इम्पी ने अलवर में ‘इम्पी तालाब’ का निर्माण करवाया।
अलवर में शिवदानसिंह के कुप्रशासन के कारण पोलिटिकल एजेंट की अध्यक्षता में कौंसिल का गठन किया तथा इन्हें पद से हटाकर कौंसिल का एक सदस्य मात्र बना दिया।

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महाराजा मंगलसिंह (1874-1892 ई.)

महाराजा शिवदानसिंह के बाद मंगलसिंह को अलवर रियासत का शासक बनाया गया।
इनके अवयस्क होने के कारण पण्डित मनफूल को इनका संरक्षक नियुक्त किया गया।
1888 ई. में अंग्रेज सरकार ने इन्हें कर्नल की उपाधि तथा महाराजा का खिताब प्रदान किया।


महाराजा जयसिंह (1892-1933 ई.)

महाराजा मंगलसिंह के बाद जयसिंह अलवर के शासक बने।
इन्होंने अलवर की राजभाषा उर्दू के स्थान पर हिन्दी को बनाया।
जयसिंह ने नरेन्द्र मंडल के सदस्य के रूप में प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया। नरेन्द्र मंडल को यह नाम जयसिंह ने ही दिया था।
इन्हीं के समय नीमूचाणा हत्याकांड (1925) हुआ था।
1933 में अंग्रेज सरकार ने इन्हें महाराजा के पद से हटाकर राज्य से निष्कासित कर दिया।


महाराजा तेजसिंह (1937-1948 ई.)

महाराजा जयसिंह के बाद चन्दपुरा के ठाकुर गंगासिंह के पुत्र तेजसिंह अलवर रियासत के शासक बने।
इन्होंने अलवर में कई स्कूल तथा हॉस्टल स्थापित करवाए।
18 मार्च, 1948 को मत्स्य संघ में अलवर का विलय किया गया तथा इस संघ की राजधानी अलवर तथा उपराजप्रमुख तेजसिंह बने।
“’शेखावटी के कच्छवाहा”

शेखावटी का क्षेत्र जयपुर रियासत का ही भाग था जिसमें सीकर झुंझुनूं का क्षेत्र आता था।
राव शेखा आमेर के कच्छवाहा वंश के राजपूत सरदार मोकल कच्छवाहा का पुत्र था।
इसने सीकर-झुंझुनूं पर अपना राज्य स्थापित किया तथा यह क्षेत्र राव शेखा के नाम से शेखावाटी कहलाया। इसके वंशज शेखावत कहलाये।
राव शेखा ने अपनी राजधानी अमरसर को बनाया।
राव शेखा के बाद क्रमश: राव रायमल, राव सूजा, राव लूणकर्ण आदि अमरसर के शासक बने।
राव मनोहर ने अपने पिता लूणकर्ण से जागीर छीन ली तथा स्वयं जागीरदार बना। इसने मनोहरपुर कस्बा बसाया।
इसके बाद के शेखावत शासकों ने कायमखानियों को परास्त कर झुंझुनूं, नरहर आदि क्षेत्र जीत लिया।
शेखावाटी के शासकों को जयपुर राज्य की ओर से ‘ताजिमी सरदार’ सम्मान से नवाजा गया।

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Daily Current Affair Questions 11 जुलाई 2020

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1.किसने रहेजा QBE जनरल इंश्योरेंस का अधिग्रहण करने की घोषणा की है ?

A पेटीएम 

B स्टेट बैंक ऑफ इंडिया

C बैंक ऑफ बड़ौदा 

D पंजाब नेशनल बैंक 

ANS – पेटीएम 

2.किसने रील्स नामक शार्ट वीडियो फीचर लॉन्च करने की घोषणा की है ?

A  इंस्टाग्राम

B  गूगल 

C यूट्यूब

D  व्हाट्सएप

ANS – इंस्टाग्राम

3. किस राज्य सरकार ने रबारी भारवाड़ और चारण जैसी आदिवासी जातियों के अधिकारों की रक्षा के लिए 5 सदस्य ही आयोग का गठन किया है ?

A  राजस्थान

B  गुजरात 

C मध्य प्रदेश 

D महाराष्ट्र

ANS – गुजरात 

4. किस देश की स्क्वैश खिलाड़ी रानेम एल वेल्ली रिटायरमेंट का ऐलान किया है ?

A  इंडिया 

B इजिप्ट

C  अमेरिका 

D आयरलैंड

ANS – इजिप्ट

5. किस बैंक के सीएमडी राज किरण राय का कार्यकाल 2 साल बढ़ाया गया है ?

A यूनियन बैंक 

B इंडसइंड बैंक

C  एचडीएफसी बैंक

D  आईसीआईसीआई बैंक

ANS – यूनियन बैंक 

6. ‘महावीर द सोल्जर हु नेवर डाइड’ नामक पुस्तक किसने लिखी है ?

A रुपाश्री कुमार 

B आजाद सिंह 

C प्रदुमन

D बिलाल अख्तर 

ANS – रुपाश्री कुमार 

7.लग्जरी राइड मल्टी ब्रांड लग्जरी कार शोरूम में किसे अपना ब्रांड अंबेसडर बनाया है ?

A  सुखबीर सिंह 

B महेंद्र सिंह धोनी 

C विराट कोहली 

D सचिन तेंदुलकर

ANS – सुखबीर सिंह 

8. गूगल ने गूगल प्लस को किस नाम से लांच किया है ?

A गूगल प्राइम 

B गूगल करंट 

C गूगल पास 

D गूगल फ्यूचर

ANS –  गूगल करंट 

Daily Current Affair Questions

9. छिपकली की एक नई प्रजाति सीताना धरवारेंसीस को किस राज्य ने खोजा है ?

A कर्नाटक

B  राजस्थान 

C गुजरात

D  मध्य प्रदेश

ANS – कर्नाटक

10. आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार बाजार कर्ज के मामले में कौन प्रथम स्थान पर है ?

A  तमिलनाडु

B  कर्नाटक 

C गुजरात

D  राजस्थान 

ANS – तमिलनाडु

11.इंडिया ग्लोबल वीक 2020 सम्मेलन कहां शुरू हुआ है ?

A ब्रिटेन 

C फ्रांस 

C रोमानिया

D चेकोस्लोवाकिया

ANS – ब्रिटेन 

12. चार्ली डेनियल  का निधन हुआ है वह कौन थे ?

A म्यूजिशियंस

B  सिंगर

C  डांसर 

D एक्टर

ANS –  म्यूजिशियंस

13. योप्तिमा वाटसोनी तितली को 61 साल बाद कहां खोजा गया है ?

A त्रिपुरा 

B हिमाचल

C अरुणाचल

D  लद्दाख

ANS – त्रिपुरा 

14. आईआईटी हैदराबाद में भारत के पहले एआई टेक्नोलॉजी सेंटर की स्थापना के लिए किसके साथ समझौता किया है ?

A इंफोसिस 

B रिलायंस

C टाटा

D NVIDIA

ANS – NVIDIA

15. नादौन पुलिस स्टेशन को देश के सर्वश्रेष्ठ पुलिस स्टेशन के रूप में चुना गया है वह किस राज्य में है ?

A राजस्थान

B  पंजाब

C हिमाचल प्रदेश 

D कश्मीर

ANS – हिमाचल प्रदेश 

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rathore vansh | राठौड़ वंश | राजस्थान का इतिहास

rathore vansh

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राठौड़ वंश (rathore vansh)


{1} जोधपुर के राठौड़
(jodhpur ka rathore vansh)

राजस्थान के उत्तरी व पश्चिमी भागों मे राठौड़ वंशीय राजपूतों का साम्राज्य स्थापित हुआ, जिसे मारवाड़ कहते है।
राठौड़ का शाब्दिक अर्थ राष्ट्रकूट होता है।
जोधपुर के राठौड़ों का मूल स्थान कन्नौज था। उनको बंदायूँ वंश से उत्पन्न माना जाता है।
जोधपुर के राठौड़ वंश का संस्थापक राव सीहा था, जो कन्नौज के जयचंद गहड़वाल का प्रपौत्र था।
राव सीहा कुंवर सेतराम का पुत्र था व उसकी रानी सोलंकी वंश की पार्वती थी।
प्रमुख शासक

राव चूड़ा राठौड़

राव वीरमदेव का पुत्र, मारवाड़ का प्रथम बड़ा शासक था।
उसने मंडोर को मारवाड़ की राजधानी बनाया।
मारवाड़ राज्य में ‘सामन्त प्रथा‘ का प्रारम्भ राव चूड़ा द्वारा किया गया था।
राव चूड़ा की रानी चाँदकंवर ने चांद बावड़ी बनवाई।
राव चूड़ा ने नागौर के सूबेदार ‘जल्लाल खां‘ को हराकर नागौर के पास ‘चूड़ासर‘ बसाया था।
राव चूड़ा ने अपनी ‘मोहिलाणी‘ रानी के पुत्र ‘कान्हा‘ को राज्य का उत्तराधिकारी नियुक्त किया और अपने ज्येष्ठ पुत्र ‘रणमल‘ को अधिकार से वंचित कर दिया।
राठौड़ रणमल ने मेवाड़ के राणा लाखा, मोकल तथा महाराणा कुम्भा को अपनी सेवायें प्रदान की।
1438 ई. में मेवाड़ के सामन्तों ने षड़यंत्र रचकर रणमल की हत्या कर दी थी।
चूड़ा की पुत्री हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा के साथ हुआ।
चूड़ा के पुत्र रणमल की हत्या चित्तौड़ में हुई थी। (कुम्भा के कहने पर)


राव जोधा (1438-89 ई.)

रणमल का पुत्र।
जोधा ने 12 मई 1459 ई. में जोधपुर नगर की स्थापना की तथा चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर दुर्ग (मेहरानगढ़/मयूरध्वज/गढ़चिन्तामणि) बनवाया।
राव जोधा ने अपनी पुत्री का विवाह कुम्भा के पुत्र रायमल के साथ किया था।
मेहरानगढ़ की नींव करणी माता के हाथों रखी गई थी।
किपलिंग ने मेहरानगढ़ किले के लिए कहा, “यह किला परियों व अप्सराओं द्वारा निर्मित किला है।”
मेहरानगढ़ दुर्ग में मेहरसिंह व भूरे खां की मजार है।
मेहरानगढ़ दुर्ग में शम्भू बाण, किलकिला व गज़नी खां नामक तोपे हैं।
राव जोधा ने मेहरानगढ़ किले में चामुण्डा देवी का मन्दिर बनवाया जिसमें 30 सितम्बर 2008 को देवी के मन्दिर में दुर्घटना हुई जिसकी जाँच के लिए जशराज चौपड़ा कमेटी गठित की गयी।
राव जोधा के दो प्रमुख उत्तराधिकारी थे- राव सातल तथा राव सूजा

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राव गांगा (1515-32)

राव सूजा की मृत्यु के बाद उसका पौत्र गांगा मारवाड़ का शासक बना।
राव गांगा बाघा जी के पुत्र थे।
खानवा के युद्ध में गांगा ने अपने पुत्र मालदेव के नेतृत्व में सेना भेजकर राणा सांगा की मदद की थी।
राव गांगा ने गांगलोव तालाब, गांगा की बावड़ी व गंगश्याम जी के मंदिर का निर्माण करवाया।


राव मालदेव (1532-62 ई.)

राव मालदेव राव गांगा का बड़ा पुत्र था।
मालदेव ने उदयसिंह को मेवाड़ का शासक बनाने में मदद की।
मालदेव की पत्नी उमादे (जो जैसलमेर के राव लूणकर्ण की पुत्री थी) को रूठीरानी के नाम से जाना जाता है।
अबुल फज़ल ने मालदेव को ‘हशमत वाला’ शासक कहा था।
शेरशाह सूरी व मालदेव के दो सेनापतियों जैता व कुम्पा के बीच जनवरी, 1544 ई. मे गिरी सुमेल का युद्ध (जैतारण का युद्ध) हुआ जिसमें शेरशाह बड़ी मुश्किल से जीत सका।
गिरी सूमेल के युद्ध के समय ही शेरशाह के मुख से निकला कि “मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाहत खो देता।“
राव मालदेव के समय सिवाणा पर राणा डूँगरसी का अधिकार था।
राव मालदेव के समय बीकानेर का शासक राव जैतसी था।
मालदेव की रानी उमादे (रूठी रानी) को अजमेर से मनाकर ईश्वरदास जी जोधपुर लाये लेकिन आसा बारहठ ने रानी को एक दोहा सुनाया जिससे वह वापस नाराज हो गई।


राव चन्द्रसेन (1562-1581 ई.)

राव चन्द्रसेन मालदेव का तीसरा पुत्र था।
चन्द्रसेन के भाई राम के कहने पर अकबर ने सेना भेजकर जोधपुर पर कब्जा कर लिया था।
सन् 1570 ई. के नागौर दरबार में वह अकबर से मिला था लेकिन शीघ्र ही उसने नागौर छोड़ दिया।
चन्द्रसेन मारवाड़ का पहला राजपूत शासक था जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और मरते दम तक संघर्ष किया। ‘मारवाड़ का भूला बिसरा नायक’ नाम से प्रसिद्ध।
चन्द्रसेन को ‘मारवाड़ का प्रताप’ कहा जाता है।


राव चन्द्रसेन (1562-1581 ई.)

राव चन्द्रसेन का भाई।
राव उदयसिंह को मोटा राजा के नाम से भी जाना जाता है।
राव उदयसिंह ने 1570 ई. में अकबर की अधीनता स्वीकार की।
उसने अपनी पुत्री जोधाबाई (जगत गुंसाई/भानमती) का विवाह 1587 ई. में शहजादे सलीम (जहाँगीर) के साथ किया।
शहजादा खुर्रम इसी जोधाबाई का पुत्र था।
सवाई राजा सूरसिंह (1595-1619 ई.) :-

मोटाराजा उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात मुगल सम्राट अकबर ने सूरसिंह को उत्तराधिकारी घोषित किया।
इन्हें टीका देने की रस्म लाहौर में सम्पन्न की गई।
1604 ई. में अकबर ने इन्हें ‘सवाई राजा’ की उपाधि प्रदान की।
अकबर ने इन्हें दक्षिण में नियुक्त किया तब जोधपुर का शासन-प्रबंध इनके पुत्र गजसिंह तथा भाटी गोविंददास ने संभाला था।
सूरसिंह ने जहाँगीर को रणरावत तथा फौज शृंगार नामक हाथी भेंट किए थे।
1613 ई. में खुर्रम के मेवाड़ अभियान में भी सूरसिंह शामिल थे।
जहाँगीर ने इनका मनसब 5000 जात व 3000 सवार कर दिया था।
1619 ई. में दक्षिण में रहते हुए सूरसिंह का देहांत हो गया।
सूरसिंह ने जोधपुर में सूरसागर तालाब तथा जोधपुर दुर्ग में मोती महल का निर्माण करवाया।


महाराजा गजसिंह (1619-1638 ई.) :-

महाराजा सूरसिंह की मृत्यु के बाद गजसिंह जोधपुर के शासक बने तथा बुरहानपुर में इनका राज्याभिषेक किया गया।
गजसिंह की सेवाओं से प्रसन्न होकर मुगल सम्राट जहाँगीर ने इन्हें ‘दलथंभन’ की उपाधि प्रदान की।
1630 ई. में जहाँगीर ने गजसिंह को ‘महाराजा’ की उपाधि भी प्रदान की।
गजसिंह का ज्येष्ठ पुत्र अमरसिंह था लेकिन उन्हाेंने अपनी प्रेमिका अनारां के कहने पर अपना उत्तराधिकारी छोटे पुत्र जसवंत सिंह को घोषित किया।
गजसिंह ने मुगल शासक जहाँगीर तथा शाहजहाँ को अपनी सेवाएं प्रदान की।
गजसिंह के समय हेम कवि ने ‘गुणभाषा चित्र’ व केशवदास गाडण ने ‘राजगुणरूपक’ नामक ग्रंथों की रचना की।
राव अमरसिंह :–

अमरसिंह गजसिंह का ज्येष्ठ पुत्र था लेकिन इनकी विद्रोही तथा स्वतंत्र प्रवृत्ति के कारण गजसिंह ने इन्हें राज्य से निकाल दिया।
इसके बाद अमरसिंह मुगल बादशाह शाहजहाँ के पास चले गए।
शाहजहाँ ने इन्हें नागौर परगने का स्वतंत्र शासक बना दिया।
1644 ई. में बीकानेर के सीलवा तथा नागौर के जाखणियां के गाँव में मतीरे की बैल को लेकर मतभेद हुआ। इस मतभेद कारण नागौर के अमरसिंह तथा बीकानेर के कर्णसिंह के मध्य युद्ध हुआ जिसमें अमरसिंह पराजित हुआ। यह लड़ाई ‘मतीरे की राड़’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।
सलावत खाँ ने अमरसिंह को द्वेषवश अपशब्द बोले थे जिससे नाराज अमरसिंह ने इसकी हत्या कर दी तथा उसके अन्य मनसबदारों से लड़ते हुए अमरसिंह वीरगति को प्राप्त हुए।


महाराजा जसवंतसिंह (प्रथम) (1638-78 ई.)

महाराजा जसवंत सिंह प्रथम का जन्म 26 दिसम्बर, 1626 ई. में बुहरानपुर में हुआ था।
गजसिंह के पुत्र जसवन्तसिंह की गिनती मारवाड़ के सर्वाधिक प्रतापी राजाओं में होती है।
शाहजहाँ ने उसे ‘महाराजा’ की उपाधि प्रदान की थी। वह जोधपुर का प्रथम महाराजा उपाधि प्राप्त शासक था।
शाहजहाँ की बीमारी के बाद हुए उत्तराधिकारी युद्ध में वह शहजादा दाराशिकोह की ओर से धरमत (उज्जैन) के युद्ध (1657 ई.) में औरंगजेब व मुराद के विरुद्ध लड़कर हारा था।
वीर दुर्गादास इन्हीं का दरबारी व सेनापति था।
मुहता (मुहणोत) नैणसी इन्हीं के दरबार में रहता था। नेणसी ने ‘मारवाड़ री परगना री विगत’ तथा ‘नैणसी री ख्यात’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखे। इसे ‘मारवाड़ का अबुल फजल‘ कहा जाता है।
उसने मुगलों की ओर से शिवाजी के विरूद्ध भी युद्ध में भाग लिया था।
इनकी मृत्यु सन् 1678 ई. में अफगानिस्तान के जमरूद नामक स्थान पर हुई थी।
महाराजा जसवंत सिंह ने ‘भाषा-भूषण’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की।
जसवंतसिंह द्वारा रचित अन्य ग्रंथ अपरोक्ष सिद्धान्त सार व प्रबोध चन्द्रोदय नाटक हैं।


अजीतसिंह (1678-1724 ई.)

अजीतसिंह जसवन्त सिंह प्रथम का पुत्र था।
वीर दुर्गादास राठौड़ ने अजीतसिंह को औरंगजेब के चंगुल से मुक्त कराकर उसे मारवाड़ का शासक बनाया था।
अजीतसिंह ने अपनी पुत्री इन्द्रकुंवरी का विवाह मुगल बादशाह फर्रूखशियर से किया था। अजीतसिंह की हत्या उसके पुत्र बख्तसिंह द्वारा की गयी।
अजीतसिंह के दाह संस्कार के समय अनेक मोर तथा बन्दरों ने स्वेच्छा से अपने प्राणों की आहुति दी।
दुर्गादास राठौड़

वीर दुर्गादास जसवन्त सिंह के मंत्री आसकरण का पुत्र था।
उसने अजीतसिंह को मुगलों के चंगुल से मुक्त कराया।
उसने मेवाड़ व मारवाड़ में सन्धि करवायी।
अजीतसिंह ने दुर्गादास को देश निकाला दे दिया तब वह उदयपुर के महाराजा अमर सिंह द्वितीय की सेवा मे रहा।
दुर्गादास का निधन उज्जैन में हुआ और वहीं क्षिप्रा नदी के तट पर उनकी छतरी (स्मारक) बनी हुई है।


महाराजा अभयसिंह (1724-1749 ई.)

महाराजा अजीतसिंह की मृत्यु के बाद 1724 ई. में उनका पुत्र अभयसिंह जोधपुर का शासक बना।
इनका राज्याभिषेक दिल्ली में हुआ।
इन्होंने 1734 ई. में मराठों के विरूद्ध राजपूताना के शासकों को एकजुट करने के लिए आयोजित हुरड़ा सम्मेलन में भाग लिया।
इनके समय चारण कवि करणीदान ने ‘सूरजप्रकाश’, भट्‌ट जगजीवन ने ‘अभयोदय’, वीरभाण ने ‘राजरूपक’ तथा सूरतिमिश्र ने ‘अमरचंद्रिका’ ग्रंथ की रचना की।
अभयसिंह ने मण्डोर में अजीत सिंह का स्मारक बनवाना प्रारंभ किया लेकिन इनके समय यह निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो सका।
इनके समय चारण कवि पृथ्वीराज द्वारा ‘अभयविलास’ काव्य लिखा गया।


महाराजा रामसिंह (1749-1751 ई.) :-

महाराजा अभयसिंह के निधन के बाद रामसिंह शासक बने।
यह एक कमजोर शासक थे तथा सरदारों के प्रति इनका व्यवहार भी अच्छा नहीं था जिसके कारण इन्हें शासक पद से हाथ धाेना पड़ा।


महाराजा बख्तसिंह (1751-1752 ई.)

बख्तसिंह ने महाराजा रामसिंह को पराजित कर जोधपुर पर अधिकार कर लिया।
बख्तसिंह महाराजा अजीतसिंह के पुत्र तथा महाराजा अभयसिंह के छोटे भाई थे।
बख्तसिंह वीर, बुद्धिमान तथा कार्यकुशल शासक थे।
इन्होंने नागौर के किले में कई महल बनावाए जिनमें से ‘आबहवा महल’ अधिक प्रसिद्ध है।
इन्होंने अपने पिता अजीतसिंह की हत्या कर दी थी जिस कारण ये पितृहंता कहलाए।
1752 ई. में सींघोली (जयपुर) नामक स्थान पर इनका देहांत हो गया।


महाराजा विजयसिंह (1752-1793 ई.):-

महाराजा बख्तसिंह के देहांत के बाद विजयसिंह मारवाड़ के शासक बने।
इस समय रामसिंह ने पुन: जोधपुर राज्य पर अधिकार करने के प्रयास किए तथा इसके लिए उसने आपाजी सिंधिया को आमंत्रित किया।
विजयसिंह की सहायता के लिए बीकानेर के महाराजा गजसिंह तथा किशनगढ़ के शासक बहादुरसिंह सेना सहित आये लेकिन विजयसिंह पराजित हुए।
अंत में 1756 ई. में मराठों से संधि हुई तथा जोधपुर, नागौर आदि मारवाड़ राज्य विजयसिंह को तथा सोजत, जालौर, मारोठ का क्षेत्र रामसिंह को मिला।
विजयसिंह ने वैष्णव धर्म स्वीकार किया तथा राज्य में मद्य-मांस की बिक्री पर रोक लगवा दी।
विजयसिंह के समय ढलवाये गए सिक्कों को विजयशाही सिक्के कहा गया।
1787 ई. में तुंगा के युद्ध में विजयसिंह ने जयपुर शासक प्रताप सिंह के साथ मिलकर माधवराव सिंधिया को पराजित किया।
पाटण के युद्ध (1790 ई.) में महादजी सिंधिया की सेना ने विजयसिंह की सेना को पराजित किया। यह युद्ध तंवरो की पाठण (जयपुर) नामक स्थान पर हुआ।
1790 ई. डंगा के युद्ध (मेड़ता) में महादजी सिंधिया के सेनानायक डी. बोइन ने विजयसिंह को पराजित किया।
इस युद्ध के परिणामस्वरूप सांभर की संधि हुई जिसके तहत विजयसिंह ने अजमेर शहर तथा 60 लाख रुपये मराठों काे देना स्वीकार किया।
विजयसिंह पर अपनी पासवान गुलाबराय का अत्यधिक प्रभाव था तथा समस्त शासनकार्य उसके अनुसार ही चलते थे। इस कारण वीर विनाेद के रचयिता श्यामदास ने विजयसिंह को ‘जहाँगीर का नमूना’ कहा है।
गुलाबराय ने गुलाबसागर तालाब, कुजंबिहारी का मंदिर तथा जालौर दुर्ग के महल आदि का निर्माण करवाया।
बारहठ विशनसिंह ने ‘विजय विलास’ नामक ग्रंंथ की रचना की।


महाराजा भीमसिंह (1793-1803 ई.)

महाराजा विजयसिंह की मृत्यु के बाद भीमसिंह मारवाड़ के शासक बने।
इनका स्वभाव क्रूर तथा उग्र था तथा इन्होंने सिंहासन पर बैठते ही अपने विरोधी भाइयों की हत्या करवा दी।
भीमसिंह ने मण्डाेर के अपूर्ण अजीत सिंह के स्मारक को पूर्ण करवाया।
इनके समय भट्‌ट हरिवंश ने ‘भीम प्रबंध’ तथा कवि रामकर्ण ने ‘अलंकार समुच्चय’ की रचना की।


महाराजा मानसिंह (1803-1843 ई.)

1803 में उत्तराधिकार युद्ध के बाद मानसिंह जोधपुर सिंहासन पर बैठे। जब मानसिंह जालौर में मारवाड़ की सेना से घिरे हुए थे, तब गोरखनाथ सम्प्रदाय के गुरु आयस देवनाथ ने भविष्यवाणी की, कि मानसिंह शीघ्र ही जोधपुर के राजा बनेंगे। अतः राजा बनते ही मानसिंह ने आयस देवनाथ को जोधपुर बुलाकर अपना गुरु बनाया तथा वहां नाथ सम्प्रदाय के महामंदिर का निर्माण करवाया।
गिंगोली का युद्ध : मेवाड़ महाराणा भीमसिंह की राजकुमारी कृष्णा कुमारी के विवाह के विवाद में जयपुर राज्य की महाराजा जगतसिंह की सेना, पिंडारियों व अन्य सेनाओं ने संयुक्त रूप से जोधपुर पर मार्च, 1807 में आक्रमण कर दिया तथा अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर लिया। परन्तु शीघ्र ही मानसिंह ने पुनः सभी इलाकों पर अपना कब्जा कर लिया।
सन् 1817 ई. में मानसिंह को शासन का कार्यभार अपने पुत्र छत्रसिंह को सौंपना पड़ा। परन्तु छत्रसिंह की जल्दी ही मृत्यु हो गई। सन् 1818 में 16, जनवरी को मारवाड़ ने अंग्रेजों से संधि कर मारवाड़ की सुरक्षा का भार ईस्ट इंडिया कम्पनी को सौंप दिया।


महाराजा तख्तसिंह (1843-1873 ई.) :-

महाराजा मानसिंह के बाद तख्तसिंह जोधपुर के शासक बने।
तख्तसिंह के समय ही 1857 का विद्रोह हुआ जिसमें तख्तसिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया।
तख्तसिंह ने ओनाड़सिंह तथा राजमल लोढ़ा के नेतृत्व में आउवा सेना भेजी। आउवा के निकट बिथौड़ा नामक स्थान पर 8 सितम्बर, 1857 को युद्ध हुआ जिसमें जोधपुर की सेना की पराजय हुई।
तख्तसिंह ने राजपूत जाति में होने वाले कन्यावध को रोकने के लिए कठोर आज्ञाएं प्रसारित की तथा इनको पत्थरों पर खुदवाकर किलों के द्वारों पर लगवाया।
1870 ई. में अंग्रेजी सरकार ने जोधपुर राज्य के साथ नमक की संधि सम्पन्न की।
तख्तसिंह ने अजमेर में मेयो कॉलेज की स्थापना के लिए एक लाख रुपये का चंदा दिया।
तख्तसिंह ने जोधपुर दुर्ग में चामुंडा मंदिर का निर्माण करवाया।


महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय (1873-1895 ई.) :-

महाराजा तख्तसिंह के बाद जसवंत सिंह द्वितीय जोधपुर के शासक बने।
इन्होंने 1892 ई. में जोधपुर में जसवंत सागर का निर्माण करवाया।
जसवंत सिंह द्वितीय पर नन्ही जान नामक महिला का अत्यधिक प्रभाव था। इस समय स्वामी दयानंद सरस्वती जोधपुर आये थे। एक दिन स्वामी जी ने जसवंत सिंह द्वितीय को नन्ही जान की पालकी को अपने कंधे पर उठाये देखा जिससे स्वामीजी नाराज हुए तथा जसवंत सिंह द्वितीय को धिक्कारा।
इससे नाराज होकर नन्ही जान ने महाराजा के रसोइये गौड मिश्रा के साथ मिलकर दयानंद सरस्वती को विष दे दिया।
इसके बाद स्वामीजी अजमेर आ गए जहाँ 30 अक्टूबर, 1883 को उनकी मृत्यु हो गई।
1873 ई. में जसवंतसिंह द्वितीय ने राज्य प्रबंध तथा प्रजाहित के लिए ‘महकमा खास’ की स्थापना की।
1882 ई. में इन्होंने ‘काेर्ट – सरदारन’ नामक न्यायालय की स्थापना की।
महारानी विक्टोरिया के शासन के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में जसवंत सिंह द्वितीय के प्रधानमंत्री प्रतापसिंह ने जोधपुर में जुबली कोर्ट परिसर का निर्माण करवाया।
जसवंत सिंह द्वितीय के समय बारहठ मुरारीदान ने ‘यशवंत यशोभूषण’ नामक ग्रंथ की रचना की।


महाराजा सरदारसिंह (1895-1911 ई.)

1895 ई. में सरदारसिंह जोधपुर के शासक बने।
चीन के बाॅक्सर युद्ध में सरदारसिंह ने अपनी सेना चीन भेजी तथा इस कार्य के लिए जोधपुर को अपने झंडे पर ‘चाइना-1900’ लिखने का सम्मान प्रदान किया गया।
1910 ई. में सरदारसिंह ने ‘एडवर्ड-रिलीफ फण्ड’ स्थापित किया जिसमें असमर्थ लोगों के लिए पेंशन का प्रबंध किया गया।
इन्होंने देवकुंड के तट पर अपने पिता जसवंत सिंह द्वितीय के स्मारक ‘जसवंत थड़ा’ का निर्माण करवाया।
इसी देवकुंड के तट पर जसवंत सिंह II तथा उनके बाद के नरेशों की अत्येष्टि यहाँ की जाने लगी।
इनके शासनकाल में सरदार समंद तथा हेमावास बांध के निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ।
1910 में इनके समय डिंगल भाषा की कविताओं आदि का संग्रहण करने हेतु ‘बौद्धिक रिसर्च कमेटी’ की स्थापना की गई।
सरदारसिंह घुड़दौड़, शिकार तथा पोलो खेलने के शौकीन थे। इनके शौक के कारण उस समय जोधपुर को ‘पोलो का घर’ कहा जाता था।


महाराजा सुमेरसिंह (1911-1918 ई.)

सरदारसिंह के देहांत के बाद सुमेरसिंह जोधपुर के शासक बने।
इनकी आयु कम होने के कारण शासन प्रबंध के लिए रीजेंसी काउंसिल की स्थापना की गई तथा प्रतापसिंह को इसका रीजेंट बनाया गया।
1912 ई. में जोधपुर में ‘चीफ कोर्ट’ की स्थापना हुई।
प्रथम विश्वयुद्ध के समय महाराजा सुमेरसिंह तथा प्रतापसिंह अपनी सेना सहित अंग्रेजों की सहायता के लिए लंदन पहुँचे तथा फ्रांस के मोर्चो पर भी युद्ध करने पहुँचे।
सुमेरसिंह के समय ‘सुमेर कैमल कोर’ की स्थापना की गई।
जोधपुर के अजायबघर का नाम महाराजा सरदारसिंह के नाम पर ‘सरदार म्यूजियम’ रखा गया।


महाराजा उम्मेद सिंह (1918-1947 ई.) :-

महाराजा सुमेरसिंह के देहांत के पश्चात उनके छोटे भाई उम्मेदसिंह जोधपुर के शासक बने।
इस समय उम्मेदसिंह को शासनाधिकार तो दिए गए लेकिन वास्तविक शक्तियां ब्रिटिश सरकार के अधीन थी।
मारवाड़ के तत्कालीन चीफ मिनिस्टर सर डोनाल्ड फील्ड को ‘डीफैक्टो रूलर ऑफ जोधपुर स्टेट’ कहा जाता था।
1923 में उम्मेदसिंह के राज्याभिषेक के समय भारत के वायसराय लॉर्ड रीडिंग जोधपुर आये थे।
महाराजा उम्मेदसिंह ने ‘उम्मेद भवन पैलेस’ (1929-1942 ई.) का निर्माण करवाया जो ‘छीतर पैलेस’ के नाम से भी जाना जाता है। इस पैलेस के वास्तुविद विद्याधर भट्टाचार्य तथा सैमुअल स्विंटन जैकब थे तथा यह ‘इंडो-कोलोनियल’ कला में निर्मित है।
उम्मेदसिंह ने 24 जुलाई, 1945 को जोधपुर में विधानसभा के गठन की घोषणा की।


महाराजा हनुवंत सिंह (जून, 1947- मार्च, 1949)

महाराजा उम्मेदसिंह के देहांत के बाद हनुवंत सिंह शासक बने।
हनुवंत सिंह जोधपुर राज्य को पाकिस्तान में शामिल करने के इच्छुक थे तथा ये मुहम्मद अली जिन्ना से मिलने पाकिस्तान भी गये।
वी.पी. मेनन तथा वल्लभ भाई पटेल के समझाने पर हनुवंत सिंह भारतीय संघ में शामिल होने के लिए तैयार हुए।
30 मार्च, 1949 को जोधपुर का संयुक्त राजस्थान में विलय कर दिया गया ।


{2 } बीकानेर के राठौड़ (bikaner ka rathore vansh)

राव बीका (1465-1504 ई.)

बीकानेर के राठौड़ वंश का संस्थापक राव जोधा का पुत्र राव बीका था।
राव बीका ने करणी माता के आशीर्वाद से 1465 ई. में जांगल प्रदेश में राठौड़ वंश की स्थापना की तथा सन् 1488 ई. में नेरा जाट के सहयोग से बीकानेर (राव बीका तथा नेरा जाट के नाम को संयुक्त कर नाम बना) नगर की स्थापना की।
राव बीका ने जोधपुर के राजा राव सुजा को पराजित कर राठौड़ वंश के सारे राजकीय चिह्न छीनकर बीकानेर ले गये।
राव बीका की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र ‘नरा‘ बीकानेर का शासक बना।


राव लूणकरण (1504-1526 ई.)

अपने बड़े भाई राव नरा की मृत्यु हो जाने के कारण राव लूणकरण राजा बना।
राव लूणकरण बीकानेर का दानी, धार्मिक, प्रजापालक व गुणीजनों का सम्मान करने वाला शासक था। दानशीलता के कारण बीठू सूजा ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ राव जैतसी रो छन्द में इसे ‘कर्ण‘ अथवा ‘कलियुग का कर्ण‘ कहा है।
सन् 1526 ई. में इसने नारनौल के नवाब पर आक्रमण कर दिया परन्तु धौंसा नामक स्थान पर हुए युद्ध में लूणकरण वीरगति को प्राप्त हुआ।
‘कर्मचन्द्रवंशोंत्कीकर्तनंक काव्यम्‘ में लूणकरण की दानशीलता की तुलना कर्ण से की गई है।


राव जैतसी (1526-1541 ई.)

बाबर के उत्तराधिकारी कामरान ने 1534 ई. में भटनेर पर अधिकार करके राव जैतसी को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए कहा परन्तु जैतसी ने अपनी बड़ी सेना के साथ 26 अक्टूबर, 1534 को अचानक कामरान पर आक्रमण कर दिया और उन्हें गढ़ छोड़ने के लिए बाध्य किया।
बीकानेर का शासक राव जैतसी मालदेव (मारवाड़) के साथ पहोबा के युद्ध (1541 ई.) में वीरगति को प्राप्त, इस युद्ध का वर्णन बीठू सूजा के प्रसिद्ध ग्रन्थ राव जैतसी रो छन्द में मिलता है।


राव कल्याणमल (1544-1574 ई.)

राव कल्याणमल, राव जैतसी का पुत्र था जो जैतसी की मृत्यु के समय सिरसा में था।
1544 ई. में गिरी सुमेल के युद्ध में शेरशाह सूरी ने मारवाड़ के राव मालदेव को पराजित किया, इस युद्ध में कल्याणमल ने शेरशाह की सहायता की थी तथा शेरशाह ने बीकानेर का राज्य राव कल्याणमल को दे दिया।
कल्याणमल ने नागौर दरबार (1570 ई.) मे अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।
अकबर ने नागौर के दरबार के बाद सन् 1572 ई. में कल्याणमल के पुत्र रायसिंह को जोधपुर की देखरेख हेतु उसे प्रतिनिधि बनाकर जोधपुर भेज दिया।
कवि पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) कल्याणमल का ही पुत्र था।
पृथ्वीराज राठौड़ की प्रसिद्ध रचना ‘बेलि क्रिसन रूकमणी री’ है, कवि दुरसा आढ़ा ने इस रचना को पाँचवा वेद एवं 19वाँ पुराण कहा है। इटालियन कवि डॉ. तेस्सितोरी ने कवि पृथ्वीराज राठौड़ को ‘डिंगल का होरेस’ कहा है।
अकबर ने कवि पृथ्वीराज राठौड़ को गागरोन का किला जागीर में दिया था।


महाराजा रायसिंह (1574-1612 ई.)

कल्याणमल का उत्तराधिकारी रायसिंह बना जिसे दानशीलता के कारण प्रसिद्ध इतिहासकार मुंशी देवीप्रसाद ने ‘राजपूताने का कर्ण‘ कहा है।
अकबर ने इसे महाराजा की पदवी प्रदान की।
बीकानेर का शासक बनते ही रायसिंह ने ‘महाराजाधिराज‘ और महाराजा की उपाधियाँ धारण की। बीकानेर के राठौड़ नरेशों में रायसिंह पहला नरेश था जिसने इस प्रकार की उपाधियाँ धारण की थी।
मुगल बादशाह अकबर ने रायसिंह को सर्वप्रथम जोधपुर का अधिकारी नियुक्त किया था।
रायसिंह ने अपने मंत्री कर्मचन्द की देखरेख में राव बीका द्वारा बनवाये गये पुराने (जूना) किले पर ही नये किले जूनागढ़ का निर्माण सन् 1594 में करवाया। किले के अन्दर रायसिंह ने एक प्रशस्ति भी लिखवाई जिसे अब ‘रायसिंह प्रशस्ति‘ कहते हैं। किले के मुख्य प्रवेश द्वार सूरजपोल के बाहर जयमल-पत्ता की हाथी पर सवार पाषाण मूर्तियाँ रायसिंह ने ही स्थापित करवाई। इस दुर्ग में राजस्थान की सबसे पहली लिफ्ट स्थित है।
रायसिंह द्वारा सिरोही के देवड़ा सुरताण व जालौर के ताज खाँ को भी पराजित किया।
रायसिंह ने ‘रायसिंह महोत्सव’ व ‘ज्योतिष रत्नमाला’ ग्रन्थ की रचना की।
‘कर्मचन्द्रवंशोकीर्तनकंकाव्यम’ में महाराजा रायसिंह को राजेन्द्र कहा गया है तथा लिखा गया है कि वह हारे हुए शत्रुओं के साथ बड़े सम्मान का व्यवहार करता था।
इसके समय मंत्री कर्मचन्द ने उसके पुत्र दलपत सिंह को गद्दी पर बिठाने का षड़यंत्र किया तो रायसिंह ने ठाकुर मालदे को कर्मचन्द को मारने के लिए नियुक्त किया परन्तु वह अकबर के पास चला गया।


महाराजा दलपत सिंह (1612-13 ई.) :-

महाराजा रायसिंह अपने ज्येष्ठ पुत्र दलपत सिंह के बजाय सूरसिंह को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे परन्तु जहाँगीर ने दलपतसिंह को बीकानेर का शासक घोषित कर दिया।
दलपत सिंह का आचरण साम्राज्य विरोधी होने के कारण जहाँगीर ने इन्हें मृत्युदण्ड दिया तथा सूरसिंह को टीका भेजकर बीकानेर का शासक घोषित किया।


महाराजा सूरसिंह (1613-1631 ई.) :-

दलपत सिंह के बाद उनके भाई सूरसिंह बीकानेर के शासक बने।
जब खुर्रम ने विद्रोह किया तब जहाँगीर ने उसके विरूद्ध सूरसिंह को भेजा जिसमें इन्हें सफलता मिली।
इन्होंने जहाँगीर तथा शाहजहाँ के समय मुगलों को अपनी सेवाएं प्रदान की।


महाराजा कर्णसिंह (1631-1669 ई.)

सूरसिंह के पुत्र कर्णसिंह को औरंगजेब ने जांगलधर बादशाह की उपाधि प्रदान की।
कर्णसिंह ने विद्वानों के सहयोग से साहित्यकल्पदुम ग्रन्थ की रचना की।
1644 ई. में बीकानेर के कर्णसिंह व नागौर के अमरसिंह राठौड़ के बीच ‘मतीरा री राड़‘ नामक युद्ध हुआ।
इसके आश्रित विद्वान गंगानन्द मैथिल ने कर्णभूषण एवं काव्यडाकिनी नामक ग्रन्थों की रचना की।


महाराजा अनूपसिंह (1669-1698 ई.)

महाराजा अनूपसिंह द्वारा दक्षिण में मराठों के विरूद्ध की गई कार्यवाहियों से प्रसन्न होकर औरंगजेब ने इन्हें ‘महाराजा‘ एवं ‘माही भरातिव‘ की उपाधि से सम्मानित किया।
महाराज अनूपसिंह एक प्रकाण्ड विद्वान, कूटनीतिज्ञ, विद्यानुरागी एवं संगीत प्रेमी थे। इन्होंने अनेक संस्कृत ग्रन्थों – अनूपविवेक, काम-प्रबोध, अनूपोदय आदि की रचना की। इनके दरबारी विद्वानों ने अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की थी। इनमें मणिराम कृत ‘अनूप व्यवहार सागर‘ एवं ‘अनूपविलास‘, अनंन भट्ट कृत ‘तीर्थ रत्नाकर‘ तथा संगीताचार्य भावभट्ट द्वारा रचित ‘संगीत अनूपाकुंश‘, ‘अनूप संगीत विलास‘, ‘अनूप संगीत रत्नाकर‘ आदि प्रमुख हैं। उसने दक्षिण भारत से अनेकानेक ग्रन्थ लाकर अपने पुस्तकालय में सुरक्षित किये। अनूप पुस्तकालय में वर्तमान में बड़ी संख्या में ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण ग्रन्थों का संग्रह मौजूद है। दयालदास की ‘बीकानेर रा राठौड़ां री ख्यात‘ में जोधपुर व बीकानेर के राठौड़ वंश का वर्णन है।
अनूपसिंह द्वारा दक्षिण में रहते हुए अनेक मूर्तियाँ का संग्रह किया व नष्ट होने से बचाया। यह मूर्तियों का संग्रह बीकानेर के पास ‘तैंतीस करोड़ देवताओं के मंदिर‘ में सुरक्षित है।
महाराजा सूरजसिंह

16 अप्रेल, 1805 को मंगलवार के दिन भाटियों को हराकर इन्होंने भटनेर को बीकानेर राज्य में मिला लिया तथा भटनेर का नाम हनुमानगढ़ रख दिया (क्योंकि इन्होंने हनुमानजी के वार मंगलवार को यह जीत हासिल की थी)।


महाराजा स्वरूपसिंह (1698-1700 ई.)

अनूपसिंह की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र स्वरूपसिंह नौ वर्ष की आयु में बीकानेर के शासक बने।
स्वरूपसिंह औरगांबाद तथा बुरहानपुर में नियुक्त थे तब राजकार्य उनकी माता सिसोदणी संभालती थी।


महाराजा सुजानसिंह (1700-1735 ई.)

महाराजा स्वरूपसिंह के बाद सुजानसिंह बीकानेर के शासक बने।
इन्होंने मुगलों की सेवा दक्षिण में रहकर की। इस समय जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह ने बीकानेर पर आक्रमण किया लेकिन ठाकुर पृथ्वीराज तथा हिन्दूसिंह (तेजसिंह) ने इसका डटकर सामना किया जिस कारण जोधपुर की सेना को वापस लौटना पड़ा।
मथेरण जोगीदास ने वरसलपुर विजय (महाराजा सुजानसिंह रो रासो) नामक ग्रंथ की रचना की।


महाराजा जोरावर सिंह (1736-1746 ई.)

मंुशी देवी प्रसाद के अनुसार जोरावर सिंह संस्कृत भाषा के अच्छे कवि थे तथा इनके दाे ग्रंथ वैद्यकसागर तथा पूजा पद्धति बीकानेर के पुस्तकालय में है।
इनकी माता सीसोदिणी ने बीकानेर में चतुर्भुज मंदिर का निर्माण करवाया।


महाराजा गजसिंह (1746-1787 ई.)

इनके शासनकाल में बीदासर के नजदीक दड़ीबा गाँव में तांबे की खान का पता चला।
1757 ई. में गजसिंह ने नौहरगढ़ की नींव रखी।
बादशाह अहमदशाह ने इन्हें ‘माहीमरातिब’ की उपाधि प्रदान की।
चारण गाडण गोपीनाथ ने गजसिंह की प्रशंसा में ‘महाराज गजसिंह रौ रूपक’ नामक ग्रंथ की रचना की। इसके अतिरिक्त सिंढायच फतेराम ने ‘महाराज गजसिंह रौ रूपक’ तथा ‘महाराज गजसिंह रा गीतकवित दूहा’ नामक ग्रंथ की रचना की।
इनके बाद महाराजा राजसिंह बीकानेर के शासक बने। इनकी मृत्यु पर इनके सेवक मंडलावत संग्राम सिंह ने इनकी चिता में प्रवेश करके अपने प्राणों का त्याग किया।
राजसिंह के बाद प्रतापसिंह बीकानेर के शासक बने लेकिन इनका शासनकाल बहुत कम समय तक रहा।


महाराजा सूरतसिंह (1787-1828 ई.)

सूरतसिंह ने 1799 ई. में सूरतगढ़ का निर्माण करवाया।
इनके समय जॉर्ज टॉमस ने बीकानेर पर आक्रमण किया लेकिन दोनों पक्षों के बीच समझौता होने से यह युद्ध बंद हो गया।
1805 ई. में अमरचंद सुराणा के नेतृत्व में इनका भटनेर पर अधिकार हुआ तथा मंगलवार के दिन अधिकार होने के कारण इसका नाम हनुमानगढ़ रखा गया।
1807 ई. के गिंगोली के युद्ध में महाराजा सूरतसिंह ने जयपुर की सेना का साथ दिया था।
अंग्रेजों के साथ 1818 ई. की सहायक संधि महाराजा सूरतसिंह के समय इनकी ओर से ओझा काशीनाथ ने सम्पन्न की।


महाराजा रतनसिंह (1828-1851 ई.)

महाराजा सूरतसिंह के बाद इनके ज्येष्ठ पुत्र रतनसिंह बीकानेर के शासक बने।
1829 ई. में बीकानेर व जैसलमेर के मध्य वासणपी का युद्ध हुआ जिसमें बीकानेर राज्य की पराजय हुई। इस युद्ध में अंग्रेजों ने मेवाड़ के महाराणा जवानसिंह को मध्यस्थ बनाकर दोनों पक्षों में समझौता करवाया।
बादशाह अकबर द्वितीय ने रतनसिंह को ‘माहीमरातिब’ का खिताब प्रदान किया।
रतनसिंह ने राजपूत कन्याओं को न मारने के संबंध में नियम बनाये।
रतनसिंह ने राजरतन बिहारी का मंदिर बनवाया।
बीठू भोमा ने रतनविलास तथा सागरदान करणीदानोत ने रतनरूपक नामक ग्रंथ की रचना की।


महाराजा सरदारसिंह (1851-1872 ई.)

इनके समय राजस्थान में 1857 की क्रांति हुई जिसमें सरदारसिंह ने अंग्रेजों की सहायता की तथा अपनी सेना सहित विद्रोह के स्थानों पर पहुँचकर विद्रोहियों का दमन किया।
यह राजस्थान के एकमात्र शासक थे जिन्होंने राजस्थान से बाहर (पंजाब) जाकर विद्रोहियों का दमन किया।
1854 ई. में सरदारसिंह ने सतीप्रथा तथा जीवित समाधि प्रथा पर रोक लगवायी।
सरदारसिंह ने जनहित के लिए अनेक कानूनों का निर्माण करवाया तथा महाजनों से लिया जाने वाला बाछ कर माफ कर दिया।
सरदारसिंह ने अपने सिक्कों से मुगल बादशाह का नाम हटाकर महारानी विक्टोरिया का नाम अंकित करवाया।


महाराजा डूंगरसिंह (1872-1887 ई.)

महाराजा सरदारसिंह के कोई पुत्र नहीं होने के कारण कुछ समय तक शासन कार्य कप्तान बर्टन की अध्यक्षता वाली समिति ने किया।
वायसराय लॉर्ड नॉर्थब्रुक की स्वीकृति से कप्तान बर्टन ने डूंगरसिंह को बीकानेर का शासक बनाया।
डूंगरसिंह ने अंग्रेजों व अफगानिस्तान के मध्य हुए युद्ध में अंग्रेजों की सहायता की।
इन्होंने अंग्रेजों के साथ नमक समझौता किया।
डूंगरसिंह ने बीकानेर किले का जीर्णोद्वार करवाया तथा इसमें सुनहरी बुर्ज, गणपति निवास, लाल निवास, गंगा निवास आदि महल बनवाये।


महाराजा गंगासिंह (1887-1943 ई.)

महाराजा डूंगरसिंह के बाद गंगासिंह बीकानेर के शासक बने।
गंगासिंह की शिक्षा अजमेर के मेयो कॉलेज से सम्पन्न हुई। इनके लिए पंडित रामचंद्र दुबे को शिक्षक नियुक्त किया गया।
गंगासिंह ने देवली की छावनी से सैनिक शिक्षा भी प्राप्त की।
इनके समय अंग्रेजों की सहायता से ‘कैमल कोर’ का गठन किया गया जो ‘गंगा िरसाला’ के नाम से भी जानी जाती थी।
इनके समय विक्रम संवत 1956 (1899-1900 ई.) में भीषण अकाल पड़ा जिसे छप्पनिया अकाल भी कहते हैं। इस समय गंगासिंह ने कई अकाल राहत कार्य करवाये तथा गजनेर झील खुदवाई गई।
1900 ई. में गंगासिंह गंगा रिसाला के साथ चीन के बॉक्सर युद्ध में सम्मिलित हुए।
गंगासिंह ने महारानी विक्टाेरिया की स्मृति में बीकानेर में विक्टोरिया मेमोरियल का निर्माण करवाया।
अंग्रेजों ने डूंगरसिंह के समय की गई नमक संधि को रद्द करके गंगासिंह के साथ नई नमक संधि सम्पन्न की।
1913 में गंगासिंह ने बीकानेर में प्रजा प्रतिनिधि सभा की स्थापना की।
गंगासिंह ने प्रथम विश्वयुद्ध में भाग लिया तथा युद्ध के बाद सम्पन्न वर्साय की शांति संधि पर हस्ताक्षर किए।
गंगासिंह ने लंदन से भारत लौटते समय रोम में एक नोट लिखा जो ‘रोम नोट’ के नाम से प्रसिद्ध है।
1921 में भारतीय राजाओं को साम्राज्य का भागीदार बनाने के लिए नरेन्द्र मंडल की स्थापना की गई जिसमें गंगासिंह को प्रथम चांसलर बनाया गया तथा वे इस पद पर 1921 से 1925 तक रहे।
गंगासिंह ने बटलर समिति से यह मांग की कि उनके संबंध भारतीय सरकार से न मानकर इंग्लैण्ड के साथ माने जाए।
गंगासिंह ने 1927 में गंगनहर का निर्माण करवाया। गंगासिंह को राजपूताने का भागीरथ तथा आधुनिक भारत का भागीरथ कहा जाता है।
गंगासिंह को आधुनिक बीकानेर का निर्माता कहा जाता है।
गंगासिंह ने अपने पिता की स्मृति में लालगढ़ पैलेस का निर्माण करवाया। यह महल लाल पत्थर से बना है।
गंगासिंह ने रामदेवरा स्थित रामदेवजी के मंदिर का निर्माण करवाया।


महाराजा शार्दुल सिंह (1943-1949 ई.)

महाराजा गंगासिंह के बाद शार्दुलसिंह बीकानेर के शासक बने।
ये बीकानेर रियासत के अंतिम शासक थे।
इन्होंने 7 अगस्त, 1947 को ‘इस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर किए।
इनके समय बीकानेर रियासत का 30 मार्च, 1949 को संयुक्त राजस्थान में विलय कर दिया गया।
अन्य तथ्य

1818 ई. में बीकानेर के राजा सूरजसिंह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से सुरक्षा संधि कर ली और बीकानेर में शांति व्यवस्था कायम करने में लग गये।
1834 ई. में जैसलमेर व बीकानेर की सेनाओं की बीच बासणी की लड़ाई हुई।
राजस्थान के दो राज्यों के बीच हुई यह अंतिम लड़ाई थी।
1848 ई. में बीकानेर नरेश रतनसिंह ने मुल्तान के दीवान मूलराज के बागी होने पर उसके दमन में अंग्रेजों की सहायता की।
1857 ई. की क्रान्ति के समय बीकानेर के महाराजा सरदार सिंह थे जो अंग्रेजों के पक्ष में क्रान्तिकारियों का दमन करने के लिए राजस्थान के बाहर पंजाब तक गये।
बीकानेर के लालसिंह ऐसे व्यक्ति हुए जो स्वयं कभी राजा नहीं बने परन्तु जिसके दो पुत्र-डूंगरसिंह व गंगासिंह राजा बने।
बीकानेर के राजा डूंगरसिंह के समय 1886 को राजस्थान में सर्वप्रथम बीकानेर रियासत में बिजली का शुभारम्भ हुआ।
1927 ई. में बीकानेर के महाराज गंगासिंह (आधुनिक भारत का भगीरथ) राजस्थान में गंगनहर लेकर आये जिसका उद्घाटन वायसराय लॉर्ड इरविन ने किया।
गंगासिंह अपनी विख्यात गंगा रिसाला सेना के साथ द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों के पक्ष में युद्ध लड़ने के लिये ब्रिटेन गये।
बीकानेर रियासत के अंतिम राजा सार्दूलसिंह थे।


(3) किशनगढ़ के राठौड़ ( kishangadh ka rathore vansh)

किशनगढ़ में राठौड़ वंश की स्थापना जोधपुर शासक मोटराजा उदयसिंह के पुत्र किशनसिंह ने 1609 ई. में की।
इन्होंने सेठोलाव के शासक राव दूदा को पराजित कर यहाँ अपनी स्वतंत्र जागीर की स्थापना की।
मुगल शासक जहाँगीर ने इन्हें महाराजा की उपाधि प्रदान की।
1612 ई. में किशनसिंह ने किशनगढ़ नगर बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया।
किशनसिंह की हत्या जोधपुर महाराजा सूरसिंह के पुत्र गजसिंह ने की।
किशनसिंह की छतरी अजमेर में घूघरा घाटी में स्थित है।
किशनसिंह के बाद सहलमल तथा इनके बाद जगमाल सिंह किशनगढ़ के शासक बने।

महाराजा स्वरूप सिंह

स्वरूपसिंह ने रूपनगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया।
इन्होंने बदख्शां में पठानों द्वारा किए गए विद्रोह को दबाया।
स्वरूपसिंह सामूगढ़ के युद्ध (1658 ई.) में औरगंजेब के विरूद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।


महाराजा मानसिंह

महाराजा स्वरूपसिंह के बाद मानसिंह किशनगढ़ के शासक बने।
इनकी बहन चारूमति का विवाह मुगल शासक औरगंजेब से तय हुआ था लेकिन मेवाड़ महाराणा राजसिंह ने चारूमति से विवाह कर लिया।

महाराजा राजसिंह

मानसिंह के बाद राजसिंह किशनगढ़ के शासक बने।
राजसिंह ने बाहुविलास तथा रसपाय नामक ग्रंथ लिखे तथा इनके काव्य गुरु महाकवि वृंद थे।
किशनगढ़ चित्रकला शैली के विकास में इनका विशेष योगदान रहा।


महाराजा सावंतसिंह

सावंतसिंह का राज्याभिषेक दिल्ली में सम्पन्न हुआ।
ये किशनगढ़ के प्रसिद्ध शासक हुए जिन्होंने कृष्णभक्ति में राज-पाट त्याग दिया तथा वृंदावन चले गये।
इन्होंने अपना नाम नागरीदास रख दिया।
इनकी प्रेयसी का नाम ‘बणी-ठणी’ था।
चित्रकार मोरध्वज निहालचंद ने ‘बणी-ठणी’ का चित्र बनाया जिसे भारत की मोनालिसा कहा जाता है।
सावंतसिंह के काल को किशनगढ़ चित्रशैली के विकास का स्वर्णकाल कहा जाता है।
महाराजा सावंत सिंह ने मनोरथ मंजरी, रसिक रत्नावली, बिहारी चंद्रिका तथा देहदशा आदि ग्रंथों की रचना की।
यहाँ के शासक सरदार सिंह के समय किशनगढ़ राज्य के दो हिस्से किए गए जिसमें रूपनगढ़ क्षेत्र सरदारसिंह को तथा किशनगढ़ क्षेत्र बहादुरसिंह को दिया गया।


महाराजा बिड़दसिंह

बहादूरसिंह के निधन के बाद बिड़दसिंह किशनगढ़ के शासक बने।
इनके समय किशनगढ़ तथा रूपनगढ़ को पुन: एकीकृत कर एक रियासत बनाया गया।


महाराजा कल्याणसिंह

कल्याणसिंह ने 1817 ई. में अंग्रेजों के साथ सहायक संधि सम्पन्न की।
अंग्रेजों ने किशनगढ़ से खिराज नहीं लेना स्वीकार किया।
कल्याणसिंह ने अपने पुत्र मौखम सिंह को राजकार्य सौंपकर स्वयं मुगल बादशाह की सेवा में दिल्ली चले गये।

महाराजा पृथ्वीसिंह

महाराजा मौखम सिंह के बाद पृथ्वीसिंह शासक बने।
इनके समय किशनगढ़ राज्य का पहला दीवान अभयसिंह को बनाया गया।
1857 के संग्राम के समय किशनगढ़ के शासक पृथ्वीसिंह थे।

महाराजा शार्दूलसिंह

महाराजा पृथ्वीसिंह के बाद उनके पुत्र शार्दुलसिंह किशनगढ़ के शासक बने।
इन्होंने अपने पुत्र मदनसिंह के नाम पर मदनगंज मण्डी की स्थापना की।
पृथ्वीसिंह के बाद मदनसिंह शासक बने जिन्होंने किशनगढ़ राज्य में फाँसी की सजा को समाप्त कर दिया।


महाराजा सुमेरसिंह

सुमेरसिंह वर्ष 1939 में किशनगढ़ राज्य के शासक बने।
सुमेरसिंह को आधुनिक साइकिल पोलो का पिता कहा जाता था।
25 मार्च,1948 को द्वितीय चरण में किशनगढ़ का विलय राजस्थान संघ में कर दिया गया।

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Daily Current Affair Questions 10 जुलाई 2020

Daily Current Affair Questions

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1.किस देश ने बलि दिए जाने वाले पशुओं के लिए डिजिटल हाट प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है ?

A भारत

B  नेपाल 

C पाकिस्तान 

D बांग्लादेश 

ANS – बांग्लादेश 

2.गेटिंग कॉन्पिटिटिव प्रैक्टिशनर गाइड फॉर इंडिया पुस्तक किसने लिखी है?

A चेतन भगत 

B आरसी भार्गव

C  केएल मुथैया

D  कृष्णस्वामी अय्यर 

ANS – आरसी भार्गव

3.क्लाइमेट एक्शन पर वर्चुअल मिनिस्ट्रियल बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व किसने किया है?

A नरेंद्र मोदी 

B प्रकाश जावड़ेकर

C रमेश पोखरियाल निशंक

D  अंजना ओम कश्यप 

ANS – प्रकाश जावड़ेकर

4.किस देश ने आधिकारिक रूप से डब्ल्यूएचओ से अलग होने का ऐलान किया है ?

A ब्राजील 

B इंडिया 

C रशिया 

D अमेरिका

ANS – अमेरिका

5. किस बैंक ने जीवन बीमा उत्पादों की पेशकश के लिए बजाज एलियांज के साथ समझौता किया है ?

A  करूर वैश्य बैंक 

B आईसीआईसीआई बैंक 

C स्टेट बैंक ऑफ इंडिया 

D बैंक ऑफ बड़ौदा 

ANS – करूर वैश्य बैंक 

6.UNCTAD की रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 के कारण वैश्विक पर्यटन में कितने ट्रिलियन डॉलर की गिरावट आ सकती है ?

A 3.3

B  2.1

C  3.4

D  4.1

ANS  – 3.3

7. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मानवाधिकारों पर कोविड-19 के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए किसकी अध्यक्षता में समिति गठित की है ?

A केएस रेड्डी 

B डॉक्टर हर्षवर्धन 

C अरविंद केजरीवाल

D  मनीष सिसोदिया 

ANS – केएस रेड्डी 

8.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जंस्कार रेंज के नीमू का दौरा किया यह किस नदी के तट पर है ?

A व्यास

B  सतलज 

C सिंधु 

D झेलम

ANS – सिंधु 

Daily Current Affair Questions
Daily Current Affair Questions

9. किस राज्य में 5 जलापूर्ति परियोजना का उद्घाटन किया गया ?

A  मेघालय 

B मणिपुर

C  नागालैंड 

D मिजोरम

ANS – मणिपुर

10. किस राज्य में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अरियलूर मेडिकल कॉलेज की आधारशिला रखी गई ?

A  केरल

B  तमिलनाडु 

C कर्नाटक 

D आंध्र प्रदेश

ANS – तमिलनाडु 

11. रिलायंस ने असिमित मुफ्त कॉलिंग के साथ कौन सा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ऐप लॉन्च किया ?

A जिओ मीट

B  जिओ वीडियो कॉल 

C जिओ रिच

D  जिओ फेस

ANS – जिओ मीट

12. हाल ही में सुशील गॉड का निधन हुआ है वह कौन थे ?

A  टीवी अभिनेता

B  क्रिकेटर

C  फुटबॉलर

D  रिपोर्टर

ANS – टीवी अभिनेता

13. किस राज्य की गोल्डन बर्ड विंग तितली को भारत की सबसे बड़ी तितली का खिताब मिला है ?

A  मिजोरम 

B उत्तराखंड

C  मेघालय

D  गोवा

ANS – उत्तराखंड

14. एआईबीए रैंकिंग में कौन प्रथम स्थान पर रहा है  ?

A अमित पंघाल

B  विकास यादव

C केशव भारद्वाज 

D अमित सैनी 

ANS – अमित पंघाल

15.कौन सा देश चेचक से मुक्त घोषित किया गया है  ?

A मालदीव 

B श्रीलंका 

C  दोनों 

D इनमें से कोई नहीं

ANS – दोनों

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Daily Current Affair Questions 9 जुलाई 2020

Daily Current Affair Questions

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1.भारत ने किस देश में संस्कृत विश्वविद्यालय का निर्माण किया है ?

A नेपाल 

B भूटान 

C इंडोनेशिया

D  मॉरीशस

ANS – नेपाल 

2.ओ एल ए अपने ग्राहकों को डिजिटल पेमेंट का विकल्प देने के लिए किसके साथ समझौता किया है ?

A  गूगल पे 

B पेटीएम

C  फोन पे 

D भीम एप 

ANS – फोन पे

3.किस  के नाम पर आईएआरआई झारखंड की बिल्डिंग का नाम रखा गया है ?

A  नरेंद्र मोदी

B  श्यामा प्रसाद मुखर्जी 

C अटल बिहारी वाजपेई

D  सावरकर 

ANS –  श्यामा प्रसाद मुखर्जी 

4.दुनिया का पहला गोल्ड प्लेटेड होटल कहां खोला गया है ?

A अमेरिका

B  चाइना

C  वियतनाम 

D कंबोडिया 

ANS – वियतनाम 

5.किस बैंक ने भविष्य बचत खाता सेवा लांच की है ?

A फिनो पेमेंट बैंक 

B आईसीआईसीआई बैंक 

C बैंक ऑफ बड़ौदा 

D पंजाब नेशनल बैंक 

ANS – फिनो पेमेंट बैंक

6.सीबीएसई ने Class 9th से 12th तक के पाठ्यक्रम में कितने प्रतिशत की कमी की है ?

A 30%

B  20%

C  50% 

D 40%

ASN – 30%

7. किस राज्य सरकार ने डॉक्यूमेंट को स्कैन करने के लिए सेल्फी स्कैन एप लॉन्च किया है ?

A पश्चिम बंगाल 

B केरल

C  कर्नाटक 

D तमिलनाडु

ANS – पश्चिम बंगाल 

8.माइक्रोसॉफ्ट ने  युवाओं को डिजिटल कौशल प्रदान करने के लिए किसके साथ समझौता किया है ?

A एनएसडीसी

B  व्हाट्सएप 

C फेसबुक

D  इंस्टाग्राम

ANS – एनएसडीसी

Daily Current Affair Questions
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9. भारत ने शैक्षिक बुनियादी ढांचे के विकास के लिए किसके साथ 5 समझौते किए हैं ?

A  पाकिस्तान

B  अफगानिस्तान

C  कजाकिस्तान

D  किर्गिस्तान 

ANS – अफगानिस्तान

10.अर्ल कैमरून का निधन हुआ है वह कौन थे ?

A टीवी एक्टर

B  रिपोर्ट 

C पॉलीटिशियन 

D सिंगर

ANS – टीवी एक्टर

11. किस राज्य के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सुरेश अमोनकर कोरोनावायरस की वजह से मृत्यु हो गई है ?

A गोवा 

B मुंबई 

C केरल 

D तमिलनाडु 

ANS – गोवा 

12.इंस्टाग्राम पर सबसे ज्यादा कमाई करने वाले सेलिब्रिटी कौन है ?

A ड्वेन जॉनसन 

B क्रिस्टीयानो रोनाल्डो 

C विराट कोहली 

D महेंद्र सिंह धोनी

ANS – ड्वेन जॉनसन 

13. एशिया के सबसे बड़े सोलर प्लांट का उद्घाटन कहां किया जाएगा ?

A मध्य प्रदेश

B  हिमाचल प्रदेश 

C उत्तर प्रदेश

D राजस्थान

ANS – मध्य प्रदेश

14. किस राज्य के देहिंग पटकाई वन्य जीव अभ्यारण को राष्ट्रीय उद्यान में अपग्रेड किया जाएगा?

A  राजस्थान 

B असम 

C मेघालय

D  मणिपुर

ANS – असम 

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gurjar pratihar vansh | गुर्जर प्रतिहार वंश

gurjar pratihar vansh

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गुर्जर प्रतिहार वंश (gurjar pratihar vansh)

प्रतिहार शब्द वास्तव में पदनाम है जिसका अर्थ द्वारपाल है।
अभिलेखिक रूप से गुर्जर जाति का उल्लेख सर्वप्रथम चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय के एहोल अभिलेख में हुआ है।
उत्तर-पश्चिम भारत में गुर्जर प्रतिहार वंश का शासन छठी से बारहवीं शताब्दी तक रहा।
इतिहासकार रमेशचन्द्र मजूमदार ने गुर्जर प्रतिहाराें को छठी से बारहवीं शताब्दी तक अरब आक्रमणकारियों के लिए बाधक का काम करने वाला बताया है।
गुर्जरात्रा (गुर्जर प्रदेश) के स्वामी होने के कारण प्रतिहारों को गुर्जर प्रतिहार कहा गया है।
नीलगुण्ड, राधनपुर, देवली तथा करहाड़ के अभिलेखों में इन्हें गुर्जर कहा गया।
मिहिरभोज के ग्वालियर अभिलेख में नागभट्‌ट को राम का प्रतिहार तथा विशुद्ध क्षत्रिय कहा गया है।
अरब यात्रियों ने इनके लिए ‘जुर्ज’ शब्द का प्रयोग किया है। अलमसूदी ने गुर्जर प्रतिहारों को ‘अल गुजर’ तथा राजा को ‘बोरा’ कहा है।
राजशेखर ने अपने ग्रंथ ‘विद्वशालभंजिका’ में प्रतिहार महेन्द्रपाल को रघुकुल तिलक (सूर्यवंशी) लिखा है।
मुहणोत नैणसी ने प्रतिहारों की 26 शाखाओं का उल्लेख किया है।
चीनी यात्री ह्ववेनसांग ने अपने ग्रंथ ‘सियूकी’ में गुर्जर राज्य को ‘कु-चे-लो’(गुर्जर)तथा इसकी राजधानी ‘पीलोमोलो’ (भीनमाल) बताया है।
कवि पम्प ने अपने ग्रंथ ‘पम्पभारत’ में कन्नौज शासक महीपाल को गुर्जर राजा बताया है।
कैनेडी ने प्रतिहारों को ईरानी मूल का बताया है।
उद्योतन सूरी ने अपने ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ में गुर्जर शब्द का प्रयोग एक जाति विशेष के रूप में किया है।
डॉ. भंडारकर ने प्रतिहाराें को विदेशी गुर्जर जाति की संतान माना है।


मण्डोर के प्रतिहार ( mandor ke gurjar pratihar vansh )

गुर्जर प्रतिहारों की 26 शाखाओं में से सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्राचीन मण्डोर के प्रतिहार थे।
मण्डोर के प्रतिहार स्वयं को ‘हरिश्चन्द्र नामक ब्राह्मण’ (राेहिलद्धि)का वंशज बताते हैं।
हरिश्चन्द्र के दो पत्नियां थी- एक ब्राह्मणी और दूसरी क्षत्राणी भद्रा।
उसकी ब्राह्मणी पत्नी से उत्पन्न संतान प्रतिहार ब्राह्मण तथा क्षत्राणी भद्रा से उत्पन्न संतान क्षत्रिय प्रतिहार कहलाये।
हरिश्चन्द्र की रानी भद्रा से चार पुत्र- भोगभट्‌ट, कदक, रज्जिल और दद्द उत्पन्न हुए।
इन चारों ने मिलकर मण्डोर को जीता तथा यहाँ गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थापना की।
मण्डोर के प्रतिहारों की वंशावली हरिश्चन्द्र के तीसरे पुत्र रज्जिल से प्रारंभ होती है।


रज्जिल :-

हरिश्चन्द्र के चार पुत्रों में से रज्जिल मण्डोर का शासक बना।


नागभट्‌ट प्रथम :-

यह रज्जिल का पौत्र था। इसने मेड़ता को अपनी राजधानी बनाया।


शीलुक :-

शीलुक ने वल्ल मण्डल के शासक भाटी देवराज को हराकर अपने राज्य की सीमा का वल्ल तक विस्तार किया।


कक्क :-

यह शीलुक का पौत्र था। इसने मुंगेर के युद्ध में पाल वंश के शासक धर्मपाल को पराजित किया।
इसके दो पुत्र थे- बाउक तथा कक्कुक।


बाउक :-

बाउक एक प्रतापी शासक था जिसने अपने शत्रु नन्दवल्लभ को मारकर भूअकूप पर अधिकार कर लिया।
इसका 837 ई. का ‘मण्डोर (जोधपुर) का शिलालेख’ प्राप्त हुआ है जिसमें बाउक ने अपने वंश का वर्णन अंकित करवाया।
बाउक ने मयूर नामक राजा को पराजित किया था।


कक्कुक :-

बाउक के बाद उसका भाई कक्कुक मण्डोर का शासक बना।
घटियाला से प्राप्त दाेनों शिलालेख कक्कुक के समय के हैं।
इसने रोहिंसकूप (घटियाला) के निकट गावों में बाजार बनवाये तथा व्यापार में वृद्धि की।
कक्कुक के द्वारा घटियाला तथा मण्डोर में जयस्तम्भ भी स्थापित करवाये गये।

कालान्तर में मण्डोर के आस-पास के क्षेत्र पर चौहानों का अधिकार हो गया लेकिन मण्डाेर प्रतिहारों की इन्दा शाखा के अधीन रहा।
इन्दा प्रतिहारों ने राठौड़ चूँड़ा के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर मण्डोर का क्षेत्र राठौड़ों को दहेज में दे दिया।
इस घटना के साथ ही मण्डोर प्रतिहारों का राजनीतिक इतिहास समाप्त हो गया।
भड़ोंच के गुर्जर प्रतिहार

दद्द प्रथम :-

भड़ोंच के गुर्जर राज्य का संस्थापक हरिश्चन्द्र का पुत्र दद्द प्रथम था।
इस शाखा के 629 ई. से 641 ई. के कुछ दानपत्र मिले हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि नान्दीपुर इन गुर्जर प्रतिहारों की राजधानी थी।
दद्द प्रथम ने नागवंशियों तथा वनवासी राजा निरिहुलक के राज्य पर अधिकार किया था।


जयभट्‌ट प्रथम :-

जयभट्‌ट प्रथम दद्द प्रथम का पुत्र था। इसकी उपाधि ‘वीतराग’ थी।
जयभट्‌ट प्रथम हर्षवर्धन के समकालीन था।
संखेड़ा दानपत्रों से उसकी विजयों के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।
उमेता, ललुआ तथा बेगुमरा शिलालेखों के अनुसार जयभट्‌ट प्रथम ने वल्मी की सेना को काठियावाड़ प्रान्त में पराजित किया था। इसने कलचुरियों को भी पराजित किया था।


दद्द द्वितीय :-

जयभट्‌ट प्रथम के बाद उसका पुत्र दद्द द्वितीय शासक बना, जिसकी उपाधि ‘महाराजा प्रशांतराग’ थी।
बड़ौदा के संखेड़ा नामक स्थान से दद्द द्वितीय के दानपत्र प्राप्त हुए हैं जिनकी भाषा संस्कृत तथा लिपि ब्राह्मी है।
दद्द द्वितीय के समय हर्षवर्धन ने वल्लभी के शासक ध्रुवसेन द्वितीय को पराजित किया।
इस समय ध्रुवसेन द्वितीय ने दद्द द्वितीय के दरबार में शरण ली, जिसके बाद दद्द द्वितीय ने हर्षवर्धन से उसका राज्य वापस दिला दिया।
इसका राज्य विस्तार उत्तर में माही से दक्षिण में कीम तक तथा पूर्व में मालवा व खानदेश से पश्चिम में समुद्र तक था।


जयभट्‌ट द्वितीय :-

दद्द द्वितीय के बाद उसका पुत्र जयभट्‌ट द्वितीय शासक बना।
यह चालुक्यों का सामन्त था।


दद्द तृतीय :-

यह जयभट्‌ट द्वितीय का पुत्र था, जिसने पंचमहाशब्द तथा बहुसहाय नामक उपाधियाँ धारण की।
इसने वल्मी के शासक शीलादित्य द्वितीय को पराजित किया था।


जयभट्‌ट चतुर्थ :-

यह इस वंश का अन्तिम शासक था।
इसने अरब आक्रमणकारियों को पराजित किया था।
इस शाखा के गुर्जर प्रतिहारों के लिए सामंत या महासामंत शब्दों का प्रयोग मिलता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि इन शासकों की स्वतंत्र सत्ता नहीं थी।


राजोगढ़ के गुर्जर प्रतिहार

अलवर के राजोगढ़ से 960 ई. का शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिससे यह प्रमाणित होता है कि यहाँ पर प्रतिहार गोत्र का गुर्जर महाराजाधिराज सावट का पुत्र मथनदेव राज्य करता था।
राजोगढ़ शिलालेख से बहलोल लोदी के समय तक बड़गूजरों का राजाेगढ़ में निवास होना सिद्ध होता है।


भीनमाल के गुर्जर (चावड़ा वंश) (mandor ke gurjar pratihar vansh)

भीनमाल का गुर्जर राज्य दक्षिण के चालुक्यों तथा हर्षवर्धन के समकालीन था।
इस चावड़ा गुर्जर राज्य की राजधानी भीनमाल थी।
641 ई. में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भीनमाल की यात्रा की थी, इसने राज्य का नाम कु-चे-लो तथा इसकी राजधानी पीलोमोलो (भीनमाल) बताया।
भीनमाल के संस्कृत विद्वान महाकवि माघ ने ‘शिशुपाल वध’ नामक ग्रंथ लिखा। माघ ने सुप्रभदेव को यहाँ का शासक बताया था।
यहाँ के ज्योतिषी ब्रह्मगुप्त ने 628 ई. में ‘ब्रहस्फुट सिद्धांत’ की रचना की। ब्रह्मगुप्त ने गणित पर खंडखाद्यक नामक ग्रंथ भीनमाल में ही लिखा था।
जालौर, उज्जैन व कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार

इन्हंे रघुवंशी प्रतिहार भी कहा जाता है। इन्होंने चावड़ों से भीनमाल का राज्य छीन लिया।


नागभट्‌ट प्रथम :-

इस गुर्जर प्रतिहार शाखा का संस्थापक नागभट्‌ट प्रथम था।
यह एक प्रतापी शासक था जिसके दरबार को ‘नागावलोक का दरबार’ कहा गया।
इसे राजा भोज की ग्वालियर प्रशस्ति में ‘नारायण’ तथा ‘मलेच्छों का नाशक’ कहा गया है।
नागभट्‌ट प्रथम ने अरब सेना को सिंधु नदी के पश्चिम में खदेड़ने का कार्य किया, जिस कारण उसे नारायण का अवतार माना गया।
नागभट्‌ट को क्षत्रिय ब्राह्मण कहा गया और इसलिए इस शाखा को रघुवंशी प्रतिहार भी कहते हैं।
नागभट्‌ट प्रथम ने उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया।
Note :- दशरथ शर्मा नागभट्‌ट की राजधानी जालौर मानते हैं।

दक्षिण में राजा दन्तिदुर्ग, उत्तर में ललितादित्य तथा उत्तर-पूर्व में यशोवर्मन आदि नागभट्‌ट के समकालीन थे।
नागभट्‌ट प्रथम को अपने समकालीन दक्षिण भारत के राष्ट्रकूटों से भी युद्ध करना पड़ा था।
नागभट्‌ट प्रथम ने भड़ोंच पर अपना अधिकार कर लिया था।


ककुस्थ :-

नागभट्‌ट प्रथम के बाद उसका भतीजा ककुस्थ शासक बना जिसे कक्कुक भी कहते हैं।
इसके समय गुर्जर राज्य की सीमाएँ यथावत बनी रही।


देवराज :-

ककुस्थ के बाद उसका भाई देवराज शासक बना।
वराह अभिलेख में इसे देवशक्ति भी कहा गया है।
यह वैष्णव धर्मावलम्बी था।


वत्सराज :-

वत्सराज को प्रतिहार वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
कन्नौज पर अधिकार करने के लिए भारतीय इतिहास में जो त्रिपक्षीय संघर्ष हुआ उसकी शुरूआत वत्सराज ने ही की थी।
इस संघर्ष में वत्सराज ने पाल शासक धर्मपाल काे पराजित किया।
राष्ट्रकूट शासक ध्रुव ने वत्सराज तथा धर्मपाल दोनों को पराजित किया था।
इसने कन्नौज के शासक इन्द्रायुध को परास्त कर अपना सामंत बना लिया था।
ग्वालियर अभिलेख से जानकारी मिलती है कि वत्सराज ने भण्डी जाति को पराजित करके उनका राज्य छीन लिया। इस जाति का उल्लेख जोधपुर अभिलेख में हुआ है।
इसके समय इनके दरबारी कवि उद्योतन सूरी ने कुवलयमाला ग्रंथ की रचना की।
वत्सराज को ‘रणहस्तिन’ भी कहा गया है।


नागभट्‌ट द्वितीय :-

वत्सराज के बाद उसका पुत्र नागभट्‌ट द्वितीय शासक बना। इसकी माता का नाम सुंदर देवी था।
नागभट्‌ट द्वितीय ने परमभट्‌टारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की थी।
नागभट्‌ट द्वितीय ने बंगाल के राजा धर्मपाल के सामंत चक्रायुद्ध को युद्ध में पराजित किया तथा कन्नौज पर अधिकार कर कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया।
नागभट्‌ट द्वितीय की विजय का उल्लेख ग्वालियर अभिलेख में मिलता है।
नागभट्‌ट द्वितीय ने पाल शासक धर्मपाल को पराजित किया था।
राष्ट्रकूट शासक गाेविन्द तृतीय ने उत्तरी-भारत पर आक्रमण कर नागभट्‌ट द्वितीय को पराजित किया। इसके बाद गोविन्द तृतीय ने धर्मपाल को भी पराजित किया।


रामभद्र :-

नागभट्‌ट द्वितीय के पश्चात उसका पुत्र रामभद्र शासक बना। इसने केवल 3 वर्ष तक शासन किया।
यह एक निर्बल शासक था जिसके समय प्रतिहार साम्राज्य में अनेक अंग स्वतंत्र हो गए।
ग्वालियर अभिलेख के अनुसार रामभद्र सूर्य भक्त था, इसने अपने पुत्र का नाम मिहिर(सूर्य) भोज रखा था।


मिहिरभोज प्रथम (836-885 ई.) :-

मिहिरभोज इस वंश का सबसे प्रतापी शासक था। इसके पिता का नाम रामभद्र तथा माता का नाम अप्पा देवी था।
ग्वालियर अभिलेख में मिहिरभोज की उपाधि ‘आदिवराह’ तथा दौलतपुर अभिलेख में उपाधि ‘प्रभास’ मिलती है।
कश्मीरी कवि कल्हण ने ‘राजतरंगिणी’ में मिहिरभोज की उपलब्धियों का वर्णन किया है।
मिहिरभोज ने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की तथा कन्नौज को अपनी स्थायी राजधानी बनाया।
मुस्लिम यात्री सुलेमान ने मिहिरभोज के समय भारत की यात्रा की तथा मिहिरभोज को इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु बताया।
मिहिरभोज के समय के ‘श्रीमदादिवराह’ अंकित चाँदी तथा तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
मिहिरभोज ने चन्देल शासक जयशक्ति को पराजित कर कालिंजर पर अधिकार किया था।


महेन्द्रपाल प्रथम :-

मिहिरभोज के पश्चात उसका पुत्र महेन्द्रपाल शासक बना।
संस्कृत का विद्वान राजशेखर इसका राजकवि था। जिसने ‘कर्पूरमंजरी’, ‘काव्यमीमांसा’, ‘विद्वशालभंजिका’, ‘बालभारत’, ‘बालरामायण’, ‘भुवनकोश’ तथा ‘हरविलास’ आदि ग्रंथों की रचना की।
राजशेखर ने महेन्द्रपाल प्रथम को रघुकुल चूड़ामणि, निर्भयराज तथा निर्भयनरेन्द्र आदि उपाधियों से संबोधित किया है।
महेन्द्रपाल प्रथम ने परमभट्‌टारक, महाराजाधिराज, परमभागवत तथा परमेश्वर आदि उपाधियां धारण की।
इसके समय प्रतिहार पाल संघर्ष चलता रहा। मगध से इसके रामगया, गुनेरिया, इटखोरी अभिलेख तथा बंगाल से पहाड़पुर अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
इतिहासकार बी.एन.पाठक ने अपने ग्रंथ ‘उत्तरी-भारत का राजनैतिक इतिहास’ में प्रतिहार राजा महेन्द्रपाल प्रथम को हिन्दू भारत का अंतिम महान ‘हिन्दू सम्राट’ स्वीकार किया है।


भोज द्वितीय :-

भोज द्वितीय का उल्लेख एशियाटिक सोसायटी ताम्रपत्र में मिलता है, जिसमें उसे महेन्द्रपाल तथा देहनागादेवी का पुत्र बताया गया है।
भोज द्वितीय ने लगभग 910 ई. से 913 ई. तक शासन किया।


महीपाल प्रथम :-

राजशेखर महीपाल प्रथम का भी राजकवि था।
राजशेखर ने महीपाल प्रथम को ‘रघुकुलमुकुटमणि’ तथा ‘आर्यावर्त का महाराजाधिराज’ कहा है।
राजशेखर ने अपने ग्रंथ ‘प्रचण्डपाण्डव’ में महीपाल की उपलब्धियों का वर्णन किया है।
मुस्लिम यात्री अलमसूदी ने महीपाल प्रथम के समय भारत की यात्रा की थी।
इसके समकालीन राष्ट्रकूट वंश का शासक इन्द्र तृतीय था, जिसने उज्जैन पर अधिकार कर लिया तथा कन्नौज को हानि पहुँचायी थी।
डाॅ. मजूमदार के अनुसार इन्द्र तृतीय के लौटने के पश्चात महीपाल प्रथम ने कन्नौज पर पुन: अधिकार कर लिया।
कहला अभिलेख के अनुसार गौरखपुर का शासक कलचुरि वंश का भीमदेव महीपाल के अधीन था।
अलमसूदी के अनुसार पंजाब व सिंध के प्रदेश महीपाल के अधीन थे।
महीपाल प्रथम के बाद महेन्द्रपाल द्वितीय, देवपाल, विनायकपाल द्वितीय तथा उसके बाद महीपाल द्वितीय शासक बने।
विजयपाल के समय यह साम्राज्य विखण्डित होने लगा तथा इनके अधीन वंशों ने अपने-अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया।


राज्यपाल :-

विजयपाल की मृत्यु के बाद उसका पुत्र राज्यपाल शासक बना।
1018 ई. में महमूद गजनवी ने राज्यपाल पर आक्रमण किया तथा कन्नौज के असंख्य मंदिरों को नष्ट कर दिया था।
महमूद गजनवी के वापस लौटते ही चन्देल वंशीय शासक विद्याधर ने राज्यपाल पर आक्रमण कर दिया क्योंकि राज्यपाल ने गजनवी से युद्ध नहीं किया था। इस युद्ध में राज्यपाल मारा गया।


त्रिलोचनपाल :-

इसके समय महमूद गजनवी ने पुन: आक्रमण किया तथा त्रिलोचनपाल को पराजित किया।
अलबरूनी के अनुसार इस समय प्रतिहारों की राजधानी कन्नौज नहीं थी बल्कि ‘बारी’ थी।


यशपाल :-

यशपाल गुर्जर प्रतिहार वंश (gurjar pratihar vansh)का अंतिम शासक था।
1093 ई. के आसपास चन्द्रदेव गहड़वाल ने प्रतिहाराें से कन्नौज छीन लिया।

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Daily Current Affair Questions 5 जुलाई 2020

Daily Current Affair Questions

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1 किस आईआईटी के शोधकर्ताओं ने कीटाणु शोधन  बॉक्स यूनीसवीर विकसित किया है  ?

A आईआईटी रुड़की 

B आईआईटी जोधपुर

C  आईआईटी कानपुर

D  आईआईटी मद्रास

ANS – आईआईटी रुड़की 

2. किसने स्वच्छ सर्वेक्षण 2021 के लिए टूल किट लॉन्च किया है?

A  रामनाथ कोविंद 

B हरदीप सिंह पुरी 

C महेंद्र सिंह धोनी 

D नरेंद्र मोदी 

ANS – हरदीप सिंह पुरी

3.आंध्र प्रदेश का नया मुख्य सूचना आयुक्त किसे नियुक्त किया गया है ?

A रमेश कुमार 

B सुरेश कुमार 

C केशव कुमार 

D बलराज कल 

ANS – रमेश कुमार 

4. ड्रग डिस्कवरी हकेथोन 2020 का शुभारंभ किसने किया है ?

A रमेश पोखरियाल निशंक

B  नितिन गडकरी 

C राज्यवर्धन सिंह राठौड़

D  राजनाथ सिंह

ANS –  रमेश पोखरियाल निशंक

5. स्मॉल फाइनेंस बैंक में वीडियो केवाईसी के माध्यम से खाता खोलने की सुविधा शुरू की है ?

A  ए यू स्मॉल बैंक 

B इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक 

C मार्ग स्मॉल फाइनेंस बैंक

D  नमो स्मॉल फाइनेंस बैंक 

ANS – इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक 

6.किस देश के बैडमिंटन खिलाड़ी लीन डैन  ने  सन्यास लिया है ?

A चाइना 

B रसिया 

C पुर्तगाल 

D ब्राजील

ANS – चाइना 

7. किस देश के राष्ट्रपति ने अगले दशक के मध्य तक सत्ता में बने रहने के लिए चुनाव जीता है ?

A  ऑस्ट्रेलिया 

B चाइना

C  रसिया 

D अमेरिका 

ANS – रसिया 

8.किसने संस्कृत में अपना पहला समाचार पत्रिका कार्यक्रम प्रसारित किया है ?

A  ऑल इंडिया रेडियो 

B डीडी भारती 

C डीडी न्यूज़

D  आज तक 

ANS –  ऑल इंडिया रेडियो 

Daily Current Affair Questions

9.केंद्र सरकार ने किस राज्य के फ़ूड  पार्को में सुधार के लिए 4000 करोड रुपए की मंजूरी दी है ?

A राजस्थान

B  उत्तर प्रदेश

C  छत्तीसगढ़

D  कर्नाटक

ANS – कर्नाटक

10. किस राज्य सरकार ने आसपास नामक हेल्पलाइन शुरू की है ?

A मध्य प्रदेश

B  राजस्थान

C  हरियाणा 

D पंजाब 

ANS – मध्य प्रदेश

11 एनएचएआई के अध्यक्ष सुखबीर सिंह संधू का कार्यकाल  कितनि  अवधि के लिए बढ़ाया गया है ?

A 1 माह

B  2 माह

C  5 माह

D  6 माह 

ANS –  6 माह 

12. दुनिया में इ  कचरे का सबसे बड़ा उत्पादक देश कौन सा है ?

A  चाइना 

B अमेरिका 

C ऑस्ट्रेलिया

D  ऑस्ट्रिया

ANS – चाइना 

13 किस राज्य सरकार  ने  कोविड-19 के इलाज के लिए चार  अस्पतालों में प्लाज्मा थेरेपी शुरू की है ?

A उड़ीसा 

B मिजोरम

C  मेघालय

D  नागालैंड 

Ans – उड़ीसा 

14.दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार वाला देश कौन बना है ?

A  चाइना

B  जापान 

C ब्राज़ील 

D भारत

Ans – भारत

15. अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस कब मनाया गया है ?

A  4 जुलाई

B  2 जुलाई 

C 5 जुलाई 

D 3 जुलाई

Ans –  4 जुलाई

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राजस्थान की प्राचीन सभ्यतायें

राजस्थान की प्राचीन सभ्यतायें

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राजस्थान के प्रमुख पुरातात्विक स्थल

पाषाणकालीन सभ्यता – दर (भरतपुर), बागोर (भीलवाड़ा), तिलवाड़ा (बाड़मेर)।
हड़प्पा सभ्यता – कालीबंगा (हनुमानगढ़), आहड़ (उदयपुर), गिलुण्ड (राजसमंद) में।
ताम्रयुगीन सभ्यता – गणेश्वर (सीकर), बालाथल (उदयपुर), नोह (भरतपुर) आदि स्थलों पर।

  1. कालीबंगा (हनुमानगढ़) – सरस्वती (दृषद्वती) नदी के तट पर (वर्तमान घग्घर नदी) विकसित।

कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ- काली चूड़ियाँ।
कालीबंगा सैन्धव सभ्यता का पाँचवा महत्वपूर्ण नगर था।
सर्वप्रथम खोज – 1951 ई. – अमलानन्द घोष द्वारा। 1961-69 ई. में – ब्रजवासी लाल व बालकृष्ण थापर द्वारा खुदाई।
सैन्धव सभ्यता से भी प्राचीन।
विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं के समकक्ष।
सैन्धव सभ्यता की तीसरी राजधानी कालीबंगा थी। (पहली-हड़प्पा, दूसरी-मोहनजोदड़ो)
यहाँ मकानों में साधारण चुल्हे के अलावा तन्दुरी चुल्हे के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं।
यहाँ से प्राप्त एक मुहर पर व्याघ्र का अंकन है जबकि सिन्धु क्षेत्र में व्याघ्र नहीं मिलता है।
राजस्थान सरकार द्वारा यहाँ से प्राप्त पुरावशेषों के संरक्षण हेतु एक संग्रहालय की स्थापना की गयी।
यहाँ परकोटे के बाहर एक जुते हुए खेत के अवशेष मिले हैं, जो विश्व में जुते हुए खेत का पहला प्रमाण है।
यहाँ से प्राप्त जुते हुए खेत में चना व सरसों बोया जाता था।
कालीबंगा सैन्धव सभ्यता का एकमात्र ऐसा स्थल है, जहाँ से मातृ देवी की मूर्तियाँ प्राप्त नहीं हुई है।
यहाँ से ताँबे के बैल की आकृति, भूकम्प के प्रमाण तथा ईंटों के मकान के प्रमाण मिले हैं।
कालीबंगा में समकोण दिशा में जूते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।
इसमें गेहूँ, जौ एक साथ बोई जाती थी।
कपास की खेती के साक्ष्य सर्वप्रथम कालीबंगा में मिले हैं।
कालीबंगा में खेत के दो पाडे थे क+
मदुरी – चना, गेहूँ अधिक दूरी सरसों व कपास
कालीबंगा की लिपि दायीं से बायीं ओर लिखी जाती थी जो अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।
कालीबंगा में कच्र्ची ईंटों का प्रयोग होता था।

राजस्थान की प्राचीन सभ्यतायें
राजस्थान की प्राचीन सभ्यतायें


कालीबंगा में पूर्व-पश्चिम व उत्तर-दक्षिण की सड़कें एक-दूसरे को समकोण दिशा में काटती है।
कालीबंगा में सड़कों की चैड़ाई 7.2 मीटर तथा गलियों की चैड़ाई 1.8 मीटर थी।
कालीबंगा में भवनों के द्वार सड़कों पर न खुलकर गलियों में खुलते थे।
कालीबंगा के लोग मुख्यतः शव को दफनाते थे।
कालीबंगा के प्रमुख पशु- गाय, बैल, भैंस, बकरी, कुत्ता, ऊँट सुअर।
कुत्ता कालीबंगा सभ्यता का प्रमुख पालतु जानवर था।
कालीबंगा में रेत के दो टीले मिले हैं- पश्चिम में छोटा टीला मिला है। जिसे गढ़ी क्षेत्र तथा पूर्व में बड़ा टीला मिला है। जिसे नगर क्षेत्र कहते हैं।
कालीबंगा में मिली प्रमुख सामग्री- मैसोपोटामिया की मोहर मिट्टी से निर्मित।
एक कुएँ के समीप 7 आयताकार यज्ञ वेदियाँ प्राप्त हुई है।
यहाँ पर भूकम्प के साक्ष्य मिले हैं।
शिशु की खोपड़ी भी प्राप्त हुई जिसमें गोल छिद्र। इससे कपाल दोहन क्रिया का पता चलता है।
कालीबंगा में दो टीलों पर उत्खनन कार्य किया गया। छोटे टीले के उत्खनन में निचले स्तरों से प्राप्त सामग्री से यहाँ पूर्व हड़प्पा कालीन सभ्यता (2400 ई. पूर्व) के अवशेष प्राप्त हुए हैं तथा दूसरे टीले से हड़प्पा कालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं जो लगभग 2300 वर्ष ई. पूर्व विकसित हुई थी।

राजस्थान की प्राचीन सभ्यतायें
  1. आहड़ (उदयपुर शहर के पास) – आहड़ नदी के तट पर (जो बनास की सहायक नदी है।)

प्राचीन नाम – ताम्रवती नगरी/तांबावली।
10-11वीं सदी में नाम – आघाटपुर या आघाट दुर्ग।
स्थानीय नाम – धूलकोट।
लगभग 2000 ई. पू. से 1200 ई.पू. की ताम्रयुगीन सभ्यता।
उत्खनन – सर्वप्रथम 1953 ई. – अक्षय कीर्ति व्यास।
1956 ई.-रतनचन्द्र अग्रवाल, 1961 ई.- एच.डी. सांकलिया द्वारा।
यहाँ का प्रमुख उद्योग ताँबा गलाना एवं उसके उपकरण बनाना था, जिसका प्रमाण यहाँ प्राप्त हुए ताम्र कुल्हाड़े व अस्त्र तथा एक घर में तांबा गलाने की भट्टी है। यहाँ पास में ही ताँबे की खदानें थी।
आहड़ की खुदाई में 6 तांबे की मुद्राएं और 3 मुहरें मिली हैं।
मुद्रा पर एक ओर त्रिशुल तथा दूसरी ओर अपोलो है।
यहाँ पर ताम्बे के बर्तन, कुल्हाड़ी तथा उपकरण भी मिले हैं।
आहड़ में माप-तौल के बाट मिले हैं जिससे इनके व्यापार वाणिज्य के बारे में पता चलता है।
आहड़ में मकान पक्की ईंटों के मिले हैं।
आहड़ सभ्यता के लोग मृतकों के साथ आभुषण भी दफनाते थे।
यह लाल व काले मृद्भाण्ड वाली संस्कृति का प्रमुख केन्द्र था। ये मृद्भाण्ड उल्टी तिपाई विधि से पकाए जाते थे।
अनाज रखने के बड़े मृद्भाण्ड मिले हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में गोरे व कोट कहा जाता था।
यहाँ से प्राप्त एक मुद्रा पर अपोलो खड़ा दिखाया गया है व इस पर यूनानी भाषा में लेख भी है।
शरीर से मेल छुड़ाने का झावा भी मिला है।

राजस्थान की प्राचीन सभ्यतायें

  1. गिलुण्ड (राजसमंद) – आहड़ नदी के तट पर ताम्रयुगीन एवं बाद की सभ्यता के अवशेष मिले।
  2. बागोर (भीलवाड़ा) – कोठारी नदी के तट पर, उत्तर पाषाणकालीन सभ्यता के अवशेष, 3000 ई.पू. तक।

उत्खनन – 1967-69 ई. – वी.एन.मिश्रा व डा.एल.एस. लैशनि द्वारा।
यहाँ पर सभ्यता के तीन स्तरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

  1. बालाथल (वल्लभनगर, उदयपुर) –

ताम्र-पाषाणयुगीन सभ्यता, (3000 ई.पू..2500 ई.पू.)
उत्खनन- 1993 ई.- वी.एस.शिंदे, वी.एन.मिश्रा, आर के मोहन्ते।
हड़प्पा की तरह के मृदभाण्ड प्राप्त ।
कपड़े के अवशेष मिले।
यहाँ खुदाई में 11 कमरों के बड़े भवन की रचना प्राप्त हुई।
बैल व कुत्ते की मृणमूर्तियाँ भी प्राप्त हुई।

  1. गणेश्वर (नीम का थाना, सीकर) – कांतली नदी का टीला।

भारत की ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी।
99% उपकरण व औजार ताम्र निर्मित मिले।
पूर्व हड़प्पा कालीन ताम्रयुगीन सभ्यता – 2800 ई.पू.
यहाँ से मछली पकड़ने के कांटे, केशपीन व अंजन स्लाकाएँ प्राप्त हुई है।
मकान पत्थर के बनाए जो थे।

  1. रंगमहल (हनुमानगढ़) – सरस्वती (घग्घर) नदी के पास।

उत्खनन-1952-54 ई. में डाॅ. हन्नारिड के निर्देशन मे एक स्वीडिश दल द्वारा।
यहाँ पर कुषाण शासकों के सिक्के व मिट्टी की मुहरें भी मिली। अतः इसे कुषाणकालीन सभ्यता के समान माना जाता है।
यहाँ पर लाल रंग के पात्रों पर काले रंग के डिजाइन प्राप्त हुए हैं।

  1. बैराठ (जयपुर) – प्राचीन मत्स्य जनपद की राजधानी।

आधुनिक नाम बैराठ, जो पहले विराटनगर कहलाता था।
यहाँ खुदाई का कार्य सर्वप्रथम दयाराम साहनी ने किया।
यहाँ मौर्यकालीन एवं पूर्व की सभ्यताओं के अवशेष, मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेख (भाब्रु शिलालेख) यहीं से प्राप्त, एक गोल बौद्ध मंदिर के अवशेष।
भाब्रु शिलालेख में अशोक का धर्म अंकित है।
भाब्रु शिलालेख एक मात्र लेख है, जो अशोक को बौद्ध धर्म का अनुयायी बताता है।
कपड़े के अवशेष मिले।
प्राचीन मत्स्य जनपद की राजधानी विराटनगर (वर्तमान बैराठ) में बीजक की पहाड़ी भीमजी को डूंगरी तथा महादेवजी की डूंगरी आदि स्थानों पर उत्खनन कार्य प्रथम बार दयाराम साहनी द्वारा 1936-37 में तथा पुनः 1962-63 में नीलरत्न बनर्जी तथा कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा किया गया।
1837 में आबु पहाड़ी से सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण दो प्रस्तर लेख भी प्राप्त हुए हैं।
जिनसे अशोक की बुद्ध थम्म और संघ में अगाध निष्ठा लक्षित होती है।
विराट नगर के मध्य में अकबर ने एक टकसाल खोली थी। इस टकसाल में अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ के काल में ताँबे के सिक्के ढाले जाते थे।

  1. ओझियाना (भीलवाड़ा) – यहाँ उत्खनन कार्य 1993 में प्रारम्भ हुआ।

ताम्र पाषाणयुगीन संस्कृति के अवशेष मिले।

  1. नगरी (चित्तौड़गढ़) – प्राचीन मध्यमिका (शिवि की राजधानी), चित्तौड़ के पास, 1904 ई. में भण्डारकर द्वारा सर्वप्रथम खुदाई।

यहाँ 1962 में केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के के.बी. सौन्दरराजन द्वारा कराई गई खुदाई में शिवि जनपद के सिक्के, गुप्तकालीन कला के अवशेष मिले।

  1. जोधपुरा (जयपुर) – शुंग व कुषाण कालीन सभ्यता के अवशेष। लगभग 2500 ई.पू. से 200 ई. तक।

यहाँ पर अयस्क से लोहा प्राप्त करने की प्राचीनतम भट्टी मिली है।

  1. सुनारी (खेतड़ी, झुन्झुनुँ) – लोहा बनाने की प्राचीनतम भट्टियाँ प्राप्त हुई।
  2. तिलवाड़ा (बाड़मेर) – लूनी नदी के तट पर 500 ई.पू. से 200 ई. तक के अवशेष
  3. रेड/रेढ़ (टोंक) – निवाई तहसील स्थित रेड में पूर्व गुप्तकालीन सभ्यता के अवशेष, लोह सामग्री के विशाल भण्डार। इसे ‘प्राचीन भारत का टाटानगर’कहते हैं।

यहाँ से एशिया का सबसे बड़ा सिक्कों का भण्डार मिला है।

  1. नगर (टोंक) – उणियारा कस्बे में स्थित, प्राचीन नाम ‘मालव नगर’था। गुप्तकालीन अवशेष मिले।

यहाँ छः हजार मालव सिक्के भी मिले हैं।

  1. भीनमाल (जालौर) – गुप्तकालीन अवशेष, चीनी यात्री ह्वेनसांग द्वारा इस नगर की यात्रा। विद्वान ब्रह्मगुप्त, मण्डन, माघ, माहुक, धाइल्ल इसी नगर से सम्बन्धित।
  2. दर (भरतपुर) – इस स्थान पर पाषाणकालीन सभ्यता के अवशेष मिले है।
  3. सोंथी (बीकानेर) – कालीबंगा प्रथम के नाम से विख्यात, अमलानंद घोष के नेतृत्व में 1953 में इस सभ्यता की खुदाई की गई।
  4. ईसवाल (उदयपुर) – इस स्थान पर खुदाई के दौरान लौहकालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं (वर्ष 2003)।
  5. डडीकर (अलवर) – पाँच से सात हजार वर्ष पुराने शैल चित्र मिले हैं (वर्ष 2003)।
  6. गरड़दा (बूँदी) – छाजा नदी के किनारे स्थित इस स्थान पर पहली बर्ड राइडर राॅक पेन्टिंग (शैल चित्र) मिली है।

यह देश में प्रथम पुरातत्व महत्त्व की पेन्टिंग है (वर्ष 2003)।

  1. कोटड़ा (झालावाड़) – इस स्थान पर स्थित दीपक शोध संस्थान द्वारा सातवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य के पुरा अवशेषों की खोज की गयी है (वर्ष 2003)।
  2. नलियासर (सांभर, जयपुर) – सांभर झील के निकट इस स्थान पर खुदाई से चैहान युग से पूर्व की सभ्यता का ज्ञान प्राप्त हुआ है।
  3. तिपटिया (कोटा) – यह स्थल दर्रा वन्य जीव अभ्यारण्य में स्थित है। जहाँ से प्रागैतिहासिक काल के शैल चित्र मिले हैं।
  4. डाडाथोरा (बीकानेर) – शिव बाड़ी के निकट स्थित इस गाँव से पाषाणकालीन सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  5. कुण्डा व ओला (जैसलमेर) – जैसलमेर के इन गांवों में पुरानी सभ्यता व मध्यपाषाण युगीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  6. मल्लाह (भरतपुर) – यह स्थल भरतपुर जिले के ‘घना पक्षी अभ्यारण्य‘ क्षेत्र के मध्य स्थित है। यहां से अत्यधिक मात्रा में ‘ताम्र हारपून‘ तथा ‘तलवारें‘ प्राप्त हुई हैं। यह ताम्रयुगीन सभ्यता स्थल है।
  7. नैंनवा (बूँदी) – बूँदी जिले के इस नगर में श्री कृष्ण देव ने खुदाई करायी। यहाँ से लगभग 2000 वर्ष प्राचीन महिषासुर-मर्दिनी की मृण मूर्ति प्राप्त हुई है।
  8. कणसव (कोटा) – यहाँ से मौर्य शासक धवल का 738 ई. से सम्बन्धित लेख मिला है।

राजस्थान के विभिन्न जनपद

  1. आबु (सिरोही) – अर्बुद
  2. महावीर जी (करौली) – चान्दन
  3. रामदेवरा – रुणेचा
  4. करौली – गोपालपाल, कल्याणपुरी
  5. धौलपुर – कोठी
  6. झालरापाटन – बृजनगर
  7. अलवर – आलौर, साल्वपुर
  8. भीनमाल (जालौर) – श्रीमाल
  9. बयाना (भरतपुर) – श्रीपंथ
  10. सांचोर (जालौर) – सत्यपुर
  11. जालौर – जबालिपुर (अलाउद्दीन खिलजी ने जलालाबाद रखा)
  12. नागौर – नागदुर्ग, अहिच्छत्रपुर (अक्षत्रियपुर)
  13. सांभर – शाकम्भरी, सपादलक्ष
  14. जयसमंद – ढेबर
  15. चित्तौड़गढ़ – चित्रकूट (अलाउद्दीन खिलजी ने खिज्राबाद रखा)
  16. अजमेर – अजयमेरू
  17. हनुमानगढ़ – भटनेर
  18. नाथद्वारा (राजसमंद) – सिंघाड़
  19. विजयनगर (भीलवाड़ा)- बिजोलिया
  20. बैराठ – विराटनगर, विराटपुर
  21. मंडोर – माण्डव्यपुर
  22. तारागढ़ (अजमेर) – गढ़ बीठली
  23. बूँदी – वृन्दावती
  24. ऋषभदेव (उदयपुर) – धूलैव
  25. आमेर – अम्बावती
  26. मेवाड़ – मेदपाट, प्राग्वाट
  27. नगरी (चित्तौड़गढ़) – माध्यमिका

28.जैसलमेर -मांड, वल्लदेश

  1. मारवाड़ – मरूवार, मरू
  2. नाडोल (पाली) – नाडुल्य
  3. अरावली – आडावल
  4. उदयपुर – शिवि
  5. हनुमानगढ़ और गंगानगर के पास का क्षेत्र – यौद्वेय
  6. उदयपुर नगर के पास का क्षेत्र – गिरवा
  7. अजमेर व राजसमंद जिले का दिवेर क्षेत्र – मेरवाड़ा
  8. प्रतापगढ़, झालावाड़ – मालव देश
  9. अलवर का उत्तरी भाग – कुरू देश
  10. बीकानेर व चुरु का अधिकांश भाग एवं दक्षिणी गंगानगर की मरुभूमि – थली (उत्तरी मरुभूमि)
  11. कोटा, बूँदी, बारां, झालावाड़ – हाड़ौती
  12. भरतपुर, करौली, धौलपुर – शूरसेन
  13. उदयपुर जिले की गोगुन्दा, राजसमंद की कुंभलगढ़ तहसील – भोराठ का पठारी क्षेत्र
  14. भीलवाड़ा जिले की जहाजपुर तहसील व अधिकांश टोंक जिला – खेराड़ एवं मालखेराड़
  15. डूँगरपुर, बाँसवाड़ा के मध्य का भाग – मेवल
  16. डूँगरपुर, पूर्वी सिरोही व उदयपुर जिले का अरावली पर्वतीय आदिवासी प्रदेश – भोमट क्षेत्र
  17. प्रतापगढ़ – कांठल, छप्पन का मैदान
  18. जयपुर व आस-पास का क्षेत्र – ढूंढाड़
  19. अरावली पर्वतीय प्रदेश – मेरू
  20. जोधपुर व आस-पास का क्षेत्र – मारवाड़
  21. जालोर व पाली का कुछ भाग – गोंडवाड़ा

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