शारीरिक विकास

शारीरिक विकास मनोविज्ञान

इस series में हम psychology के notes दे रहे है जो विभिन्न परीक्षाओं के लिए अतिमहत्वपूर्ण है |
psychology notes के इस series में आज हम शारीरिक विकास के बारे में पढेंगे तो बने रहिए popularstudy के साथ |

◆ शारीरिक विकास 

★  शारीरिक विकास के चक्र – 

  •  प्रथम चक्र. –  0 – 3 वर्ष  

विकास तीव्र गति से 

  • द्वितीय चक्र – 3 से 12 वर्ष 

मंद गति से 

  • तृतीय चक्र – 13 से 15 वर्ष 

विकास तीव्र गति से 

  • चतुर्थ चक्र – 16 से 18 वर्ष 

विकास मंद गति से 

श्रीमती हरलॉक – “विकास लयात्मक होता है नियमित नहीं” 

क्रो एंड क्रो – “मनुष्य सर्वप्रथम एक शारीरिक प्राणी है उसकी शारीरिक संरचना उसके व्यवहार व दृष्टिकोण का आधार है अतः शारीरिक विकास के सभी पक्षों का अध्ययन करना आवश्यक है।”

 ★ लंबाई → 

 शैशवावस्था में लड़कों की लंबाई अधिक होती है तथा बाल्यावस्था में लगभग बराबर और अधिक होती भी है  तो लड़कियों की होती है ।

और किशोरावस्था में लड़कों की लंबाई अधिक होती है। क्योंकि लड़कियों की लंबाई 16 वर्ष तक बढ़ती है जबकि लड़कों की लंबाई 18 वर्ष के बाद भी बढ़ती रहती है।

★ भार → 

शैशवावस्था में लड़कों का भार अधिक,बाल्यावस्था में लगभग बराबर और यदि अधिक होता है तो लड़कियों का ।

किशोरावस्था में लड़कों का भार अधिक होता है क्योंकि  लड़कों की हड्डियां अधिक मजबूत होती है ।

★ दांत → 

दांत निकलने की प्रक्रिया का आरंभ गर्भावस्था से हो जाता है । जन्म के समय शिशु के दांत नहीं होते है । 

पांचवे या छठे महीने में शिशु के दूध के दांत निकलना प्रारंभ हो जाते हैं 1 वर्ष में बालक के दांतो की संख्या लगभग 8 होती है तथा 4 वर्ष तक दूध के पूरे 20 दांत निकल आते हैं उसके बाद दूध के दांत गिरना शुरू होते तथा पांचवें या छठे वर्ष से नए दांत निकलना शुरू हो जाते हैं ।

12 से 13 वर्ष तक बालक के दांतो की संख्या 27 -28 होती है ।

किशोरावस्था के अंत तथा प्रौढावस्था के प्रारंभ में प्रज्ञा दंत निकलते है । इनकी संख्या चार होती है ।

स्थाई दांत –  12

अस्थाई दांत –  20

कुल दांत – 32

★ हड्डियां → 

  शैशवावस्था में हड्डियों की संख्या लगभग 250 से 300 के बीच होती है ।

यह हड्डियां कोमल तथा लचीली होती है । अतः धीरे-धीरे यह आपस में जुड़ना प्रारंभ होती है इस क्रिया को अस्थिकरण / दृढिकरण की क्रिया कहते हैं ।

किशोरावस्था में अस्थिकरण की क्रिया पूर्ण हो जाती है तो हड्डियों की संख्या 206 रह जाती है ।

किशोरावस्था में भुजाओं व टांगों की हड्डियों में तीव्र गति में वृद्धि होती है ।

★ मस्तिक → 

 शैशवावस्था में मस्तिष्क का भार लगभग 350 ग्राम होता है ।

बाल्यावस्था में 1260 ग्राम 

किशोरावस्था में 1260 – 1450

★ धड़कन → 

 जन्म के समय शिशु की धड़कन 1 मिनट में लगभग 140 बार धड़कती है ।

6 वर्ष की आयु तक 100 बार ।

12 वर्ष में 85 बार ।

किशोरावस्था में 72 बार।

★ बाल विकास के आधार

 संवेदना → 

जब एक नवजात शिशु किसी तेज आवाज को सुनकर चौक जाता है अतः उत्तेजित हो जाता है तो उसे संवेदना कहते हैं । यह जीव की सरलता व प्रारंभिक अनुभूति है इसे ज्ञान की पहली सीढ़ी माना जाता है ।

प्रत्यक्षीकरण → 

 जब शिशु किसी तेज आवाज को सुनकर यह जानने लगता है कि आवाज किसकी है तथा कहां से आ रही है तो इसे प्रत्यक्षीकरण कहते हैं ।

यह ज्ञान की दूसरी सीढ़ी है ।

प्रत्यक्षीकरण का पूर्व अनुभव से संबंध होता है 

संवेदना +  अर्थ = प्रत्यक्षीकरण 

या 

संवेदना + विचार = प्रत्यक्षीकरण

 संप्रत्यय निर्माण → 

जब बालक पक्षियों के झुंड के पास जाता है जोर से ताली बजाता है तो सारे पक्षी उड़ जाते हैं । यही से बालक के मस्तिस्क में संप्रत्यय का निर्माण होता है।   

धीरे-धीरे बालक में रंग संप्रत्यय,आकार संप्रत्यय ,भार संप्रत्यत,सौंदर्य संप्रत्यत आदि का निर्माण होने लगता है ।

आत्म संप्रत्यय → सर्वप्रथम आत्म संप्रत्यत की धारणा का प्रस्तुतीकरण विलियम जेम्स ने अपनी पुस्तक “प्रिंसिपल ऑफ साइकोलॉजी” के अंतर्गत किया ।

आत्म संप्रत्यय किशोरावस्था की पहचान है तथा एक विकसित व्यक्तित्व की पहचान है ।

 आत्म संप्रत्यय में व्यक्ति अपने बारे में जानता है समझता है तथा अपने बारे में विचार करता है ।

 अपनी आयु एवं बुराइयों शक्तियों एवं दुर्बलता और सफलताओं और असफलताओं के बारे में जानना तथा उनका आकलन करना है  आत्मसंप्रत्यय है ।

 खेल → 

  • खेल एक जन्मजात प्रवृत्ति हैं ।
  •  यह एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है ।
  • यह स्पूर्ति दायक क्रिया है ।
  • यह आनंददायक क्रिया है ।
  • यह आत्मप्रेरित क्रिया है ।
  • यह एक निर्देशयपूर्ण क्रिया है ।
  • खेल के साथ जब उद्देश्य जुड़ जाता है तो वह कार्य बन जाता है ।

खेल + जीविकोपार्जन = कार्य 

  • खेल का संबंध काल्पनिक जगत से होता है। जबकि कार्य का संबंध वास्तविक जगत से होता है ।
  •  बालक का सामाजिकरण प्रारंभ होता है – परिवार से 
  • बालक के समाजीकरण का सर्वाधिक प्रेरणास्पद घटक है खेल का मैदान।

जहाँ पर बालक में धैर्य सहनशीलता संयम संतुलन सामन्जस्य अनुशासन आज्ञाकारिता आदि गुणों का विकास होता है ।

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