गुहिल वंश का इतिहास

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गुहिल वंश

I. मेवाड़ का गुहिल वंश

गुहिल

अबुल फजल ने मेवाड़ के गुहिलों को ईरान के बादशाह नौशेखाँ आदिल की सन्तान माना है।
मुहणौत नैणसी ने अपनी ख्यात में गुहिलों की 24 शाखाओं का जिक्र किया है। इन सभी शाखाओं में मेवाड़ के गुहिल सर्वाधिक प्रसिद्ध रहे हैं।
गुहादित्य या गुहिल इस वंश का संस्थापक था।
पिता का नाम – शिलादित्य, माता का नाम – पुष्पावती।
स्थापना 566 ई. में, हूण वंश के शासक मिहिरकुल को पराजित करके।
राजधानी – नागदा (उदयपुर के पास)।


बप्पा रावल या कालभोज

734 ई. में चित्तौड़गढ़ के अन्तिम मौर्य राजा मान मौर्य से चित्तौड़ दुर्ग जीता, एकलिंग मंदिर (कैलाशपुरी) का निर्माण, एकलिंग जी को कुलदेवता मानते थे। एकलिंग जी के पास इनकी समाधि ‘बप्पा रावल’ नाम से प्रसिद्ध।
बप्पारावल को कालभोज के नाम से जाना जाता है।
बप्पारावल को मेवाड़ का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
बप्पारावल ने कैलाशपुरी (उदयपुर) में एकलिंगनाथजी का मन्दिर बनवाया एकलिंगनाथजी मेवाड़ के कुल देवता थे।
734 ई. में बप्पारावल ने मौर्य शासक मानमौरी से चित्तौड़गढ़ का किला जीता तथा नागदा (उदयपुर) की राजधानी बनाया।
नोट – चित्तौड़ का किला (गिरि दुर्ग) गम्भीरी व बेड़च नदियों के किनारे पर मेसा के पठार पर स्थित चित्रांगद मौर्य (कुमारपाल संभव के अभिलेख के अनुसार चित्रांग) द्वारा बनाया गया। चित्तौड़ के किले में सात द्वार हैं। पाडनपोल, भैरवपोल, गणेशपोल, हनुमानपोल, जोडनपोल, लक्ष्मणपोल, रामपोल।

चित्तौड़ के किले के बारे में कहा गया है कि गढ तो बस चित्तौड़गढ़ बाकी सब….
क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा किला चित्तौड़ का किला है। यह व्हेल मछली की आकृति का किला है।
इसे राजस्थान का दक्षिणी-पूर्वी प्रवेश द्वार कहते हैं।
चित्तौड़ को राजस्थान में किलों का सिरमौर व राजस्थान का गौरव कहते हैं।
राजस्थान किलों की दृष्टि से देश में तीसरा स्थान रखता है। पहला महाराष्ट्र का, दूसरा मध्यप्रदेश का तीसरा राजस्थान का है।
बप्पारावल से सम्बन्धित प्रशस्तियाँ

  1. रणकपुर प्रशस्ति (1439) – बप्पारावल व कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया है। (देपाक/दिपा)
  2. कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति (1460) – बप्पारावल से लेकर राणा कुम्भा तक के राजाओं के विरूद्ध उपलब्धियों व युद्ध विजयों का वर्णन (अत्रि व उसके पुत्र महेश द्वारा रचित)
  3. कुम्भलगढ़ प्रशस्ति – कान्हाव्यास द्वारा 1460 में बप्पारावल को ब्राह्मण या विप्रवंशीय बताया है।
  4. एकलिंगनाथ के दक्षिण द्वार की प्रशस्ति – (1488 महेश भट्ट द्वारा रचित) – बप्पारावल के संन्यास लेने का उल्लेख है।
  5. संग्रामसिंह द्वितीय के काल में 1719 में लिखी गयी। वैद्यनाथ प्रशस्ति में हारित ऋषि से बप्पारावल को मेवाड़ साम्राज्य मिलने का उल्लेख है। (रूपभट्ट द्वारा रचित)

मेवाड़ के राजा एकलिंग जी को वास्तविक राजा व स्वयं इनका दीवान बनकर कार्य करते थे।
उदयपुर के राजा राजधानी छोड़ने से पूर्व एकलिंग जी की स्वीकृति लेते थे, जिसे ‘आसकां लेना‘ कहा जाता था।
बप्पा रावल के गुरु – हारीत ऋषि (लकुलीश शैवानुगामी परम्परा के)।
सी.वी. वैध ने बप्पा रावल को चार्ल्स मोर्टल कहा है।
बप्पा रावल के वंशज अल्लट (951-953) के समय मेवाड़ की बड़ी उन्नति हुई। आहड़ उस समय एक समृद्ध नगर व एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र था। अल्लट ने आहड़ को अपनी दूसरी राजधानी बनाया। यह भी माना जाता है कि अल्लट ने मेवाड़ में सबसे पहले नौकरशाही का गठन किया।
मालव के परमार शासक मुझ परमार से चित्तौड़गढ़ दुर्ग हार गया।
नोट- परमारों के प्रतापी शासक भोज परमार ने 1021-1031 तक चित्तौड़ पर शासन किया तथा चित्तौड़गढ़ में त्रिभुवन नारायण देव के मन्दिर का निर्माण करवाया।

इस मन्दिर का जीर्णोद्धार राणा मोकल ने करवाया। इसलिये इसे “मोकल का समीद्धेश्वर” मन्दिर भी कहा जाता है।

गुहिल वंश का इतिहास

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रावल जैत्रसिंह (1213-50 ई.)

इल्तुतमिश के आक्रमण का सफल प्रतिरोध किया जिसका वर्णन जयसिंह कृत ‘हम्मीर-मान-मर्दन’ नामक नाटक में किया गया है।
1242-43 में जैत्रसिंह की गुजरात के त्रिभुवनपाल से लड़ाई हुई।
जैत्रसिंह ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ को बनाई।
तेजसिंह – 1260 ई. में मेवाड़ चित्र शैली का प्रथम ग्रन्थ ‘श्रावक प्रतिकर्मण सूत्र चुर्णि’ तेजसिंह के काल में लिखा गया।
नोट – मेवाड़ चित्रकला शैली की शुरूआत तेजसिंह के समय हुई।

रावल समरसिंह (1273-1301)

इसने आचार्य अमित सिंह सूरी के उपदेशों से अपने राज्य में जीव हिंसा पर रोक लगाई।


रावल रतनसिंह (1301-1303 ई.)

यह समरसिंह का पुत्र था जो 1301 ई. में शासक बना।
1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय लड़ते हुए शहीद, पत्नी पद्मिनी का जौहर, सेनापति गोरा-बादल (चाचा – भतीजा) का बलिदान। गोरा पद्मिनी का चाचा तथा बादल भाई था।
यह चित्तौड़ का प्रथम साका (राजपूतों का बलिदान एवं राजपूत महिलाओsं का सामुहिक जौहर) था।
अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम खिज्राबाद रखा व अपने पुत्र खिज्र खां को वहाँ का शासक बनाया।
चित्तौड़गढ़ के किले में पद्मिनी पैलेस, गौरा बादल महल, नौ गंजा पीर की दरगाह व कालिका माता का मन्दिर, कुम्भा द्वारा निर्मित विजय स्तम्भ, जीजा द्वारा जैन कीर्ति स्तम्भ, मोकल द्वारा पुनः निर्माण कराया गया। समिद्धेश्वर मन्दिर (त्रिभुवन नारायण) मीरां मन्दिर आदि दर्शनीय है।
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में बाघसिंह की छतरी, जयमल पत्ता की छतरी, वीर कल्ला राठौड़ की छतरी (चार हाथों वाले देवता, शेषनाग का अवतार) मीरां के गुरू संत रैदास की छतरी, जौहर स्थल।
चैत्र कृष्ण एकादशी को जौहर मेला चित्तौड़गढ़ में लगता है।
1313 के बाद सोनगरा चौहान मालदेव को अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का प्रशासन सौंपा।
मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा शेरशाह सूरी के समय मसनवी शैली में रचित अवधी भाषा के प्रसिद्ध ग्रन्थ पद्मावत में रतनसिंह व पद्मिनी की प्रेम कथा का उल्लेख है।
पद्मावत को कुछ इतिहासकार जैसे ओझा, कानूनगो, लाल आदि कल्पना पर आधारित मानते हैं।
पद्मिनी का प्रिय तोता – हीरामन (राय जाति का तोता, जो वर्तमान में दर्रा अभ्यारण्य, कोटा एवं गागरोण में पाया जाता है)।
रावल रतनसिंह का विद्वान पण्डित – राघव चेतन (इसने रतनसिंह द्वारा देश निकाला दे दिये जाने पर अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में शरण ली)।
इस युद्ध (1303 ई. ) में इतिहासकार अमीर खुसरो उपस्थित था।
रतनसिंह गुहिलों की रावल शाखा का अंतिम शासक था।


राणा हम्मीर (1326-64 ई.)

अरिसिंह का पुत्र।
गुहिल वंश की एक शाखा सिसोदा का सामन्त, जिसने मालदेव सोनगरा (जालौर) के पुत्र जैसा (जयसिंह) को पराजित कर चित्तौड़ जीता।
सिसोदिया वंश का संस्थापक (1326 ई. में)।
प्रथम राणा शासक।
मेवाड़ के उद्धारक राजा के रूप में प्रसिद्ध।
उपाधियां – वीर राजा (रसिक प्रिया में उल्लिखित) व विषमघाटी पंचानन (कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति में उल्लिखित)।
हम्मीर व मुहम्मद बिन तुगलक के बीच सिंगोली नामक स्थान पर युद्ध हुआ।

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राणा क्षेत्रसिंह (राणा खेता) (1364-82 ई.)

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राणा हम्मीर का पुत्र। इसने बुंदी को अपने अधीन किया।


राणा लक्षसिंह (राणा लाखा) (1382-1421 ई.)

राणा खेता का पुत्र, वृद्धावस्था में मारवाड़ के शासक राव चूँड़ा राठौड़ की पुत्री व रणमल की बहिन हंसा बाई के साथ विवाह।
राणा लाखा के काल में एक बनजारे ने पिछौला झील का निर्माण कराया।
राणा लाखा ने ‘झोटिंग भट्ट‘ एवं ‘धनेश्वर भट्ट‘ जैसे विद्वान पंडितों को राज्याश्रय दिया।
राणा लाखा के काल में मगरा जिले के जावर गाँव में चाँदी की खान खोज निकाली, जिसमें चाँदी और सीसा बहुत निकलने लगा। कुँवर चूड़ा व राणा मोकल इसके पुत्र थे।


राणा मोकल (1421-1433 ई.)

राणा लाखा व हंसा बाई से वृद्धावस्था में उत्पन्न पुत्र।
इसके समय राठौड़ों का मेवाड़ में प्रभाव बढ़ गया था।
राणा मोकल ने समद्विश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया तथा द्वारिकानाथ (विष्णु) का मंदिर बनवाया।
राणा मोकल की हत्या महाराणा खेता की पासवान के पुत्र चाचा और मेरा नामक सामन्तों ने सन् 1433 में की।
कुँवर चूड़ा

लाखा का बड़ा पुत्र, राजपूताने का भीष्म, मारवाड़ के राव चूँडा
राठौड़ की पुत्री का विवाह लाखा के साथ एवं उसके पुत्र मोकल के उत्तराधिकारी बनने पर कुंवर चूंडा ने मोकल का साथ दिया।

कुम्भा या कुम्भकर्ण (1433-68 ई.)

मेवाड़ का महानतम शासक, राणा मोकल व सौभाग्य देवी का पुत्र।
महाराणा कुम्भा का काल ‘कला एवं वास्तुकला का स्वर्णयुग‘ कहा जाता है।
गुरु का नाम – जैनाचार्य हीरानन्द।
कुम्भा ने आचार्य सोमदेव को ‘कविराज‘ की उपाधि प्रदान की।
कुम्भा की पुत्री – रमाबाई (संगीत शास्त्र की ज्ञाता, उपनाम- वागीश्वरी)।
सारंगपुर का प्रसिद्ध युद्ध (1437 ई.) में मालवा के महमूद खिलजी प्रथम को हराया। इस विजय के उपलक्ष्य में विजय स्तम्भ/कीर्ति स्तम्भ (चित्तौड़) का निर्माण कराया, जो 1440 ई. में बनना शुरू होकर 1448 ई. में पूर्ण हुआ।
विजय स्तम्भ के शिल्पी जैता व उसके पुत्र नापा, पोमा व पूंजा थे। विजय स्तम्भ को ‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष‘ भी कहा जाता है। इसकी नौ मंजिलें है तथा तीसरी मंजिल पर अरबी भाषा में नौ बार ‘अल्लाह‘ लिखा हुआ है।
राजस्थान की वह पहली ऐतिहासिक इमारत जिस पर डाक टिकट जारी हुआ था – विजयस्तम्भ (15 अगस्त, 1949 को 1 रु. का डाक टिकट)। कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति के लेखक – कवि अत्रि व उसका पुत्र महेश।
रणकपुर का प्रसिद्ध जैन मंदिर इसी काल में निर्मित – 1439 ई. (चौमुख मन्दिर/आदिनाथ मन्दिर), इस मंदिर को ‘खम्भों का अजायबघर‘ तथा ‘स्तम्भों का वन’ कहा जाता है। कुल 1444 खम्भे, मंदिर परिसर में प्रसिद्ध वैश्या मंदिर।
निर्माता – धरणकशाह या धन्ना सेठ (कुम्भा का वित्त मंत्री), प्रधान शिल्पी – दैपाक/देपा।
इस मन्दिर को चतुर्मुख जिनप्रसाद भी कहा जाता है।
मेह कवि ने इस मन्दिर को त्रिलोक दीपक तथा विमलसूरी ने इस मन्दिर को नलिनी गुल्म विमान कहा है।
चित्तौड़ दुर्ग में जैन कीर्ति स्तम्भ का निर्माण इसी काल में, निर्माता – जैन महाजन जीजाशाह।
कुम्भलगढ़, अचलगढ़ (आबु पर्वत) सहित 32 दुर्गों का निर्माता (मेवाड़ में कुल 84 दुर्ग हैं जिनमें से 32 दुर्ग़ों का निर्माता कुम्भा स्वयं है)
कुम्भा की उपाधियाँ – 1. हालगुरु – गिरि दुर्गो का स्वामी होने के कारण। 2. राणो रासो – विद्वानों का आश्रयदाता होने के कारण। 3. हिन्दू सुरत्ताण – समकालीन मुस्लिम शासकों द्वारा प्रदत्त। 4. अभिनव भरताचार्य – संगीत के क्षेत्र में कुम्भा के विपुल ज्ञान के कारण। 5. राजगुरु – राजाओं को शिक्षा देने की क्षमता होने के कारण कहलाये। 6. तोडरमल – कुम्भा के हयेश (अश्वपति), हस्तीश (गजपति) और नरेश (पैदल सेना का अधिपति) होने से
कहलाये। 7. नाटकराज का कर्त्ता-नृत्यशास्त्र के ज्ञाता होने के कारण। 8. धीमान-बुद्धिमत्तापूर्वक निर्माणादि कार्य करने से। 9. शैलगुरु-शस्त्र या भाला का उपयोग सिखाने से। 10. नंदिकेश्वरावतार-नंदिकेश्वर के मत का अनुसरण करने के कारण।
राणा कुंभा को राजस्थान में स्थापत्य कला का जनक कहा जाता है।
कुम्भस्वामी मंदिर, एकलिंग मंदिर, मीरा मंदिर, शृंगार गोरी मंदिर आदि का चित्तौड़ दुर्ग में निर्माण।
इनके राज्याश्रित कान्ह व्यास द्वारा ‘एकलिंग-महात्म्य‘ पुस्तक रचित जिसमें ‘राजवर्णन‘ अध्याय स्वयं कुंभा ने लिखा। कुम्भा द्वारा रचित विभिन्न ग्रन्थ – 1. संगीत राज – यह कुंभा द्वारा रचित
सारे ग्रंथों में सबसे वृहद्, सर्वश्रेष्ठ, सिरमौर ग्रंथ है। भारतीय संगीत की गीत-वाद्य-नृत्य, तीनों विधाओं का गूढ़तम विशद् शास्त्रोक्त समावेश इस महाग्रंथ में हुआ है। 2. रसिक प्रिया – गीत गोविन्द की टीका। 3. कामराजरतिसार – यह ग्रंथ कुंभा के कामशास्त्र विशारद होने का परिचायक ग्रंथ है।

अन्य ग्रंथ – संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबन्ध, संगीत रत्नाकर टीका, चण्डी शतक टीका आदि।
प्रसिद्ध वास्तुकार मण्डन को आश्रय, कुम्भलगढ़ दुर्ग का प्रमुख शिल्पी मण्डन था।
मण्डन – ये खेता ब्राह्मण के पुत्र तथा कुंभा के प्रधान शिल्पी थे। इनके द्वारा
रचित ग्रन्थ हैं –

  1. प्रासाद मंडन – इस ग्रंथ में देवालय निर्माणकला का विस्तृत विवेचन है।
  2. राजवल्लभ मंडन – इस ग्रंथ में नागरिकों के आवासीय गृहों, राजप्रासाद एवं नगर रचना का विस्तृत वर्णन है।
  3. रूप मंडन – यह मूर्तिकला विषयक ग्रंथ है।
  4. देवतामूर्ति प्रकरण (रूपावतार) – इस ग्रंथ में मूर्ति निर्माण और प्रतिमा स्थापना के साथ ही प्रयुक्त होने वाले विभिन्न उपकरणों का विवरण दिया गया है।
  5. वास्तु मंडन – वास्तुकला का सविस्तार वर्णन है।
  6. वास्तुसार – इसमें वास्तुकला संबंधी दुर्ग, भवन और नगर निर्माण संबंधी वर्णन है।
  7. कोदंड मंडन – यह ग्रंथ धनुर्विद्या संबंधी है।
  8. शकुन मंडन – इसमें शगुन और अपशगुनों का वर्णन है।
  9. वैद्य मंडन- इसमें विभिन्न व्याधियों के लक्षण और उनके निदान के उपाय बताए गए हैं।

मंडन के भाई नाथा ने वास्तुमंजरी तथा पुत्र गोविन्द ने कलानिधि नामक ग्रन्थों की रचना की।
कुंभाकालीन जैन आचार्य – सोमसुन्दर सूरि, जयशेखर सूरि, भुवन कीर्ति एवं सोमदेव।
कुम्भा के समय माण्डलगढ़ पर महमूद खिलजी प्रथम ने 3 बार आक्रमण किए।
कुम्भा के समय गुजरात व मेवाड़ में संघर्ष का मुख्य कारण नागौर के उत्तराधिकार का मामला था।
मालवा व गुजरात के मध्य चम्पानेर की संधि (1456) कुम्भा के विरूद्ध हुई।
कुम्भा की हत्या उसके पुत्र उदा (उदयकरण) ने सन् 1468 ई. में कटारगढ़ (कुम्भलगढ़) में की परन्तु कुंभा के बाद उसका दूसरा पुत्र रायमल राजा बना।
कुम्भलगढ़ दुर्ग कुम्भा द्वारा अपनी पत्नी कमलदेवी की याद में 1443-1459 के बीच बनवाया गया। कुम्भलगढ़ दुर्ग को कुभलमेर दुर्ग, मछीदरपुर दुर्ग, बैरों का दुर्ग, मेवाड़ के राजाओं का शरण स्थली भी कहा जाता है।
कुम्भलगढ़ दुर्ग की प्राचीर भारत में सभी दुर्ग़ों की प्राचीर से लम्बी है। इसकी प्राचीर 36 किमी. लम्बी है। अतः इसे भारत की मीनार भी कहते हैं। इसकी प्राचीर पर एक साथ चार घोड़े दौड़ाए जा सकते हैं।
कुम्भलगढ़ दुर्ग के लिए अबुल-फजल ने कहा है कि, “यह दुर्ग इतनी बुलन्दी पर बना है कि नीचे से ऊपर देखने पर सिर पर रखी पगड़ी गिर जाती है।
कर्नल टॉड ने कुम्भलगढ़ दुर्ग को “एस्ट्रुकन” दुर्ग की संज्ञा दी है।
कुम्भलगढ़ दुर्ग में पाँच द्वार हैं-

  1. ओरठपोल 2. हल्लापोल 3. हनुमानपोल 4. विजयपोल 5. रामपोल

कुम्भलगढ़ दुर्ग में सबसे ऊँचाई पर बना एक छोटा दुर्ग कटारगढ़ है। इस कटारगढ़ दुर्ग को मेवाड़ की आँख कहते हैं।
कटारगढ़ दुर्ग कुम्भा का निवास स्थान था।
कुम्भलगढ़ दुर्ग में 1537 ई. में उदयसिंह का राज्याभिषेक हुआ।
मेवाड़ प्रजामण्डल के संस्थापक माणिक्यलाल वर्मा (मेवाड़ का गांधी) को प्रजामण्डल के समय कुम्भलगढ़ दुर्ग ही नजरबंद करके रखा गया था।
हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) के बाद 1578 ई. में महाराणा प्रताप ने कुम्भलगढ़ दुर्ग का अपनी राजधानी बनाया तथा यहीं महाराणा प्रताप का 1578 ई. में दूसरा औपचारिक रूप से राज्याभिषेक हुआ।
नोट – कटारगढ़ दुर्ग में 9 मई, 1540 को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ।

कुम्भा ने अचलगढ़ दुर्ग (सिरोही), बसंतगढ़ (सिरोही), भीलों की सुरक्षा हेतु भोमट दुर्ग (सिरोही) तथा बैराठ दुर्ग (बंदनौर, भीलवाड़ा) का निर्माण करवाया।
रायमल – रायमल के तीन पुत्र थे- (i) जयमल (ii) पृथ्वीराज (iii) राणासांगा।

  1. जयमल – बूंदी के सूरजन हाड़ा की पुत्री तारा से विवाह किया (टोडा टोंक को नहीं जीत सका) तो सुरजन हाड़ा ने इसे मरवा दिया।
  2. पृथ्वीराज – तेज गति से घोड़ा चलाने के कारण इसे उड़ना राजकुमार कहते हैं। इसने टोडा टोंक को जीता तो सुरजन हाड़ा की पुत्री तारा से विवाह किया। नोट – इसने अपनी पत्नी तारा के नाम पर अजयमेरू दुर्ग का नाम तारागढ़ रखा।

गुहिल वंश का इतिहास

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महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) (1509-28 ई.)

रायमल का पुत्र।
24 मई, 1509 ई. को महाराणा संग्राम सिंह का राज्याभिषेक हुआ उस समय दिल्ली में लोदी वंश का सुल्तान सिकन्दर लोदी, गुजरात में महमूदशाह बेगड़ा और मालवा में नासिरूद्दीन खिलजी का शासन था।
मेवाड़ का सबसे प्रतापी शासक, ‘हिन्दूपत‘ कहलाता था।
मालवा के महमूद खिलजी द्वितीय से सांगा का संघर्ष मेदिनीराय नामक राजपूत को शरण देने के कारण हुआ।
सन् 1519 को गागरोन (झालावाड़) युद्ध मे मालवा के शासक महमूद खिलजी द्वितीय को हराकर बंदी बनाया, फिर रिहा किया।
खातोली (बूँदी) के युद्ध (1517 ई.) व बाड़ी (धौलपुर) के युद्ध (1519 ई.) में दिल्ली के शासक इब्राहिम लोदी को हराया।
पंजाब के दौलत खां व इब्राहिम लोदी के भतीजे आलम खां लोदी ने फरगना (काबुल) के शासक बाबर को भारत आमंत्रित किया।
बाबर ने अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-बाबरी (तुर्की भाषा) में राणा सांगा द्वारा बाबर को भारत आमंत्रित करने का उल्लेख किया। तुजुक-ए-बाबरी में बाबर ने कमल के फूल के बाग का वर्णन किया है जो धौलपुर में है।
राणा सांगा का गुजरात से संघर्ष ईडर के मामले को लेकर हुआ (गुजरात का सुल्तान मुजफ्फर)।
1526 ई. के बयाना (भरतपुर) के युद्ध में बाबर को हराया।
ऐतिहासिक खानवा (भरतपुर की रूपवास तहसील में) के युद्ध- 17 मार्च 1527 ई. में मुगल शासक बाबर से हारा, घायलावस्था में युद्ध क्षेत्र से बाहर, खानवा के युद्ध में बाबर से पराजित होने का प्रमुख कारण बाबर का तोपखाना था।
खानवा के इस निर्णायक युद्ध के बाद मुस्लिम (मुगल) सत्ता की वास्तविक स्थापना हुई। खानवा स्थान गंभीरी नदी के किनारे है।
खानवा विजय के बाद बाबर ने गाजी की उपाधि धारण की तथा खानवा युद्ध में जिहाद का नारा दिया।
खानवा युद्ध में राणा सांगा ने सभी राजपूत हिन्दू राजाओं को पत्र लिखकर युद्ध में आमंत्रित किया। राजपूतों में इस प्रथा को पोती परवण कहा जाता है।
राणा सांगा अन्तिम हिन्दू राजपूत राजा था जिसके समय सारी हिन्दू राजपूत जातियां विदेशियों को बाहर निकालने के लिए एकजुट हो गई थी।
खानवा के युद्ध में आमेर का – पृथ्वीराज कच्छवाह मारवाड़ का – मालदेव, बूंदी का – नारायण राव, सिरोही का – अखैहराज देवड़ा प्रथम, भरतपुर का – अशोक परमार, बीकानेर का – कल्याणमल ने।
अपनी-अपनी सेना का नेतृत्व किया। अशोक परमार की वीरता से प्रभावित होकर राणा सांगा ने अशोक परमार को बिजौलिया ठिकाना भेंट किया।
हसन खां मेवाती खानवा युद्ध में राणा सांगा के युद्ध में सेनापति था।
खानवा के युद्ध में झाला अज्जा ने सांगा का राज्य चिह्न व मुकुट लेकर सांगा की सहायता की व अपना बलिदान दिया।
30 जनवरी 1528 को कालपी (मध्यप्रदेश) में सरदारों द्वारा विष दिये जाने के कारण बसवां (दौसा) में मृत्यु।
मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में सांगा का दाह संस्कार हुआ तथा वहीं पर उसकी छतरी है।
राणा सांगा के दाह संस्कार के समय उसके शरीर पर 80 घाव लगे हुए थे। इसलिए राणा सांगा को सैनिकों का भग्नावशेष भी कहा जाता है।


विक्रमादित्य (1531-35 ई.)

राणा सांगा का अल्पवयस्क पुत्र, उसकी माता कर्णावती (कर्मावती) या कमलावती ने संरक्षिका बनकर शासन किया।

कर्णावती ने 1534 ई. में बहादुरशाह (गुजरात) के आक्रमण के समय हुमायुं को सहायता हेतु राखी भेजी।

सन् 1535 में बहादुरशाह के आक्रमण के समय चित्तौड़ दुर्ग में जौहर (चित्तौड़ का दूसरा साका)।

बनवीर (1536-37 ई.)

सांगा के भाई पृथ्वीराज का अवैध दासी पुत्र।
इसने विक्रमादित्य की हत्या कर राजकुमार उदयसिंह की हत्या करने के लिए महल में प्रवेश किया, किन्तु पन्नाधाय द्वारा अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह की रक्षा की गई।


उदयसिंह (1537-72 ई.)

सन् 1537 मे मेवाड़ का शासक बना (जोधपुर के राजा मालदेव की सहायता से)।
शेरशाह मारवाड़ विजय के बाद चित्तौड़ की ओर बढ़ा तो उदयसिंह ने कूटनीति से काम ले किले की कूंजियाँ (चाबियाँ) शेरशाह के पास भेज दी।
1559 ई. मे उदयपुर की स्थापना।
सन् 1567-68 में अकबर द्वारा चित्तौड़ पर आक्रमण के समय किले का भार जयमल राठौड़ व पत्ता सिसोदिया (साला-बहनोई) को सौंपकर अरावली पहाड़ियों में प्रस्थान।
सन् 1568 में अकबर का चित्तौड़ पर कब्जा, जयमल, पत्ता, वीर कल्ला जी राठौड़ शहीद, अकबर ने जयमल व पत्ता की वीरता से प्रभावित होकर आगरे के किले के दरवाजे पर पाषाण मूर्तियां स्थापित करवायी तथा बीकानेर के रायसिंह ने जूनागढ़ किले की सूरजपोल पर भी जयमल-पत्ता की हाथी पर सवार पाषाण मूर्तियाँ स्थापित करवाई।
1568 ई. में यह चित्तौड़ का युद्ध चित्तौड़ का तीसरा साका था।
उदयसिंह का 1572 ई. को गोगुन्दा (उदयपुर) में देहान्त हो गया जहाँ उनकी छतरी बनी हुई है।
उदयसिंह ने अपनी प्रिय भटियाणी रानी के पुत्र जगमाल सिंह को युवराज नियुक्त किया था।


महाराणा प्रताप (1572-97 ई.)

उदयसिंह व जयवन्ती बाई (पाली के अखैराज सोनगरा (चौहान) की पुत्री) का पुत्र, जन्म 9 मई 1540 ई. में पाली में अपने ननिहाल में हुआ।
प्रताप का विवाह जैसलमेर की छीरबाई से हुआ था इन्होंने 17 और भी विवाह किए थे।
उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात गोगुन्दा (उदयपुर) में राणा प्रताप का राज्याभिषेक हुआ तथा बाद में राज्याभिषेक समारोह कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ।
राणा कीका एवं पातल नाम से भी जाने जाते थे।
बादशाह अकबर ने अपनी अधीनता स्वीकार करवाने हेतु सर्वप्रथम जलाल खाँ को महाराणा प्रताप के पास नवम्बर, 1572 ई. में भेजा। मार्च, 1573 ई. में अपने सेनापति कच्छवाहा मानसिंह को महाराणा प्रताप के पास भेजा लेकिन प्रयत्न निष्फल रहा।
पुनः सितम्बर, 1573 में आमेर के शासक भगवन्तदास (मानसिंह के पिता) एवं दिसम्बर, 1573 में राजा टोडरमल महाराणा प्रताप को राजी करने हेतु भेजे गये परन्तु प्रताप ने अकबर के अधीन होना स्वीकार नहीं किया। फलतः अकबर ने उन्हें अधीन करने हेतु 2 अप्रेल, 1576 ई. को मानसिंह को सेना देकर मेवाड़ भेजा।
अकबर की अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव अस्वीकार।
हल्दीघाटी का युद्ध या खमनौर का युद्ध या गोगुन्दा का युद्ध – कर्नल टॉड ने मेवाड़ की थर्मोपल्ली कहा, जो 21 जून 1576 (A.L. श्रीवास्तव के अनुसार 18 जून 1576) को अकबर के सेनापति मानसिंह (आमेर) के विरुद्ध लड़ा जिसमें प्रताप की जीत, प्रिय अश्व चेतक मारा गया।
इस युद्ध में पहले मुगल सेना हार रही थी लेकिन मुगलों की ओर से मिहतर खाँ ने अकबर के आने की अफवाह फैला दी जिससे मुगल सैनिकों में जोश आ गया था।
इस युद्ध में विख्यात मुगल लेखक अल बदायूंनी भी उपस्थित था। उसने अपनी पुस्तक ‘मुन्तखव-उल-तवारीख’ में युद्ध का वर्णन किया। इस युद्ध में मुगलों का सेनापति आसफ खां था। महाराणा प्रताप का मुस्लिम सेनापति हकीम खां सूरी था।
अबुल फजल ने हल्दीघाटी (राजसमन्द में) के युद्ध को खमनौर का युद्ध तथा अल बदायूंनी ने गोगुन्दा का युद्ध कहा है।
1580 में अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना को प्रताप के विरूद्ध भेजा था।
मुगलों के विरूद्ध युद्ध में सादड़ी (पाली) के जाये-जन्में दानी भामाशाह ने राणा प्रताप को अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया।
कर्नल जेम्स टॉड ने दिवेर के युद्ध को ‘मेवाड़ का मेराथन‘ कहा है।
सन् 1585 से 1615 ई. तक चावण्ड मेवाड़ की राजधानी रही। यहीं 19 जनवरी 1597 को प्रताप का देहान्त हुआ।
चावण्ड के पास बाण्डोली गाँव मे प्रताप की छत्री बनी हुई।

गुहिल वंश का इतिहास

गुहिल वंश का इतिहास


महाराणा अमरसिंह प्रथम (1597-1620 ई.)

अमरसिंह प्रथम महाराणा प्रताप के पुत्र थे।
अमरसिंह का राज्याभिषेक चांवड़ में हुआ था।
सन् 1615 ई. में जहाँगीर की अनुमति से खुर्रम व अमरसिंह के बीच सन्धि हुई जिसे मुगल-मेवाड़ सधि के नाम से जाना जाता है। इसके द्वारा मेवाड़ ने भी मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली।
अमरसिंह का पुत्र कर्णसिंह जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ था।
आहड़ में महासतियों के पास गंगो गाँव मे अमरसिंह की छतरी बनी हुई है।
बादशाह जहांगीर महाराणा को अधीन करने के इरादे से 8 नवम्बर, 1613 को अजमेर पहुंचा और शाहजादा खुर्रम को सेना लेकर मेवाड़ भेजा। अंतः युद्धों से जर्जर मेवाड़ की अर्थव्यवस्था के मध्यनजर सभी सरदारों एवं युवराज कर्णसिंह के निवेदन पर महाराणा अमरसिंह ने 5 फरवरी, 1615 को निम्न शर्त़ों पर शहजादा खुर्रम से संधि की।
(1) महाराणा बादशाह के दरबार में कभी उपस्थित न होगा।

(2) महाराणा का ज्येष्ठ कुँवर शाही दरबार में उपस्थित होगा।

(3) शाही सेना में महाराणा 1000 सवार रखेगा।

(4) चित्तौड़ के किले की मरम्मत न की जाएगी।

महाराणा कर्णसिंह (1620-1628 ई.)

महाराणा कर्णसिंह का जन्म 7 जनवरी, 1584 को और राज्याभिषेक 26 जनवरी, 1620 को हुआ।
1622 ई. में शाहजादा खुर्रम ने अपने पिता जहाँगीर से विद्रोह किया। उस समय शाहजादा उदयपुर में महाराणा के पास भी आया। माना जाता है कि वह पहले कुछ दिन देलवाड़ा की हवेली में ठहरा, फिर जगमंदिर में। महाराणा कर्णसिंह ने जगमंदिर महलों को बनवाना शुरू किया, जिसे उनके पुत्र महाराणा जगतसिंह प्रथम ने समाप्त किया। इसी से ये महल जगमंदिर कहलाते हैं।
महाराणा जगतसिंह प्रथम (1628-1652 ई.)

कर्णसिंह के बाद उसका पुत्र जगतसिंह प्रथम महाराणा बना।
जगतसिंह बहुत ही दानी व्यक्ति था। उसने जगन्नाथ राय (जगदीश) का भव्य विष्णु का पंचायतन मंदिर बनवाया। यह मंदिर अर्जुन की निगरानी और सूत्रधार (सुथार) भाणा और उसके पुत्र मुकुन्द की अध्यक्षता में बना। उक्त मंदिर की प्रतिष्ठा 13 मई, 1652 को हुई इस मंदिर की विशाल प्रशस्ति जगन्नाथ राय प्रशस्ति की रचना कृष्णभ़ट्ट ने की।
महाराणा ने पिछोला में मोहनमंदिर और रूपसागर तालाब का निर्माण कराया। जगमंदिर में जनाना महल आदि बनवाकर उसका नाम अपने नाम पर जगमंदिर रखा।
जगदीश मंदिर के पास वाला धाय का मंदिर महाराणा की धाय नौजूबाई द्वारा बनवाया गया। महाराणा जगतसिंह के समय ही प्रतापगढ़ की जागीर मुगल बादशाह शाहजहाँ द्वारा मेवाड़ से स्वतंत्र करा दी गई।


महाराणा राजसिंह (1652-80 ई.)

महाराणा जगतसिंह के पुत्र राजसिंह का राज्याभिषेक 10 अक्टूबर, 1652 ई. को हुआ।
इन्होंने गोमती नदी के पानी को रोककर राजसंमद झील का निर्माण करवाया। इसी झील के उत्तर में नौ चौकी पर 25 शिलालेखों पर संस्कृत का सबसे बड़ा शिलालेख ‘राज-प्रशस्ति’ अंकित है, जिसके लेखक रणछोड़ भट्ट तैलंग है।
राजसिंह ने किशनगढ़ की राजकुमारी चारूमति से विवाह किया जिससे औरगंजेब स्वयं विवाह करना चाहता था। अतः दोनों मे कटुता उत्पन्न हुई।
महाराणा राजसिंह ने 1664 ई. में उदयपुर में अम्बा माता का तथा कांकरोली में द्वारिकाधीश मंदिर बनवाया।
महाराणा राजसिंह रणकुशल, साहसी, वीर, निर्भीक, सच्चा क्षत्रिय, बुद्धिमान, धर्मनिष्ठ और दानी राजा था। उसने महाराणा जगतसिंह द्वारा प्रारंभ की गई चित्तौड़ के किले की मरम्मत का कार्य जारी रखा और बादशाह औरंगजेब के 2 अप्रेल, 1679 को हिन्दुओं पर जजिया लगाने, मूर्तियाँ तुड़वाने आदि अत्याचारों का प्रबल विरोध किया।
जोधपुर के अजीतसिंह को अपने यहाँ आश्रय दिया और जजिया कर देना स्वीकार नहीं किया।

महाराणा जयसिंह (1680-1698 ई.)

इन्होंने 1687 ई. में गोमती, झामरी, रूपारेल एवं बगार नामक नदियों के पानी को रोककर ढेबर नामक नाके पर संगमरमर की जयसमंद झील बनवाना प्रारंभ किया गया जो 1691 ई. में बनकर तैयार हुई।
इसे ढेबर झील भी कहते हैं।

महाराणा अमरसिंह द्वितीय (1698-1710 ई.)

वागड़ व प्रतापगढ़ को पुनः अपने अधीन किया एवं जोधपुर व आमेर को मुगलों से मुक्त कराकर क्रमशः अजीतसिंह एवं सवाई जयसिंह को वापस वहाँ का शासक बनने में सहायता की।
इन्होंने अपनी पुत्री का विवाह जयपुर महाराजा सवाई जयसिंह से किया।
महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय (1710 – 1734)

  • इन्होंने मराठों के विरूद्ध राजस्थान के राजपूत राजाओं को संगठित करने के लिए जयपुर के सवाई जयसिंह के साथ मिलकर हुरड़ा सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई लेकिन इस सम्मेलन के आयोजित होने से पूर्व ही इनका देहान्त हो गया।
  • इनके द्वारा उदयपुर में सहेलियों की बाड़ी, वैद्यनाथ मंदिर, नाहर मगरी के महल तथा उदयपुर के महलों में चीनी की चित्रशाला आदि का निर्माण करवाया गया।
  • इनके काल में मुगल शासक फर्रु‌खशियर ने जजिया कर हटाने का आदेश जारी किया।
  • इनके समय रामपुरा जागीर पुन: मेवाड़ को प्राप्त हुई जो अकबर के समय मुगलों के अधीन हो गई थी।
  • दुर्गादास राठौड़ को मेवाड़ से निकाले जाने पर वह संग्राम सिंह की सेवा में आए तथा इन्होंने दुर्गादास को विजयपुर की जागीर दी।
  • कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार बप्पा रावल की गद्दी का गौरव बनाये रखने वाला यह अन्तिम राजा था।

जगत सिंह द्वितीय (1734 – 1751)

  • इनके शासन काल में मराठों ने पहली बार मेवाड़ से कर वसूल किया।
  • इनके समय अफगान आक्रमणकारी नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया था।
  • इन्होंने पिछोला झील में जगत निवास महल का निर्माण करवाया तथा इनके दरबारी कवि नेकराम ने जगत विलास ग्रंथ की रचना की।
  • इन्होंने 17 जुलाई, 1734 को आयोजित हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता की।
  • इनकी मृत्यु के बाद प्रतापसिंह शासक बने तथा तीन वर्ष शासन करने के बाद प्रतापसिंह की मृत्यु हो गई।
  • प्रतापसिंह के बाद राजसिंह द्वितीय मेवाड़ के शासक बने तथा 7 वर्ष के शासनकाल के बाद 1761 में इनकी मृत्यु हो गई।
  • राजसिंह द्वितीय की निसंतान मृत्यु होने के कारण इनके छोटे भाई अरिसिंह को मेवाड़ का शासक बनाया गया।

महाराणा भीमसिंह (1778 – 1828)

  • महाराणा भीमसिंह को 7 जनवरी, 1778 को मेवाड़ के सिंहासन पर बिठाया गया।
  • इनके समय मेवाड़ के चूंडावत एवं शक्तावत सरदारों के बीच विरोध प्रबल हो गया था।
  • इनके समय मराठों के हस्तक्षेप तथा लूटमार के कारण मेवाड़ की स्थिति दयनीय हो गई थी।
  • कृष्णा कुमारी विवाद :- भीमसिंह की पुत्री कृष्णा कुमारी के विवाह को लेकर जोधपुर तथा जयपुर के मध्य संघर्ष हुआ क्योंकि भीमसिंह ने अपनी पुत्री का विवाह जोधपुर शासक भीमसिंह से तय किया था लेकिन विवाह से पूर्व ही जोधपुर शासक भीमसिंह की मृत्यु हो गई जिसके बाद कृष्णा कुमारी का विवाह जयपुर नरेश जगतसिंह से होना तय किया गया।
  • इस रिश्ते का जोधपुर शासक मानसिंह ने विरोध किया तथा कृष्णा कुमारी का रिश्ता स्वयं से करने के लिए कहा।
  • इस कारण जयपुर शासक जगतसिंह ने अमीर खाँ पिण्डारी की सहायता से वर्ष 1807 में गिंगोली नामक स्थान पर जोधपुर की सेना को युद्ध में पराजित किया।
  • इसके बाद महाराणा भीमसिंह ने अमीर खाँ पिण्डारी की सलाह पर कृष्णा कुमारी को जहर देकर इस विवाद को समाप्त किया।
  • वर्ष 1818 में भीमसिंह ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी से संधि कर ली।
  • इनके समय किसना आढा ने भीम विलास ग्रंथ की रचना की।
  • महाराणा भीमसिंह के बाद जवानसिंह मेवाड़ के शासक बने।
  • 1831 में गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक की अजमेर यात्रा के समय महाराणा ने उनसे मुलाकात की।
  • महाराणा जवानसिंह ने पिछोला झील के तट पर जल निवास महलों का निर्माण करवाया।
  • जवानसिंह की मृत्यु के बाद सरदारसिंह मेवाड़ के महाराणा बने तथा इन्हीं के समय वर्ष 1841 में भीलों के उपद्रव को दबाने के लिए “मेवाड़ भील कोर’ का गठन किया गया।

गुहिल वंश का इतिहास

गुहिल वंश का इतिहास

महाराणा स्वरूप सिंह (1842 – 1861)

  • महाराणा स्वरूप सिंह ने वर्ष 1844 में कन्या वध पर तथा वर्ष 1853 में डाकन प्रथा पर प्रतिबंध लगाया। इन्होंने 1861 में सतीप्रथा पर रोक लगाने के लिए आदेश जारी किया।
  • इन्होंने मेवाड़ में जाली सिक्कों के प्रचलन को समाप्त करने के लिए स्वरूपशाही सिक्के चलाए।
  • इनके शासनकाल में बिजली गिरने से विजय स्तंभ का ऊपरी भाग क्षतिग्रस्त हो गया था जिसे इन्होंने पुन: निर्मित करवाया।
  • 1857 का स्वतंत्रता संग्राम इन्हीं के शासनकाल में हुआ।
  • महाराणा स्वरूप सिंह मृत्यु पर इनकी एक पासवान ऐंजाबाई सती हुई।

महाराणा शंभुसिंह (1861 – 1874)

  • महाराणा की अवयस्कता के कारण पॉलिटिकल एजेंट मेजर टेलर की अध्यक्षता में एक परिषद का गठन कर शासन चलाया जाने लगा।
  • इनके समय शंभु पलटन नाम से नई सेना का गठन किया गया।
  • इनके समय सती प्रथा, दास प्रथा तथा बच्चों के क्रय-विक्रय आदि पर कठोर प्रतिबंध लगाये गये।
  • मेवाड़ के यह पहले शासक थे जिनके साथ कोई सती नहीं हुई।

महाराणा सज्जनसिंह (1874 – 1884)

  • महाराणा सज्जनसिंह के समय गवर्नर जनरल लॉर्ड नार्थब्रुक उदयपुर की यात्रा पर आए। यह उदयपुर आने वाले प्रथम गवर्नर जनरल थे।
  • कविराज श्यामलदास की सलाह पर महाराणा ने इजलास खास का गठन किया जिसमें 15 सदस्य थे। यह दीवानी, फौजदारी तथा अपील संबंधी मामलों की परिषद थी।
  • 20 अगस्त, 1880 को महाराणा ने प्रजा को न्याय दिलाने तथा न्यायपूर्ण शासन प्रदान करने के लिए इजलास खास के स्थान पर महेन्द्राज सभा का गठन किया। इसमें 17 सदस्य थे।
  • अंग्रेजी सरकार ने इन्हें GCSI (Grand Commandor of The Star of India) की उपाधि प्रदान की। यह उपाधि लॉर्ड रिपन द्वारा स्वयं चित्तौड़ आकर महाराणा को प्रदान की।
  • महाराणा ने सज्जन निवास उद्यान बनवाया तथा सज्जन मंत्रालय की स्थापना करवाई।
  • इन्होंने कवि श्यामलदास को कविराज की उपाधि प्रदान की तथा सज्जनवाणी विलास नामक पुस्तकालय की स्थापना करवाकर श्यामलदास को इसका प्रमुख नियुक्त किया।

महाराणा फतेहसिंह (1884 – 1930)

  • इनके शासनकाल में वर्ष 1885 में गवर्नर जनरल डफरिन उदयपुर आए।
  • इन्होंने 1887 में महाराणी विक्टोरिया के शासन के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य पर सज्जन निवास बाग में विक्टोरिया हॉल का निर्माण करवाया।
  • महाराणा फतेहसिंह ने फतेह सागर झील का निर्माण करवाया।
  • 1911 में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के दिल्ली आगमन पर भव्य दरबार का आयोजन किया गया, जिसमें महाराणा फतेहसिंह दिल्ली गए लेकिन दरबार में हाजिर नहीं हुए।

महाराणा भूपाल सिंह (1930 – 1947)

  • इनके शासनकाल में बिजौलिया किसान आंदोलन, बेंगू किसान आंदोलन तथा मेवाड़ प्रजामण्डल आंदोलन आदि घटनाएं हुईं।
  • राजस्थान के एकीकरण के समय मेवाड़ के शासक भूपालसिंह थे।
  • इनके समय 18 अप्रैल, 1948 को उदयपुर रियासत का विलय संयुक्त राजस्थान में हो गया।

गुहिल वंश का इतिहास समाप्त

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